Thursday, 30 June 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सातवाँ एवं आठवाँ अध्याय


सातवाँ अध्याय - ज्ञान विज्ञान योग
भगवान ने कहा

जब तू आसक्तमना अनन्यनिष्ठापूरित, हो मुझमें पूर्ण परायण स्थिति योगयुक्ति
मुझको समग्र संशयविहीन तू देख सके, मैं तुझे बताऊँगा उसकी सम्यक प्रयुक्ति


विज्ञान ज्ञान से पूर्ण युक्त वह तत्वज्ञान, बतलाऊँगा रखूँगा कुछ अवशेष नहीं
जिस तत्वज्ञान का आत्मसात कर लेने से, रहता जग में कुछ और जानना शेष नहीं


जो इस जग में रहते कोटि कोटि पुरुषों में से, कोई कोई मेरी प्राप्ति का यत्नबीज बोता है
उनमें से कुछ होते मेरे पूर्णपरायण हैं, ऐसे विरले योगी को मेरा दर्शन ह्प्ता है


वायु, व्योम, भू, जल, पावक, मन, बुद्धि, अहंता राजित है
इस प्रक्रम में आठ तरह से मेरी प्रकृति विभाजित है


जो उपर्युक्त है आठ भेद वाली निसर्ग, अपरा कहलाती मेरी प्रकृति अचेतन है
है अन्य कि जो धारण करती सम्पूर्ण जगत, हे अर्जुन मेरी परा प्रकृति वह चेतन है


होता इनसे उत्पन्न चराचर जीव जगत, सम्पूर्ण जगत का मैं ही कर्ता धर्ता हूँ
इस अग जग का मुझको ही रचनाकार समझ, प्रलयंकारी मैं ही जग का संहर्ता हूँ


स जग का एकमात्र हूँ मैं समूल कारण, यह सारा जग मेरे ही द्वारा विरचित है
मणिमाला में मणियाँ ज्यों गुथीं हुई  होतीं, वैसे सम्पूर्ण जगत मुझमें अवगुण्ठित है


अर्जुन मैं जल में रस, वेदों में प्रणव हूँ
रवि शशि में द्युति, नभ में शब्द, नर विभव हूँ


पृथ्वी में पवित्र गंध पावक में आतप हूँ
जीवों में जीवन हूँ, तपस्वियों में तप हूँ


प्राणियों में सनातन बीज, बुद्धि हूँ मनस्वी में
ऐसा जान मुझे पार्थ, तेज हूँ तपस्वी में


काम राग से परे, शक्तिमानों में मैं ही बल हूँ
अर्जुन मैं धर्मानुकूल, प्राणी में कामानल हूँ


सात्विक, राजस, तामस भावों का मैं ही हूँ कारण
कभी न मैं उनमें, अथवा मैं करता उनको धारण


सात्विक, राजस, तामस गुण से परिपूर्ण जगत, का हर प्राणी मोहित रहता, मतिमान नहीं
जो मुझको इन तीनों से परे नहीं समझे, उसको मेरे अव्यय स्वरूप का ज्ञान नहीं


यह अति दुस्तर है मेरी त्रिगुणमयी माया, इसका जो प्राणी उल्लंघन कर जाते हैं
जो केवल मुझे निरंतर भजते रहते हैं, वे नर दुर्गम भवसागर से तर जाते हैं


जिनका माया के द्वारा अपहृत ज्ञान हुआ, वे मूढ दुष्ट आसुरी स्वभाव नहीं तजते
ऐसे दूषित कर्मों को करने वाले नर, मुझ अव्यय परमात्मा को कभी नहीं भजते


हे सत्कर्मी अर्जुन ! प्रायः जगतीतल में, सारे मनुष्यगण मुझे चतुर्था भजते हैं
जिज्ञासु, आर्त, अर्थाकांक्षी, अथवा ज्ञानी, अपनी वृत्यानुरूप ही मुझको भजते हैं


जिस मानव की मुझमें हो एकनिष्ठ श्रद्धा, वह ज्ञानी भक्त मुझे लगता है परम श्रेष्ठ
उस तत्ववेत्ता को मैं होता अतिशय प्रिय, वह भक्त मुझे उतना ही होता प्रिय यथेष्ट


