Thursday, 22 December 2011

गीता विरोध : मानसिक दिवालियापन

गीता विरोध : मानसिक दिवालियापन


श्रीमद्भगवदगीता को उग्रवादी साहित्य् बताकर् और् उस् पर् प्रतिबन्ध् लगाने की कोशिश् रूस् वालों की बुद्धि का दिवालियापन् है । गीता धर्म्, जाति,लिंग्, सम्प्रदाय्, देश्, काल् से परे एक् सार्वभौमिक् सद्ग्रन्थ् है जो मानव् ही नहीं अपितु प्राणिमात्र् के कल्याण् का प्रतिपादन् करती है । सभी आग्रहों से परे होकर् मानव् मात्र् का कर्तव्य् है कि वह् गीता धारण् करे । ऐसी कल्याणमयी भगवद्स्वरूप् कृति विश्व् के लि‌ए वरदान् है । रूस् के लोगों ने ऐसी दूषित् शोच् से अपने अस्तित्व् के प्रति प्रश्नचिन्ह् पैदा कर् दिया है । यदि प्रतिबंध् लगाना था तो क़ुरान् और् अहले इसलाम् पर् लगाते जिसमें विपरीत् विचारधारा के प्रति घोर् असहिष्णुता है । जिसमें इसलाम् से इतर् अन्य् मतावलम्बी क़ाफ़िर् हैं और् उन् क़ाफ़िरों की ज़र्, जोरू, ज़मीन् छीन् लेना शवाब् होता है । मैं इस् मंच् के माध्यम् से उन् भ्रमित् लोगों को सलाह् देता हूँ कि वे अपनी सोच् को परिष्कृत् करें । ऐसे घृणित् प्रयास् की मैं घोर् निन्दा करता हूँ और् भारत् के प्रधान्मंत्री से निवेदन् करता हूँ कि वे इस् दुष्कृत्य् का प्रबलतम् विरोध् दर्ज़् करें ।

Thursday, 8 December 2011

Friday, 7 October 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम-श्री मद भगवद गीता के ७०० श्लोकों का हिन्दी पद्यांतरण

GITAMRITAM गीताऽमृतम-श्री मदभगवद गीता के ७०० श्लोकों का हिन्दी पद्यांतरण
नम्र निवेदन


मुनिश्रेष्ठ श्री वेदव्यास द्वारा रचित भगवान श्री विष्णु के मुख सरसिज से उद्भूत वाणी ’श्री मदभगवद गीता’ का हिंदी पद्य रूपान्तरण स्वरूप ’गीतामृतम’ सम्पूर्ण होकर जन गण मन को समर्पित है ।
सर्व प्रथम मैं अपने साहित्यिक गुरु पूज्यपाद श्री विजय शंकर शुक्ल जी के चरणकमलों में अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ जिनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से मुझे सर्वदा आत्मबल मिला ।

उन कवियों/ साहित्यकारों, जिन्होंने राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट एवं प्रसारित करने के निमित्त ”राष्ट्रीय साहित्य सेवा संस्थान’ परिवर्तित नाम ’राष्ट्रीय समग्र सेवा संस्थान’ की स्थापना से लेकर संचालन तक में अपना अमूल्य योगदान दिया, जिनमें डा. सुग्रीव सिंह ’विमल’, डा. किशोरी शरण शर्मा, आर्य भूषण गर्ग, श्याम नारायण पाण्डेय, स्व. विश्व नाथ सिंह ’विकल गोण्डवी’, विश्वम्भर नाथ पाण्डेय, देवकी नन्दन ’शान्त’, विजय त्रिपाठी प्रभृति अनेक अक्षरब्रह्म साधकों का नाम उल्लेखनीय है, को भी उनके उस योगदान के लिए सदैव स्मरण रखूँगा ।

गीता के विषय में मैं यह कहना चाहूँगा कि गीता मानव को उत्तम जीवन जीने का कौशल सिखाती है ।
गीता किसी व्यक्ति, समूह, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग विशेष नहीं अपितु सम्पूर्ण चराचर जगत के कल्याण मार्ग का साधन है ।

गीता ज्ञान धारण करके मनुष्य हिंसा, भय, दुख, पश्चात्ताप, निराशा, आलस्य, अकर्मण्यता, लोलुपकामना, पाप आदि कुविचारों से मुक्त हो जाता है ।

गीता भुक्ति से विरत कर, युक्ति एवं मुक्ति पथ पर ले जाती है ।

इस कृति में प्रायः मुक्तक विधा का प्रयोग किया गया है । काव्य की प्रभावोत्पादकता बनी रहे इसका ध्यान रखने का प्रयास किया गया है ।

मेरा प्रयास रहा है कि गीता के मूल संस्कृत श्लोकों में प्रयुक्त शब्दों एवं भावार्थों का अधिकाधिक समावेश हो, एवं मुख्य धारा से विचलन न हो ।
आशा है कि इसे पढ कर लोक मानस में राष्ट्र प्रेम के साथ "सर्वे भवन्तु सुखिन” की भावना पुष्ट होगी ।

सर्वभूतहितेरत-
स्वामी दिनेशानन्द
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गुरुदेवादि वंदना
सद्गुरु के श्री चरणों में पूर्ण समर्पित मन धन गात करूँ
उनके आदर्शों आचरणों के प्रति सश्रद्ध प्रणिपात करूँ
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेश रूप गुरु अमल विमल मति देता है
वह कल्पवृक्ष सर्वदा अयाचित नर को शुभ गति देता है
गुरु परमब्रह्म परमाश्रय है उससे चलता जग सारा है
गुरु ज्ञान सर्वाहितकारी है पावन गंगा की धारा है

गणपति सुखदायक वीर विनायक वक्रतुण्ड का अभिनन्दन
दारुण दुख बाधा क्लेश कष्टहारी को कोटि कोटि वन्दन
जिनकी हो जाये कृपा दृष्टि मिट जायें सब करुणा क्रन्दन
सब पर हो कृपावृष्टि हे लम्बोदर गौरी शंकर नन्दन
द्रुतलेखी ज्ञान निधान महा पितु मातु भक्त दुखहारी हो
हे महाकाय रवि कोटि प्रभायुत गजमुख सब सुखकारी हो
हे संकट मोचन सुवन त्रिलोचन बहुविधि भव भय हारी हो
मंगलकारी सर्वदा सर्वजनहितकारी अविकारी हो

गोपिका संग सहस्र लिये मन भावन पावन रास रचैया
ग्वाल सखा सँग धेनु चराते जो नटवर नागर वंशी बजैया
त्राण दिया जन जीवन को भयमुक्त हो कालिय नाग नथैया
कहते उन्हें यदुनन्दन मोहन माधव केशव कृष्ण कन्हैया

हे हंस वाहिनी मधुरभाषिनी क्लेशनिवारिणि नमस्कार
हे वीणावादिनि सरल सुहासिनि भव भय हारिणि नमस्कार
हे ज्ञान प्रकाशिनि तम नाशिनि कवि हृदय विहारिणि नमस्कार
हे ब्रह्मविचारसार विस्तारिणि पुस्तक धारिणि नमस्कार

है राम कृष्ण को नमन मेरा सीता को देवी राधा को
अंजनि सुत रामदूत को भी, जो हर लेते हर बाधा को
ब्रह्मा शिव विष्णु सहित सारे देवों को मेरा नमस्कार
यक्षों गन्धर्वों ऋषि मुनि गण साध्यों सिद्धों को नमस्कार