ये सारे मेरे भक्त उदारमना होते, पर ज्ञानी को मेरा साक्षात स्वरूप समझ
जो मुझमें सम्यक स्थिर है, मेरा मत है, मद्गतज्ञानी को ही उत्तम गतिरूप समझ


जन्मों की अन्तिमता पर हो सद्ज्ञान प्राप्त, दुर्लभ होता ऐसा महत्मा आप्त पुरुष
’सब कुछ है वासुदेव’ ऐसा जो भजता है, है भक्त मेरा वह, तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष


जिनका अपहृत है ज्ञान विषय के चिंतन से, वे कामपुरुष ही भोग कामना करते हैं
अपने स्वभाव से प्रेरित विहित नियम द्वारा, अन्यान्य देवताअओं की पूजा करते हैं


जो जो होकरके श्रद्धायुक्त सकाम पुरुष, इच्छा करता, जिन जिन देवों का पूजार्चन
मैं उन सकाम भक्तों की मन की श्रद्धा का, उन देवों में कर देता स्थिर स्थापन


जो श्रद्धायुक्त सकाम पुरुष जिन देवों का, कामना हेतु आराधन पूजन करते हैं
मेरे ही द्वारा विहित देवताओं द्वारा, वे उन इच्छित भोगों का सेवन करते हैं


इन अल्पबुद्धि पुरुषों का फल है नाशवान, देवार्चक देवों को ही प्राप्त हुआ करते
कोई भी हों जो केवल मुझको भजते हैं, वे भक्त मेरे मुझको ही प्राप्त हुआ करते


जो बुद्धिहीन अथवा अज्ञानी होते हैं, उनको अविदित, मेरा अविनाशी परम भाव
मानव समान ही मुझमें उनको दिखता है, इन्द्रिय विकार, विषयों से पूरित व्यक्तिभाव


रहता प्रच्छन्न योगमाया से मैं निज की, इसलिए सभी को मैं प्रत्यक्ष नहीं होता
जानता नहीं मुझ अविनाशी परमेश्वर को, जग में वह नर जो दर्शनदक्ष नहीं होता


हे अर्जुन मैं तीनों कालों का दृष्टा हूँ, हैं ज्ञात सभी प्राणी मुझको, हों कोई भी
जितने हैं मानव जग में श्रद्धा भक्ति रहित, जानता नहीं उनमें से मुझको कोई भी


हे अर्जुन इस जग में जितने भी प्राणी हैं, वे इच्छा द्वेष आदि द्वन्द्वों से मोहित हैं
अनुभूति उन्हें सुख दुख है विचलित करती, इसलिए पूर्ण अज्ञान तमस से पोहित हैं


निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्म करने वाले, जो राग द्वेष से जनित मोह को तजते हैं
दृढ निश्चय करके मन से पापमुक्त होकर, वे भक्त मुझे ही सब प्रकार से भजते हैं


मेरा आश्रय ले जरा मरण के बंधन को, काटने हेतु मन में जो पुरुष ठानते हैं
अध्यात्म, ब्रह्म अथवा सम्पूर्ण कर्म क्या है, इसको वे ही नर भली प्रकार जानते हैं


अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ सहित, मैं आत्मरूप सबका, जो पुरुष जानते हैं
जिसको देहावसान पर भी यह ज्ञात हुआ,वे युक्तचित्त वाले ही मुझे जानते हैं


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आठवाँ अध्याय - अक्षर ब्रह्म योग
अर्जुन बोले


हे पुरुषोत्तम मुझे बताओ कर्म किसे कहते हैं, क्या है यह अध्यात्म और फिर ब्रह्म किसे कहते हैं
कहते हैं अधिभूत किसे, यह भी मुझको बतलाओ, बतलाओ विस्तार सहित, अधिदैव किसे कहते हैं


इस शरीर में कैसे और कहाँ रहता है, मधुसूदन ! अधियज्ञ कौन है? मुझे बताओ
युक्तचित्त वाले पुरुषों को अंत समय में, ज्ञेय आप कैसे उनको, यह भी समझाओ