पीडित शोषित वंचित जन परित्यक्तों को मेरा नमस्कार
परहितकारी उन सभी राष्ट्रभक्तों को मेरा नमस्कार
वाल्मीकि व्यास तुलसी कबीर बंकिम रवीन्द्र कवि दिनकर को
प्रणिपात करूँ मैं वीर विनायक दामोदर सावरकर को
उन रक्तस्नात केसरपुष्पों वाली कश्मीर घाटियों को
है नमन मेरा नर एवं जगद्रोही आतंकवादियों को
उनके प्रति भी कृतज्ञ हूँ मैं जो खून बहाने वाले हैं
वे सारे मारे जायेंगे केशव फिर आने वाले वाले हैं
प्रणिधायकाय है नमस्कार मेरा शिव विष्णु विधाता को
तन मन धन अर्पित करके नमन करूँ मैं भारतमाता को  ॥

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GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्री गीता जी की आरती

GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्री गीता जी की आरती

गीते ! भगवन की वाणी, सब जीवों की कल्याणी, दुःखों से तू ही उबारती ।
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

तुझको पाकर मन का सारा अंधकार मिट जाये
तेरी कृपा दृष्टि पा करके ज्ञान चक्षु खुल जाये
माता विद्या बढाने वाली, मोक्ष दिलाने वाली, नैया तू पार उतारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

तू है सब जीवों की माता तू ही सबकी धाता
तेरा ही आश्रय लेकरके रचता जगत विधाता
माता तू ही है भवभयनाशिनि तू ही है ज्ञानप्रकाशिनि, भक्तों को अपने दुलारती
माता हम सब उतारें तेरी आरती ॥

काम क्रोध मद लोभ छोडकर जो तेरे ढिंग आये
सुख सुख में समान हो करके परमधाम पा जाये
माता तू है सावित्री सीता, तू ही है पावन गंगा, पापी के पाप निवारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

धर्म कर्म का पथ दिखलाकर सबको निर्भय करती
शरणागत के पापों को तू मन में कभी न धरती
माता, केशव का चक्र चलाके, शंकर का शूल उठाके, दुष्टों को तू ही संहारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

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भजन

मेरे आँगन में गोविन्द आया करो ||


पहले तुम असुरन को मारो पाछे वंशी बजाया करो     ||
आतंकी विषधर नागों को नाथ के मोहन नचाया करो  ||
व्याकुल गाय गोपिका गोपी गिरि गोवर्धन उठाया करो ||
भ्रष्टाचार और शोषण के शिशुपालों को नसाया करो      ||
निश्छल भक्ति हमें दे करके माया तिमिर हटाया करो   ||
काम क्रोध मद लोभ मोह से हमको हमेशा बचाया करो ||
लाज द्रोपदी की ज्यों राखी सबकी लाज बचाया करो     ||
सभी दुष्ट हो जायें "घायल" ऐसा चक्र चलाया करो  ॥     ||


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भजन
तनी मोहन मुरलिया बजउत्या ना


जौन रूप अर्जुन काँ देखाया, हमहूँ काँ उहै देखउत्या ना                  ||


गली गली द्रौपदी पुकारै, हमरौ लजिया बचउत्या ना                      ||


गणिका गीध अजामिल काँ तारया, हमरौ पार लगौत्या ना            ||


वृन्दावन की कुन्ज गलिन मां, फिर से रास रचउत्या ना                ||


माया कै जंजाल न छूटै, गीता कै ज्ञान करउत्या ना                       ||


तब तौ कह्या हम हर जुग मां अउबै, का होइगै तुँहका बतउत्या ना  ||


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ऊँ श्री परमात्मने नमः
श्री गीतामृतम
अथ करन्यासः
ऊँ अस्य श्री गीतामृतम माला मन्त्रस्य स्वामी दिनेशानन्द ऋषिः मुक्त छ्न्दः श्रीकृष्ण परमात्मा देवता, ’सारे वर्णों में मैं ही हूँ ऊँकार रूप, मैं महाकाल हूँ सब कालों का ज्ञाता हूँ’ इति बीजम ॥ ’मैं सर्वमुखी हूँ महाविराट रूप वाला, मैं हूँ समास में द्वन्द्व सभी का धाता हूँ’ इति शक्तिः ॥ ’ कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति कीलकम ॥ ’तू मेरी कृपा दृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इत्यंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ’सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति तर्जनीभ्यां नमः ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुखभवसागर तर जायेगा’ इति मध्यमाभ्यां नमः ॥ मेरे शरीर में सचराचर स्थित समग्र संसार देख’ इति अनामिकाभ्यां नमः ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुसार जो चाहे वह साकार देख’ इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ’मैं देख रहा हूँ देव तुम्हारी काया में देवों ऋषियों को योगारूष उपायों को’ इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ इति करन्यासः ॥

अथ हृदयादि न्यासः
’कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति हृदयाय नमः ॥ ’तू मेरी कृपादृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इति शिरसे स्वाहा ॥ ’ सब धर्मों को तजकर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति शिखायै वषट ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा’ इति कवचाय हुम ॥ ;मेरे शरीर में सचारर स्थित समग्र संसार देख’ इति नेत्र त्रयाय वौषट ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुरूप जो चाहे वह साकार देख’ इति अस्त्राय फट ॥ ऊँ श्री कृष्ण प्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ॥

अथ ध्यानम
गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता, मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता ।
इसे भवघ्नी चिदानन्द अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें, परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थ ज्ञान मंजरी कहें ।
इन नामों का जप स्थिरमन से जो नर कर लेता है, शीघ्र प्राप्त कर ज्ञान सिद्धि फिर परमधाम पा लेता है ।

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम, देवकी परमानन्दम कृष्णम वन्दे जगद गुरुम ।
लाँघे पर्वत पंगु तब मूक होत वाचाल । तब करते हैं कृपा प्रभु यदुनन्दन गोपाल ॥
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गीतामृतम से कुछ सम्पुट


सुरक्षा हेतु
इसका छेदन शस्त्रास्त्र नहीं कर सकते ...........( अध्याय २/२३)
मोक्ष प्राप्ति हेतु
ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक..........(अध्याय ४/९)
पाप मुक्ति हेतु
इस जग में जितने भी हैं पापकर्म वाले..........(अध्याय ४/३६)
सुख शान्ति हेतु
जो कर्मों के फल का परित्यागी होता है.........(अध्याय ५/१२)
कल्याण हेतु
जो सतत अनन्य भावना से मेरी उपासना....(अध्याय ९/२२)
विद्या ज्ञान प्राप्ति हेतु
उन भक्तों पर अनुकम्पा करने......................(अध्याय १०/११)
धन धान्य प्राप्ति हेतु
एकादश रुद्रों में शंकर यक्षों में ........................(अध्याय १०/२३)
कामना प्राप्ति हेतु
शस्त्रास्त्रों में मैं वज्र रूप गौओं में कामधेनु.........(अध्याय १०/२८)
विजय हेतु
मैं ही कहलाता हूँ जयिष्णु की नीति परम...........(अध्याय १०/३८)
तू मार प्रतीक रूप में ........................................(अध्याय ११/३४)
भूत प्रेत बाधा निवारण हेतु
यह सभी आपकी कीर्ति नाम गुण का प्रभाव.......(अध्याय ११/३६)
पाप क्षमा हेतु
शय्या आसन भोजन.........................................(अध्याय ११/४२)
क्षमा दूसरों को इस जग में.................................(अध्याय ११/४४)
आरोग्य हेतु
हो परम सूक्ष्म..................................................(अध्याय १५/१३)
संकट निवारण हेतु
कट जायेंगे सारे संकट.....................................(अध्याय १८/५८)
सर्वतोन्मुखी उन्नति हेतु
हैं जहाँ विराजित योगेश्वर...................................(अध्याय १८/७८)
                                 
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GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य

GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य

धरा ने पूछा


प्रभु हमें ज्ञान दो कैसे मानव प्रारब्धों का भोग करे
सँग में प्रभु पद में निश्छल भक्ति भाव का भी संयोग करे

श्री विष्णु ने कहा

जो प्रारब्धों का भोग और सँग सँग गीता अभ्यास करे
है जग में सुखी मुक्त वह नर भवबन्धन का उपहास करे


चाहे जैसा हो महापाप मानव गीता का करे ध्यान
संस्पर्श नहीं करते किंचित उसको नलिनी जल के समान


पावन गीता का ग्रन्थ जहाँ जिस घर जिस जगह प्रतिष्ठित है
समझो मय तीर्थ प्रयागराज साक्षात विराजित संस्थित है


सारे योगी पन्नग ऋषियों के साथ देवता रहते हैं
है जहाँ विराजमान गीता ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं


गोपाल बाल कान्हा भी हर क्षण वास वहाँ पर करते हैं
नारद ध्रुव आदि पार्षदों के सँग शीघ्र अनुग्रह करते हैं


हे धरा तुझे मैं बतलाऊँ करता हूँ नित मैं वास वहाँ
गीता का पाठन और श्रवण गीता का हो अभ्यास जहाँ


गीताश्रय में है वास मेरा गीता है मेरा सुघर भवन
गीताश्रय से मेरे द्वारा पोषित पालित है सकल भुवन


है ब्रह्मरूपिणी परमश्रेष्ठ विद्या गीता है अतुलनीय
है अर्धमात्राक्षरा और नित्या पदावली अकथनीय


निज मुख से चिदानन्द माधव ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया
तत्वार्थ ज्ञान वेदस्वरूप गीता का अनुसंधान किया


जो अष्टादश अध्यायों का निश्चल मन से व्यवहारी हो
तच्क्षण हो ज्ञान सिद्धि उसको भगवदपद का अधिकारी हो


सम्पूर्ण पाठ दुष्कर हो यदि उसका आधा भी पढ जावे
निश्चय गोदान समान पुण्य का मार्ग नया नित गढ जावे


छः भाग नित्य जो पढता है गंगास्नान फल पाता है
जो तीन भाग नित पढता है वह सोमयाग फल पाता है


जो मात्र एक अध्याय नित्य पढता है भक्ति भाव लेकर
वह दीर्घ काल तक रुद्रलोक में बसता है शिवगण होकर


अध्याय श्लोक या अंश मात्र का जो आचारी होता है
वह हर मन्वन्तर में मानव जीवन अधिकारी होता है


दस सात पाँच दो तीन चार अध्याय अंश जो हो संभव
शत सदियों तक शशिलोक वास, फिर पुरुष योनि होती संभव


अवसान काल पर जो मुख से गीता उच्चारण करता है
फिर पुनर्जन्म पाकर मानव शरीर वह धारण करता है


गीता अभ्यास पुनः करके वह उत्तम गति पा जाता है
’गीता’ का उच्चारण करके नर सद्गति को पा जाता है


जिसके सिर पर हो महपाप गीतार्थ श्रवण अनुरागी हो
वैकुन्ठ प्राप्त होता उसको हरिपदानन्द का भागी हो


मन में गीतार्थ प्रकाशित कर शुभ कर्मों को अपनाता है
वह जीवन्मुक्त कहाता है देहान्त परमपद पाता है


गीता का आश्रय लेकर ही इस जग में होकर पापमुक्त
जनकादि अनेक नृपति सुखकर पा गये परमपद तापमुक्त


गीता माहात्म्य बिना गीता का पाठ अधूरा होता है
ऐसा समझो वह नर अपनी श्रमशक्ति व्यर्थ ही खोता है


गीता माहात्म्य सहित गीता का पाठ सदा जो करता है
उसका दुर्लभ फल पाता है वह नर भवसागर तरता है

सूत ने कहा

माहात्म्य सनातन गीता का मैंने जो कहा अपेक्षित है
गीता के बाद पढा जाये उसका परिणाम सुनिश्चित है   ॥

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GITAMRITAM गीताऽमृतम -
 श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य का अनुसंधान


शौनक बोले


मुनि व्यास सहित श्रुतियों द्वारा जो कहा गया वह बतलाओ
हे सूत ! वुलक्षण गीता का माहात्म्य मुझे भी समझाओ


सूत ने कहा


है परम पुरातन गोपनीय जिसके बारे में प्रश्न किया
गीता माहात्म्य कथन में अब तक कोई नहीं समर्थ हुआ


गीता माहात्म्य बडा दुर्गम कहलाता है
श्रीकृष्ण एक जो भली प्रकार जानते हैं
कुछ कुछ है ज्ञान व्यास शुक याज्ञवल्क्य को भी
अर्जुन विदेह भी थोडा बहुत जानते हैं


कुछ अन्य दूसरे हैं जो इसको सुनकर के
सारे लोकों में इसका कीर्तन करते हैं
हमने भी जो कुछ सुना व्यास जी के मुख से
अब आज आप से उसका वर्णन करते हैं


भगवान विष्णु के मुख सरसिज से जो निःसृत
उसका हृदयंगम कर लेने का आग्रह है
नर का कर्तव्य यही गीता कंठस्थ करे
सब व्यर्थ अनेकानेक शास्त्र का संग्रह है


है सर्वज्ञान प्रेरक गीत सारे धर्मों का है निचोड
सब शास्त्र समाहित हैं इसमें गीता का कोई नहीं जोड


दुस्तर भवसागर को तरने का जो सपना साकार करे
वह गीता महापोत चढकर सुख से भवसागर पार करे


जो पुरुष सचेष्ट पुण्य गीता का नित्य पाठ कर लेता है
भय शोक आदि से मुक्त हुआ वह विष्णु धाम पा लेता है


जो गीता का अभ्यासपूर्वक श्रवण नहीं कर पाता है
वह मूढ मोक्षकामी बालक सम अपनी हँसी उडाता है


जो मानव पावन गीता को निशिदिन सुनते या पढ जाते
संदेह नहीं उनसे मानव क्या सुर भी पार नहीं पाते


नर काया मैल सर्वदा जल या गंगाजल से धुलता है
संसार रूप का मैल सदा ही गीता जल से धुलता है


गीता का पाठन पठन नहीं गीता का जिसको ज्ञान नहीं
हो अरुचि श्रवण में, श्रद्धा और भावना से सम्मान नहीं


संसार बीच ऐसा मनुष्य शूकर समान विचरण करता
वह सबसे बडा नीच जो गीता ज्ञान नहीं धारण करता


व्रत चेष्टा तप यश ज्ञान तथा हैं अर्थहीन आचार सभी
गीतार्थ पठन से रहित नराधम को करते धिक्कार सभी


निष्फल वह ज्ञान धर्मरोधी आसुरी कहाया जाता है
वेदान्त वेद निन्दित गीता में कभी न गाया जाता है


जो सोते चलते खडे बोलते निशि दिन गीता गाता है
वह सतत यथार्थ ज्ञानरत शाश्वत मोक्षधाम पा जाता है


जो श्रेष्ठ पुरुष योगी सिद्धों संतों में गीता पाठ करे
यज्ञों भक्तों के बीच सुनाकर परमधाम को प्राप्त करे


गीता का नित्य पठन पाठन या श्रवण नित्य जो करता है
दक्षिणा दान संग अश्वमेध के तुल्य यज्ञ वह करता है


जिसने अविचल मन भक्तिभाव से गीता का अभ्यास किया
उसने उन वेद पुराण शास्त्र समझो सबका अभ्यास किया


गीता के अर्थों को जो सुनता गाता और सुनाता है
वह परहितकारी मानव प्रभु का परमधाम पा जाता है


जो नर घर में गीता का पूजन आयोजन करवाता है
फिर त्रिविध ताप उत्पन्न व्याधि दुख का भय नहीं सताता है


उस पर दुर्गति या पाप शाप होते हैं अप्रभावकारी
मानव शरीर के छहों शत्रु होते हैं नहीं अहितकारी


गीता का अभिनन्दन वन्दन सम्पन्न जहाँ पर होता है
ईश्वर का निश्चल भक्तिभाव उत्पन्न वहाँ पर होता है