भगवान बोले
ब्रह्म परम अक्षर होता, उसके स्वरूप को, जीवात्मा अथवा अध्यात्म कहा जाता है
भूतभाव के उद्भवकारी त्याग मात्र का, कर्म नाम से ही संज्ञान लिया जाता है


नाशवान सारे पदार्थ अधिभूत कहाते, सूक्ष्मशरीर आत्मा को अधिदैव समझना
श्रेष्ठ देहधारी अर्जुन ! मुझ वासुदेव को, यहाँ मात्र तुम एकमेव अधियज्ञ समझना


मेरा ही स्मरण कर रहा जो प्राणी, अन्तकाल में जब शरीर का त्याग करे
किसी तरह का इसमें संशय नहीं कोई, वह मानव मेरे स्वरूप को प्राप्त करे


अन्तकाल पर काया त्याग समय पर मानव, युक्त हुआ रहता है जिस धारणा भाव से
हे कौन्तेय ! प्राप्त होता वह उसी भाव को, क्योंकि वह भावित रहता है उसी भाव से


इसलिए पार्थ कर युद्ध, और मेरा चिंतन, मेरा स्वरूप यदि मन में पूर्ण व्याप्त होगा
मन बुद्धि सहित सारे कर्मों के अर्पन से, तू पूर्णरूप, निश्चय ही मुझे प्राप्त होगा


अभ्यास योग से युक्त चित्त हो करके जो, उस परमपुरुष का चिंतन करता जाता है
हे पार्थ ! अविचलित, ध्यानयुक्त, एकाग्रमना, होकर वह नर परमेश्वर को पा जाता है


सर्वत्र, अनादि, नियंता, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सबका धाता चिन्तनातीत अज्ञान परे
वह सूर्य समान नित्यचेतन आलोकरूप, जो उस सच्चिदानन्दघन का स्मरण करे


वह भक्तियुक्त नर अन्तकाल के आने पर, कर योगशक्ति से भृकुटि मध्य निज प्राणस्थित
निश्चल मन से ईश्वर का ध्यान स्मरण कर, हो जाता दिव्य पुरुष परमात्मा में स्थित


जिसको पाने को ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य चुनें, वेदों के ज्ञाता जिसको कहते अविनाशी
उस परमधाम का मैं रहस्य बतलाऊँगा, जिसमें जाते हैं वीतराग के संयासी


जो इन्द्रिय के सब द्वारों को संयमित करे, मन और हृदय संवेगों को निरुद्ध करके
ईश्वर की योगधारणा में होकर स्थित, मस्तक में प्राण रोककर मन विशुद्ध करके


जो मानव अन्तकाल में कायात्याग समय, भजता है अक्षरब्रह्म रूप ऊँकार नाम
मैं जिसका अर्थरूप हूँ निर्गुण पारब्रह्म, चिंतन करनेवाला पा जाता परमधाम


जो एकनिष्ठ होकर करता स्मरण मेरा, जो सतत नित्यशः मुझमें ध्यान लगाता है
उस योगी को ही मैं होता हूँ सहज सुलभ, वह योगी मुझ पुरुषोत्तम को पा जाता है


जो परमसिद्धि को प्राप्त हुए है ज्ञानीजन, सम्पूर्णरूप से हो जाते मुझमें नियुक्त
जो है क्षयिष्णु दुख का आगार कहाता है, उस पुनर्जन्म से हो जाते वे पूर्णमुक्त 


हैं ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती, अर्जुन, हैं सब सब अनित्य, कालावधि सीमित हैं
मेरे भक्तों का पुनरागमन नहीं होता, मैं कालातीत मेरी शक्तियाँ असीमित हैं


है एक सहस्र चतुर्युग सम ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की एक रात्रि भी उतनी ही लम्बी
वे योगी कालतत्ववेत्ता कहलाते हैं, जो हैं इन तथ्यों के अनुकारी अवलम्बी


ब्रह्मा के दिन का जब होता आरंभकाल, सम्पूर्ण चराचर भूत उत्पन्न हुआ करते
ब्रह्मा की रात्रि आगमन पर सारे प्राणी, उनके तन में विलीन प्रच्छन्न हुआ करते