स्नापित अथवा अस्नापित हो पावन या कोई अपावन हो
उस विश्वरूप का ध्यान करे तो पुरुष सर्वदा पावन हो


भोजन सर्वत्र ग्रहण करता हर तरह दान लेने वाला
बन्धन से बँधता कभी नहीं गीता वाचन करने वाला


निज अन्तःकरण सहित जो नित गीता में ध्यान लगाता है
सर्वाग्निक क्रियावान पण्डित वह नितजापी कहलाता है


वह दर्शनीय योगी ज्ञानी याज्ञिक धनवान कहाता है
वह सब वेदों का ज्ञाता है एवं ध्यानी कहलाता है


गीता होती है जहाँ उपस्थित जहाँ पाठ नित होता है
सब तीर्थों सहित प्रयागराज का वास वहाँ पर होता है


सर्प देवता योगी ऋषि उस देह देश में करते वास
गीता स्थित है जिस घर में वह होता इनका आवास


गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता
मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता


इसे भवघ्नी चिदानंद अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें
परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थज्ञान मंजरी कहें


इन नामों का जप स्थिर मन से जो नर कर लेता है
शीघ्र प्राप्त कर ज्ञानसिद्धि फिर परमधाम पा लेता है


कर्मों को करने के संग जो नर गीता का पाठ करे
सभी कर्म निर्दोष सिद्ध हों सुन्दर फल को प्राप्त करे


पितरों के प्रति श्राद्ध कर्म में जो गीता अपनाते हैं
हो जाते संतुष्ट पितरगण सद्गति को पा जाते हैं


गीता से संतुष्ट श्राद्ध से तृप्त पितर जब होते हैं
पितृलोक में जाकर के आशीष पुत्र को देते हैं


जो गीता लिख गले हाथ मस्तक पर धारण करता है
दारुण विघ्न उपद्रव बाधा का निस्तारण करता है


भारत में चारों वर्णों में जो भी हैं मनुजदेहधारी
जो नहीं हुए गीतामृत के पढने सुनने के व्यवहारी


वे समझो अमृत छोड मात्र विष का ही पान किया करते
सुख मोक्ष उन्हें मिलता है जो गीतामृत पान किया करते


दुख से पीडित संसारी जो भगवद्गीता का श्रवण करे
अमृत की प्राप्ति उसे होती श्रीहरि के पद में श्रयण करे


पा गए परमपद जनक आदि नृप गीता ज्ञान निरत होकर
गीता का आश्रय ले करके इस जग में पाप विरत होकर


है ऊँच नीच का भेद नहीं जग के सारे मानव समान
यह ब्रह्मरूपिणी गीता दे सबको हितकारी परमज्ञान


सादर गीतार्थ श्रवण करके जिसमें प्रसन्नता व्याप्त नहीं
उसको प्रमादवश जग में श्रम का प्रतिफल होता प्राप्त नहीं


गीता माहात्म्य बिना गीता का पठन पुरुष जो करता है
होता है वृथा पाठफल वह अपना श्रम निष्फल करता है


माहात्म्य सहित जो सुने और श्रद्धा से गीता पाठ करे
दुर्लभ गति उसे प्राप्त होती वह भवसागर को पार करे


गीता का जो माहात्म्य सनातन यह मैंने बतलाया है
गीता के बाद पढा जिसने उसने यथोक्त फल पाया है   ॥


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Sunday, 18 September 2011

GITAMRITAM: GITAMRITAM गीताऽमृतम -अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन...

GITAMRITAM: GITAMRITAM गीताऽमृतम -अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन...: GITAMRITAM गीताऽमृतम अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन्यास योग अर्जुन बोले हे महाबाहु ! हे हृषीकेश कुछ और जानना चाहूँगा मैं पृथक पृथक सन्...

GITAMRITAM गीताऽमृतम -अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन्यास योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम
अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन्यास योग


अर्जुन बोले


हे महाबाहु ! हे हृषीकेश कुछ और जानना चाहूँगा
मैं पृथक पृथक सन्यास त्याग का तत्व जानना चाहूँगा


भगवान बोले


कुछ पण्डितजन कामना पूर्ण सब कर्मों के, सम्पूर्ण त्याग को ही सन्यास समझते हैं
सारे कर्मों के फल का त्याग त्याग होता, कुछ हैं वैचारिक जन जो ऐसा कहते हैं


सब कर्म त्याज्य हैं कुछ विद्वानों का अभिमत, जितने भी होते कर्म सभी हैं दोषयुक्त
कुछ अन्य मनीषी भी हैं जिनका यह मत है, तप, दान, यज्ञ हैं नहीं त्याज्य, हैं दोषमुक्त


नरश्रेष्ठ पार्थ ! सन्यास त्याग दोनों में से, किसको कहते हैं त्याग प्रथम बतलाऊँगा
यह होता सात्विक राजस तामस गुण वाला, जो मेरा निश्चय मत है वह समझाऊँगा


मानव के आवश्यक एवं निश्चित कर्तव्यों में से हैं
ये यज्ञ दान तप रूप कर्म हैं नहीं कभी त्यागने योग्य
इनका स्वरूप से त्याग सदा पुरुषों के लिए अवांछित है
ये बुद्धिमान पुरुषों को करते हैं सदैव पावन सुयोग्य


चाहिए दान तप यज्ञ कर्म करना नर को कर्तव्य समझ
निष्काम सभी कर्मों को भी यह मेरा है मन्तव्य समझ


जो हैं निषिद्ध कामनापूर्ण उनका स्वरूप से त्याग उचित
पर नियत कर्म का नहीं कभी उनके स्वरूप से त्याग उचित
जो मोह और भ्रम के कारण कर्तव्यों का परित्याग करें
वह तामस त्याग कहा जाता वह त्याग सदा होता अनुचित


इस जग मे लोगों के द्वारा जितने भी कर्म किए जाते
सब दुख के कारक होते हैं कुछ मानव यही समझते हैं
शारीरिक कष्टों के भय से कर्तव्य त्याग होता निष्फल
इस आशय से जो होता उसको त्याग राजसी कहते हैं


अर्जुन ! शास्त्रोक्त कर्म करना ही कहलाता है तत्वयुक्त
फल की इच्छा का त्याग सदा ही जाना जाता सत्वयुक्त


करता है द्वेष नहीं जो अकुशल कर्मों से, हो नहीं कुशल कर्मों के प्रति भी अनुरागी
वह शुद्ध सत्वगुण युक्त पुरुष संशयविहीन, होता प्रबुद्ध है कहलाता सच्चा त्यागी


होता है शक्य नहीं कर्मों का पूर्ण त्याग, उसके भी द्वारा जो नर त्यागी होता है
इसलिए कर्म के फल का जो परित्याग करे, सच्चे अर्थों में वह नर त्यागी होता है


जब कर्मों के फल का परित्याग नहीं होता, होता है अच्छा बुरा तथा मिश्रित सा फल
कर्मों का फल तजने वालों को मृत्योपरि, मिलता है कभी भी नहीं उन कर्मों का फल


हे महाबाहु ! सारे कर्मों की सिद्धि हेतु, बतलाये जाते पाँच तरह के हैं कारण
जिसका है विशद निरूपण सांख्यशास्त्र में भी, मुझसे सुनकर उसको तू कर मन में धारण


सारे कर्मों की सिद्धि प्राप्ति में होते अधिष्ठान कर्ता
है अन्य करण जो कहलाता जिसकी विभिन्न मुद्राएं हैं
है अन्य हेतु जो दैव कहाता कार्यसिद्धि में कारक बन
पाँचवाँ हेतु है पुरुषों की जो भिन्न भिन्न चेष्टायें हैं


मन वाणी काया से नर जिन कर्मों को करते धारण हैं
शास्त्रानुकूल अथवा विरुद्ध ये पाँचों उनके कारण हैं


कर्मों में आत्मा सदा अकर्ता है जिसको यह पता नहीं
उस मलिन बुद्धि वाले नर को कुछ भी यथार्थ का पता नहीं


सांसारिक भोगों कर्मों में जो लिप्त नहीं, मैं कर्ता हूँ मन में यह भाव न आता है
सारे लोकों की हत्या करके भी वह नर, है पापमुक्त हत्यारा नहीं कहाता है


तीन तरह की कर्म प्रेरणा ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता हैं
तीन तरह कर्मों का संग्रह क्रिया कर्म कर्ता हैं


कर्ता ज्ञान कर्म तीनों के होते तीन तरह के गुण
गुण संख्यानक शास्त्रों में जो, मुझसे उन्हें यथावत सुन


जिस ज्ञानाश्रय से नर अविनाशी ईश्वर को, समभाव रूप अविभाजित हो स्थित जाने
वह भाव सदा कहलाता है परमात्मभाव, उस ज्ञानतत्व को तू सदैव सात्विक जाने


जो माने पृथक पृथक रूपों में भावों में, सारे भूतों में स्थित है भगवान वही
जो नहीं देखता ईश्वर को समभावपूर्ण, राजसी भाव का कहलाता है ज्ञान वही


जो मुक्ति रहित, सम्पूर्ण सदृश, नर काया में आसक्त हुआ
वह अल्प अतात्विक ज्ञान सदा तामसी भाव में व्यक्त हुआ


जो शास्त्र विहित हो कर्तापन अभिमान रहित, अफलाकांक्षी नर द्वारा कर्म किया जाता
होता है जहाँ न रागद्वेष का समावेश, उन कर्मों को ही सात्विक कर्म कहा जाता


जिसका निष्पादन होता अधिक परिश्रम से, जो अहंकारियों द्वारा कर्म किया जाता
जिनमें होती है भोगों की कामना प्रबल, उन कर्मों को ही राजस कर्म कहा जाता


फल हानि और हिंसा का जिसमें बोध न हो, जिसमें निज बल पौरुष का होता नहीं ध्यान
अज्ञानपूर्वक होता जिसका समारम्भ, उन कर्मों को ही तू केवल तामसी जान


हो कार्यसिद्धि अथवा असिद्धि दोनों में ही, जो खुशी शोक द्वन्द्वों में सम हो जाता है
उत्साह धैर्ययुत अनहंवादी मुक्तसंग, कर्ता ही सात्विक गुण वाला कहलाता है


रागी हो, कर्मफलाकांक्षी, लोभी, अशुद्ध, जो सर्वकष्टकारी हिंसा स्वभाव वाला
जो हर्ष शोक में डूबा उतराया करता, ऐसा कर्ता होता राजसी भाव वाला


जो है अयुक्त, अज्ञानी, शिक्षा से विहीन, जो होता परजीविका नाश करने वाला
दम्भी, आलसी, दीर्घसूत्री हो शोकयुक्त, तामसी कहा जाता है धूर्तवृत्ति वाला


गुण के अनुसार बुद्धि धृति के भी तीन भेद बतलाता हूँ
अर्जुन ! विभागशः मुझसे सुन, तुझको सम्यक समझाता हूँ


जो बुद्धि प्रवृत्ति निवृत्ति तथा कर्तव्य साथ में अकर्तव्य
भय अभय अनेक विकारों का जो सम्यक ज्ञान कराती है
जो मोक्ष और बंधन का करने में सक्षम तात्विक निर्णय
हे पार्थ ! पुरुष की वही बुद्धि सात्विकी बुद्धि कहलाती है


जब धर्म अधर्म अकार्य कार्य का ज्ञान नहीं हो पाता है
ऐसा मानव राजसी बुद्धि वाला मानव कहलाता है


समझे अधर्म को धर्म अशौच पुनीत दिखाई देता है
अर्जुन ! तामसी बुद्धि को सब विपरीत दिखाई देता है


मन प्राण इन्द्रियों की जिस नर में अटल धारणा होती है
उस ध्यान योग में रत नर की सात्विकी धारणा होती है


जब कोई नर आसक्ति सहित धारण करता धर्मार्थ काम
हे पृथा पुत्र अर्जुन जानो, उस धृति का है राजसी नाम


निद्रा भय चिन्ता दुख मद को जो मानव नहीं छोडता है
तामस धृति से दुर्बुद्ध पुरुष वह निज सम्बन्ध जोडता है


जो भजन ध्यान सेवा से सुख के अनुभव का अभ्यसन करे
हे पार्थ ! त्रिविध सुख प्राप्त करे वह सब दुखों का हनन करे


आरम्भ काल में यद्यपि वह विष सम लगता है दुखकारी
वह सात्विक सुख प्रसादमय होता है अमृतसम हितकारी


इन्द्रिय विषयों का संगम अमृत जैसा लगता सुखकर है
परिणाम रूप में वह राजस सुख विष सा बडा कष्टकर है


तामस सुख आदि अन्त दोनों में मोहन पैदा करता है
निद्रा आलस्य प्रमादजन्य सम्मोहन पैदा करता है


पृथ्वी आकाश देवता अथवा कोई ऐसा सत्व नहीं
हो विद्यमान जिनमें इन तीनों प्रकृति गुणों का तत्व नहीं


ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य शूद्र इनके स्वभावतः कर्म नियत
अर्जुन ! उनका स्वभावसंगत ही होता है गुणधर्म नियत


शम दम तप शौच क्षान्ति आर्जव सात्विक गुणधर्म कहा जाता
विज्ञान ज्ञान आस्तिक्य आदि ही ब्राह्मण कर्म कहा जाता


धृति शौर्य तेज दक्षता युद्ध में अडिग रहे हो दानभाव
स्वाभाविक क्षात्रकर्म हैं ये स्वामित्वभाव क्षत्रिय स्वभाव


कृषि गोरक्षा वाणिज्य आदि होता स्वभाव से वैश्यकर्म
सेवा हो जहाँ सर्वजन की है वह स्वभाव से शूद्रकर्म


अपने स्वाभाविक कर्मों से ही परमसिद्धि मिल पाती है
उस विधि को सुन जिससे मानव को सिद्धि प्राप्त हो जाती है


सारे भूतों का कर्ता जो जिससे है सारा जगत व्याप्त
निज निज कर्मों से प्रभु की पूजा से होती है सिद्धि प्राप्त


विधिवत व्यवहृत परकीय धर्म से विगुण स्वधर्म श्रेष्ठतर है
होता है नहीं पापभागी निज धर्म कर्म श्रेयस्कर है


अवगुण कर्मों को वैसा ही ढक कर रखते, जिस तरह धुँए से अग्नि सदा आच्छादित है
निज सहज कर्म यद्यपि सदोष हों हे अर्जुन, उनका स्वभाव से त्याग सर्वथा अनुचित है


स्पृहा और आसक्ति रहित मन जब निज वश हो जाता है
वह मानव सांख्ययोग द्वारा नैष्कर्म्य सिद्धि पा जाता है


जो ज्ञान योग की कहलाती उत्तम निष्ठा, नैष्कर्म्य सिद्धि जिस मानव को मिल जाती है
अर्जुन उसका तू सार समझ जिसके फलतः, उस परमब्रह्म की प्राप्ति उसे हो जाती है


निज बुद्धि शुद्धि कर जो नर नियमित सात्विक भोजन करता है
शब्दादि विषय तज राग द्वेष एकान्तिक सेवन करता है


सात्विक धृति द्वारा अन्तःकरण इन्द्रियों को वश में करके
जो अपने मन वाणी शरीर को वश में करने वाला है
निःशेष हो गये हों जिसके अन्तस्तल के सब राग द्वेष
जो भली भाँति वैराग्य अटल का आश्रय लेने वाला है


जिसमें परिग्रह का भाव नहीं है दम्भ रहित, जो अहंकार बल काम क्रोध का है त्यागी
ममताविहीन जिसका स्वभाव है शान्तियुक्त, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म प्राप्ति का है भागी


जो एकनिष्ठ हो ईश्वर में ध्यानावस्थित, कांक्षाविहीन वह पुरुष न होता शोकपूर्ण
वह प्रसन्नात्मा पाता मेरी परमभक्ति, जो हर प्राणी के प्रति होता समभाव पूर्ण


उस पराभक्ति के द्वारा मुझ परमात्मा का, मैं जो जितना हूँ उसे ज्ञान हो जाता है
उस भक्ति शक्ति से मेरा पूर्ण स्वरूप समझ, वह भक्त मेरा मुझमें प्रविष्ट हो जाता है


मेरे आश्रित जो कर्मवान कर्मों का निष्पादन करता
मेरे प्रसाद से परम सनातन पद का आस्वादन करता


समबुद्धि योग के आश्रय से कर्मों को मुझमें कर अर्पण
हो करके मेरे परायण मन से मुझमें पूर्ण समर्पण कर


कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें ध्यान लगायेगा
तू मेरी कृपादृष्टि से संकट का सागर तर जायेगा
यदि अहंकारवश तूने मेरे इन वचनों को सुना नहीं
अपने जीवन के लक्ष्यों से तू नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा


है अहंकार तेरा केवल इस युद्ध पलायन का कारण
यह युद्ध विरति मिथ्याचिंतन तुझको अभियोजित कर देगा
अपने क्षत्रिय स्वभाव से तू इस तरह कहाँ बच पायेगा
तेरा स्वभाव तुझको बलात संग्राम नियोजित कर देगा


जिन कर्मों के प्रति विरति हुई है पार्थ मोह के वश होकर
उन स्वाभाविक कर्मों को करना ही होगा परवश होकर


ईश्वर हृदयस्थल में स्थित हर प्राणिमात्र काया के
वह भ्रमण कराता उन्हें यंत्रवत बन्धन से माया के


हे भारत अब तू पूर्ण भाव से ईश्वर के आश्रय में चल
पायेगा शाश्वत परमधाम उसके प्रसाद से शान्ति अचल


यह ज्ञान तुझे जो बतलाया यह है अति गोपनीय दुस्तर
इस गुप्त ज्ञान पर चिन्तन कर फिर जैसा चाहे वैसा कर


अत्यन्त रहस्य पूर्ण उन बचनों को फिर से समझाऊँगा
तू अतिशय प्रिय है मुझे अतः हितकारी ज्ञान बताऊँगा


हे अर्जुन मुझमें चित्त लगा बन भक्त मेरा फिर पूजा कर
करके सर्वस्व समर्पण तन मन धन से कर मुझको प्रणाम
तू मुझे प्राप्त कर जायेगा इसमें कोई संदेह नहीं, 
करता हूँ सत्य प्रतिज्ञा तू पायेगा मेरा परमधाम


सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा
कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा


गीता रूपी इन गुप्तज्ञान उपदेशों को, तप श्रद्धा भक्ति रहित लोगों से मत कहना
इच्छाविहीन जो रखता दोषदृष्टि मुझमें, ऐसे लोगों से इसे कदापि नहीं कहना


जो मेरे भक्तों को रहस्यमय गीता ज्ञान करायेगा
इसमें कोई संदेह नहीं वह मुझे प्राप्त हो जायेगा


उससे बढकर मेरा प्रिय जन अब तक न हुआ न कभी होगा
इस जग में उससे बढकर प्रिय कोई भी मुझे नहीं होगा


हम दोनों के संवादरूप गीता का जो अध्ययन करे
यह मेरा मत है ज्ञान यज्ञ से वह मेरा ही यजन करे


होकर सश्रद्ध अनुसूयदृष्टि जो भी गीता का श्रवण करे
वह मानव पापमुक्त होकर उत्तम लोकों में रमण करे


क्या पार्थ ! श्रवण कर गीता का मन में संकलन कर लिया है
हे अर्जुन ! क्या अज्ञानजनित भ्रम तम का दलन कर दिया है


 अर्जुन बोले


हे अच्युत ! मात्र आप ही की अनुकम्पा है
हो गए मोह सारे विनष्ट सुस्मृति में हूँ
प्रभु की सारी आज्ञायें मुझको शिरोधार्य
अब पूर्णतया संशयविहीन स्थिति में हूँ


संजय बोले


कृष्णार्जुन के संवादों का राजन प्रभाव बललाते हैं
अद्भुत रहस्य को सुन करके रोंगटे खडे हो जाते हैं


श्री व्यास कृपा से दिव्य दृष्टि को पा करके, उन कृष्णार्जुन को देखा और सुना मैंने
अर्जुन के प्रति गीता का गुप्त ज्ञान कहते, योगेश्वर के मुख से साक्षात सुना मैंने


श्रीकृष्णार्जुन संवाद बडे कल्याणपरक अद्भुत अपार
हे राजन ! उन्हें सोच करके हर्षित होता हूँ बार बार


विस्मयकारी वह रूप देख श्री हरि का घोर चकित होता
राजन ! मन में चिंतन करके मैं बार बार हर्षित होता


हैं जहाँ विराजित योगेश्वर श्रीकृष्ण धनुर्धर पार्थ जहाँ
मेरी दृढमति है अटल नीति होती श्री विजय विभूति वहाँ


            यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
            तत्र श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम ।


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Sunday, 28 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम -सत्रहवाँ अध्याय-श्रद्धा त्रय विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -सत्रहवाँ अध्याय
श्रद्धा त्रय विभाग योग


अर्जुन बोले


केशव ! जो शास्त्र निरत होकर करते हैं पूजा श्रद्धा मय
उनकी निष्ठा कैसी होती, सात्विक, राजस या तामस मय


भगवान बोले


इन श्रद्धाओं की हर मानव में तीन विधायें होती हैं
सात्विकी राजसी और तामसी ये श्रद्धायॆ होती हैं


जिसका अन्तस्तल है जैसा वैसी ही उसकी श्रद्धा है
वह पुरुष स्वयं वैसा होता है जैसी उसकी श्रद्धा है


सात्विक श्रद्धा वाले मानव देवों की पूजा करते हैं
राजसी पुरुष राक्षसों और यक्षों की पूजा करते हैं
तीसरी और निष्ठा है जो तामसी वृत्ति कहलाती है
तामसी वृत्ति के नर भूतों प्रेतों की पूजा करते हैं


विपरीत शास्त्र विधि के जो कल्पित घोर उग्र तप करते हैं
वे काम राग बल अहंकारमय दम्भ आचरण करते हैं


कायस्थ भूतगण, मुझको भी, होते वे कृश करने वाले
जिनका ऐसा आचरण वही होते आसुर स्वभाव वाले


हर प्राणी के स्वभाव के कारण अलग अलग, आहारों की भी तीन तरह की श्रेणी है
इनके सब पृथक पृथक भेदों को मुझसे सुन, तप दान यज्ञ की अपनी अलग त्रिवेणी है


बल बुद्धि आयु आरोग्य और जो सुखवर्धक, रसयुक्त भोज्य जो प्रीति बढाने वाले हैं
जो स्निग्ध और सुस्थिर हैं प्रिय सात्विक जन को, रुचिकर जो सात्विक भाव बढाने वाले हैं


कटु अम्ल लवण अति उष्ण तीक्ष्ण रूखे हैं जो, जो ज्वलन प्रदाहपूर्ण हैं और विदाहक हैं
उत्पन्न करें जो चिन्ता रोग और दुख को, वे भोज्य द्रव्य राजसी वृत्ति संवाहक हैं


अधपका रसरहित होता जो दुर्गन्ध पूर्ण, जो भी भोजन उच्छिष्ट पर्युषित होता है
स्वच्छता और शुचिता से जो तैयार नहीं, उसको पाकर तामसी उल्लसित होता है


यज्ञों का करना ही नर का कर्तव्य परम, इस मति से शास्त्र विहित जो यज्ञ किया जाता
जिसमें सन्निहित नहीं फल की अभिलाषा है, उन यज्ञों को ही सात्विक यज्ञ कहा जाता


हे भरत श्रेष्ठ ! फल अथवा दम्भाचरण हेतु, जो मानव यज्ञों का आयोजन करते हैं
कहलाते हैं ये यज्ञ सदा राजसी यज्ञ, ऐसों को ही राजसी वृत्ति जन कहते हैं


शास्त्रोक्त विधान हीन होता जो मंत्र रहित, दक्षिणा और श्रद्धा का जिसमें है अभाव
जिसमें हो अन्नदान सा पावनदान नहीं, उन यज्ञों का कहलाता है तामसी भाव


ब्राह्मणों ज्ञानियों गुरुओं का पूजन अर्चन, अथवा देवों का यजन और जप होता है 
शुचिता आर्जव ब्रह्मचर्य अहिंसा का पालन, मानव शरीर सम्बन्धी यह तप होता है


उद्वेगहीन, प्रिय, हितकारी, यथार्थ भाषण, अभ्यास सहित जो ईश नाम जप होता है
वेदों एवं शास्त्रों का पाठन पठन श्रवण, वाणी से सम्बन्धित सारा तप होता है


मन की प्रसन्नता शान्तभाव मन का निग्रह, भगवद चिंतन विचार जब मन में रहते हैं
अन्तस्तल में शुचिता पवित्रता रहे सदा, इसको ही मानस सम्बन्धी तप कहते हैं


पूर्वोक्त तरह के तीनों तप सात्विक कहलाये जाते हैं
निष्काम योगियों द्वारा श्रद्धा से अपनाये जाते हैं


सत्कार मान पूजा अथवा हो स्वार्थसिद्धि, पाखण्ड भाव से जो अपनाये जाते हैं
जिसका परिणाम सुनिश्चित होता नहीं कभी, राजसी भाव के तप कहलाये जाते हैं


अपनी काया मन वाणी को पीडित करके, मूढता पूर्वक हठ से जो तप  होता है
जिसमें अनिष्ट हो निहित दूसरे लोगों का, ऐसा अनिष्टकारी तामस तप होता है


जो दान दिया जाता है निज कर्तव्य समझ, जो देश काल या पात्रों के प्रति होता है
जिसमें हो प्रत्युपकार भावना निहित नहीं, सद्भावयुक्त वह दान सात्विक होता है


फल अथवा प्रत्युपकार भावना हो जिसमें, इस दृष्टिकोण से जो भी दान दिया जाता
जिसको प्रदान करने में होता महा कष्ट, राजसी भाव का दान वही है कहलाता


जिसमें हो असत्कार अथवा हो तिरस्कार, कलुषित भावना पूर्ण जो दान दिया जाता
जो अनुचित देश काल पात्रों के प्रति होता, वह दान सर्वथा तामस दान कहा जाता


सच्चिदानन्दघन ब्रह्म नाम कहलाता सदा ऊँ तत सत
उससे ही रचे गये ये ब्राह्मण वेद यज्ञ सम्पूर्ण जगत


है यही अपेक्षित ब्रह्मवादियों को शास्त्रों में है विधान
हरि नाम ऊँ का उच्चारण करके होते तप यज्ञ दान


तत नाम कहा जाता उसको जिसने सारा संसार रचा
तप दान और यज्ञों का फल उस परमात्मा को अर्पित है
जो है मुमुक्ष इच्छाविहीन उसका ऐसा ही चिंतन है
उसके द्वारा प्रदत्त सब कुछ उसके ही लिए समर्पित है


सत सत्य भाव में परमात्मा के लिए प्रयोग किया जाता
उत्तम कर्मों के करने में सत का उपयोग किया जाता


तप दान और यज्ञों में भी सत ही प्रयोग में आता है
जो कर्म समर्पित ईश्वर को वह भी सत ही कहलाता है


हे अर्जुन हवन दान तप जो श्रद्धाविहीन, अथवा जो हैं सत्कर्म न होते शुभकारी
श्रद्धा विहीन यह सब कुछ असत कहा जाता, परलोक, लोक दोनों में तनिक न हितकारी


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Saturday, 20 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सोलहवाँ अध्याय -दैवासुर सम्पद विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सोलहवाँ अध्याय 
दैवासुर सम्पद विभाग योग


भगवान बोले


जिसकी होती है ज्ञान योग में दृढ स्थिति, जो सत्व और संशुद्धियुक्त है पूर्ण अभय
सार्जव स्वाध्याय सहित शास्त्रों का पठन करे, दम दान यज्ञ तप में रत होकर सरल हृदय


हो सत्य, अक्रोध, त्याग, हिंसा का भाव नहीं, परनिंदारहित, शान्ति एवं कोमलता हो
हो विषय विरक्त, अनैतिकता के प्रति लज्जा, हो दयावान, मन में जिसके अचपलता हो


जिनमें अद्रोह, धृति, क्षमा, तेज एवं शुचिता, जो निज पूज्यता भाव से मुक्त पुरुषगण हैं
हे अर्जुन ये सारे गुण जो हैं बतलाये, दैवी सम्पदा युक्त पुरुषों के लक्षण हैं


अज्ञान घमण्ड दम्भ जिसमें है क्रोध भाव, जिसका है हृदय कठोर और अभिमान जिसे
अर्जुन जिसकी भी होती है प्रवृत्ति ऐसी, आसुरी सम्पदा वाला ही नर जान उसे


दैवी आसुरी सम्पदायें हैं इस जग में, आसुरी सम्पदायें देती हैं पृक्ति सदा
दैवी सम्पदावान अर्जुन तू शोक न कर, दैवी सम्पदा सर्वथा देती हैं मुक्ति सदा


हे पार्थ लोक में दो प्रकार के प्राणी हैं, पहले हैं जो होते दैवी स्वभाव वाले
विस्तार सहित दैवी स्वभाव को बतलाया, अब उनको सुन जो हैं आसुरी भाव वाले


आसुरी भाव वाले मनुष्य वे होते हैं, जिनको प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति का ज्ञान नहीं
जिनमें आचरण सत्य शुचिता का है अभाव, जिनके मन में इन सबके प्रति सम्मान नहीं


जग आश्रय रहित असत्य बिना ईश्वर के है, आसुरी वृत्ति वाले कहते संयोग मात्र
इसकी उत्पत्ति काम से है अन्यथा नहीं, है इसका कारण नर नारी सम्भोग मात्र


अवलम्बन लेकर मिथ्यापरक विचारों का, निज विमल स्वभाव नष्ट करके मतिमन्द हुए
सब भूतों के अपकारी वही क्रूरकर्मा, जग अहित हेतु उत्पन्न और स्वच्छन्द हुए


मद मान दम्भ दुष्पूर्य कामनायुक्त पुरुष, अपनी मति के अनुरूप अनुकरण करते हैं
अज्ञान और मिथ्या सिद्धांतों पर आश्रित, आचरणभ्रष्ट हो करके विचरण करते हैं


होकर आजीवन चिंताओं से युक्त सदा, विषयोपभोग में निशि दिन तत्पर रहते हैं
वे विषय भोग के सुख को सच्चा सुख समझें, इतना ही सुख है वे ऐसा ही कहते हैं


शतशत आशा की जंजीरों में फँसे हुए, वे काम क्रोध के वशीभूत होकर रहते
जिससे अधिकाधिक विषय भोग का अवसर हो, अन्याय पूर्वक धन बल का संग्रह करते


मैने यह इतना सब कुछ प्राप्त कर लिया है, आगे भी सभी मनोरथ पूर्ण करूँगा मैं
इतना सारा धन वैभव प्राप्त किया मैंने, फिर फिर इनसे निज को परिपूर्ण करूँगा मैं


मैंने अपने उस वैरी को है मार दिया, अन्यों को भी मारूँगा मैं बलवाला हूँ
सिद्धियाँ सभी मेरे चरणों की दासी हैं, मैं ईश्वर हूँ ऐश्वर्य भोगने वाला हूँ


मेरे समान है कौन बडा इस दुनिया में, मैं बडा धनाड्य और मेरा परिवार बडा
कर दान यज्ञ आमोद प्रमोद करूँगा मैं, ऐसा जो सोचे उसका है अज्ञान बडा


ये चित्तभ्रान्त नर मोहजाल से आच्छादित, अपने मन में झूठा भ्रम लेकर फिरते हैं
विषयोपभोग में लिप्त आसुरी वृत्ति युक्त, अपवित्र भयंकर महा नरक में गिरते हैं


धन मान मदान्वित निज को परम श्रेष्ठ समझें, स्तब्ध हुए निज महिमा मण्डन करते हैं
जो माना जाता शास्त्रों के विपरीत सदा, पाखण्ड पूर्ण वह यज्ञायोजन करते हैं


बल क्रोध घमण्ड कामना एवं अहंकार, से परिपूरित होकर पर निंदा करते हैं
मैं परमात्मा सबके शरीर में स्थित हूँ, वे नर समझो मुझसे ही ईर्ष्या करते हैं


जो द्वेष दूसरों से करते हैं पुरुष अधम, जो क्रूर हृदय हैं पाप आचरण करते हैं
जग में वे मेरी सृजित व्यवस्था अन्तर्गत, आसुरी योनियों को ही धारण करते हैं


मैं हूँ अप्राप्त मूढों को जन्मों जन्मों तक, भोगते वही आसुरी योनि की दुर्गति को
आसुरी योनियों से भी घोर नरक वाली, वे दुष्ट प्राप्त होते अत्यन्त नीच गति को


हैं आत्मविनाशक काम क्रोध लालसा सभी, यह इनका है गुणधर्म और मजबूरी है
ये तीनों ही नरकों का द्वार दिखाते हैं, इसलिए सर्वथा इनका त्याग जरूरी है


हे अर्जुन इन तीनों नरकों के द्वारों से, जो पुरुष स्वयं को पूर्णमुक्त कर पाता है
अपने कल्याण मार्ग पर जो नित चलता है, वह मुझे प्राप्त कर परमधाम पा जाता है


शास्त्रोक्त कर्म को त्याग पुरुष जो कामाचारी होता है
सुख सिद्धि परमगति नहीं किसी का भी अधिकारी होता है


हैं शास्त्र प्रमाणित, कार्याकार्य व्यवस्था में, तू तदनुरूप निज कर्मों का निष्पादन कर
शास्त्रानुसार जो नियत कर्म कहलाते हैं, हे अर्जुन तू उन कर्मों का सम्पादन कर


                                                          **********

















Friday, 12 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम -पंद्रहवाँ अध्याय -पुरुषोत्तम योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -पंद्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम योग
 भगवान बोले

जिस तरु की होती ब्रह्मारूप मुख्यशाखा, मैं उस अश्वत्थ जगत की जड हूँ कहलाता 
सब वेद कहे जाते हैं पत्ते उस तरु के, जो उसे तत्व से जाने वही वेद ज्ञाता


गुण विषयों रूप कोपलें जगत वृक्ष की ये, तिर्यक नर योनि रूप में हैं सर्वत्र व्याप्त
कर्मानुसार ये ममता और अहंता भी, वासना जडें ऊपर नीचे हर जगह व्याप्त


संसार रूप यह वृक्ष नहीं है दृढ स्थित, इस जगत वृक्ष की जडें अनादि अनंता हैं
वैराग्य शस्त्र से यह तरु छिन्न भिन्न कर दे, जिस तरु की मूलें ममता और अहंता हैं


जिसको पाकरके पुनरागमन नहीं होता, उस परमेश्वर का पद पाने का उपक्रम कर.
यह जग प्रवृत्ति विस्तारित है जिसके कारण, उस प्रभु स्वरूप के मनन ध्यान का प्रक्रम कर


जिसने जीता है संगदोष कामना सहित, अध्यात्मनित्य जिनके मदमान समाप्त हुए
सुख दुख रूपी द्वन्दों से जो हैं पूर्ण मुक्त, वे ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त हुए


होता है प्रत्यागमन नहीं जिसको पाकर के, शशि पावक में वह चमक नहीं उसको चमका दे
वह धाम मेरा है अतुलित परम प्रकाश पुंज सा, सूरज में भी वह तेज नहीं उसको दमका दे


वह अंश मेरा है जो शरीर में जीवात्मा कहलाता है
प्रकृतिस्थ सभी इन्द्रिय मन का वह आकर्षण करवाता है


जैसे समीर हर गंधों को अपने सँग में ले जाता है
वैसे आत्मा इन्द्रिय मन को नूतन तन में ले जाता है


आत्मा मन प्राण त्वचा रसना कानों का आश्रय लेता है
एवं नेत्रादि इन्द्रियों से विषयों का सेवन करता है


तन त्याग, शरीरस्थिति अथवा हो विषयभोग, ये स्थितियाँ अज्ञानी नहीं जानते हैं
जो ज्ञान विवेक रूप नेत्रों के स्वामी हैं, वे तत्ववेत्ता ज्ञानी इन्हें जानते हैं


कुछ यत्नपरायण होते हैं जो योगीजन, इस आत्मा का सम्यक होता है ज्ञान उन्हें
शुद्धान्तःकरण नहीं  जिनका, हैं अज्ञानी, इसके बारे में होता है अज्ञान उन्हें


जो तेज चन्द्रमा में है जो है पावक में, तू उसको मुझ परमेश्वर का ही तेज जान
वह तेज सूर्य का, जिससे जगत प्रकाशित है, उसको भी मुझ परमात्मा का ही तेज जान


हो परम सूक्ष्म करके प्रवेश इस पृथ्वी में, निज ऊर्जा से भूतों को धारण करता हूँ
रस रूप अमृतमय सोम रूप धारण करके, सारी औषधियों का मैं पोषण करता हूँ


हर प्राणी के तन में रचने बसने वाले, वह प्राणवायु बन मैं स्थित हो जाता हूँ
मैं ही अपान मैं ही वैश्वानर अग्निरूप, होकर के स्वयं चतुर्विध अन्न पचाता हूँ


मुझसे ही स्मृति ज्ञान अपोहन होता है, सब भूतों के हृदयों में निष्ठित मैं ही हूँ
वेदों का मैं ही कर्त्ता भी हूँ ज्ञाता भी, वेदों में ज्ञान स्वरूप प्रतिष्ठित मैं ही हूँ


पाये जाते हैं दो प्रकार के पुरुष यहाँ, पहला है नाशवान दूजा अविनाशी है
सब भूत प्राणियों के शरीर हैं नाशवान, आत्मा ही कहलाता अक्षर अविनाशी है


इन दोनों से भी उत्तम अन्य पुरुष है जो, वह तीनों लोकों का पोषक है धाता है
जिसको अक्षर अव्यय अविनाशी कहते हैं, वह परमपुरुष ही परमात्मा कहलाता है


इस नाशवान जडवर्ग क्षेत्र से मैं अतीत, मैं जीवात्मा से भी उत्तम कहलाता हूँ
सारे वेदों में मेरा ही गुणगान भरा, सारे लोकों में पुरुषोत्तम कहलाता हूँ


हे अर्जुन ! जो भी ज्ञानी नर पुरुषोत्तम मुझे समझता है
मुझ वासुदेव परमेश्वर को वह सब प्रकार से भजता है


अत्यंत ज्ञानमय गुप्त शास्त्र, इससे जो युक्त यथार्थ हुआ
निष्पाप पार्थ ! यह तत्व जान वह, समझो पूर्ण कृतार्थ हुआ


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