हे पार्थ समस्त भूत प्राणी समुदाय यहाँ, पैदा होकर हो जाते पूर्ण प्रकृति अधीन
दिन के प्रवेश पर होते हैं उत्पन्न सभी, पर रात्रि काल में होते ब्रह्मा में विलीन


जिसको अव्यक्त कहा जाता है उससे भी, अत्यन्त परे अव्यक्तभाव होता अनन्त
सारे भूतों के भी विनष्ट हो जाने पर, उस परम दिव्य सत्ता का होता नहीं अन्त


अव्यक्तभाव को कहा परमगति जाता है, वह अव्यक्त अक्षर ही होता है नाम मेरा
जिसको पाने पर पुनरागमन नहीं होता, अव्यक्तभाव का वही सनातन धाम मेरा


जिस परमात्मा के अन्तर्गत हैं सब प्राणी, जिसकी सत्ता से है यह सारा जगत व्याप्त
बस एक अनन्यभक्ति ही ऐसा साधन है, जिससे होता अव्यक्त सनातन पुरुष प्राप्त


उस कालखण्ड का बोध करो अर्जुन योगी, जब देह त्याग कर वापस कभी न आते हैं
उसको भी मैं विस्तार सहित समझाऊँगा, जब मरने पर वे पुनर्जन्म पा जाते हैं


ज्योतिर्मय पावक जिस पथ का अभिमानी देव कहाता है
जिस दिन, जिस शुक्लपक्ष, उत्तरायण पर अधिकार जमाता है
योगी जन ब्रह्मवेत्ता जिस पथ में निज देह त्याग करते
उन देवों के द्वारा उनको क्रमशः ले जाया जाता है


धूमक जिस रात्रि अश्वेतपक्ष दक्षिणायन पर छाया रहता है
अथवा जिस भ्रमणमार्ग का अभिमानी देवता कहाता है
उस पथ प्रस्थित सकाम मानव, चन्द्रमा ज्योति को प्राप्त करे
अपने शुभ कर्मों का फल पाकर फिर से वापस आता है


इस जग के शुक्ल कृष्ण रूपी दो भेद बताये जाते हैं
जो देवयान औ’ पितृयान के मार्ग सनातन कहलाते
जो देवयान में मरते हैं पाते हैं वही परमगति को
जो पितृयान में देहत्याग करते हैं, वे वापस आते


हे अर्जुन ! इन दोनों मार्गों के संज्ञानी, कोई भी योगी तनिक न भ्रम आभास करे
समबुद्धियोग से युक्त हुआ तू हे अर्जुन, इसलिए मुझे पाने का सतत प्रयास करे


वेदाध्ययन, दान, तप, यज्ञ का पुण्य, करता जो सबके फलों का उल्लंघन
इस तत्व को जानकर पूर्ण्योगी, है प्राप्त करता परमपद सनातन


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Tuesday, 28 June 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम- अध्याय छः -आत्म संयम योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम 
अध्याय छः -आत्म संयम योग


भगवान बोले


जो नर कर्मों के फल के प्रति हो उदासीन, करता सत्कर्म वही योगी कहलाता है
जो अग्नि त्याग, या क्रिया त्याग करता केवल, संयासी अथवा योगी नहीं कहाता है


संयास योग को कहते हैं संयासी ही योगी होता
संकल्प रहैत जो हुआ नहीं वह पुरुष नहीं योगी होता


योगारूढी इच्छा वाले उन मुनियों का, है हेतु कहाता कर्मों में निष्काम भाव
ऐसी योगस्थिति प्राप्त हुए हर मानव की, शुभता का हेतु सभी संकल्पों का अभाव


जब किसी काल में मानव इन्द्रिय भोगों में, अथवा कर्मों में भी आसक्त न होता है
है योगारूढ कहाता, जो अपने सारे, संकल्पों का त्यागी नर योगी होता है


अपना उद्धर स्वयं करना होता नर को, उसको ही स्वयं रोकना है अवसादन भी
यह आत्मा कभी मित्रता सा व्यवहार करे, पर वही कभी, उसका बन जाता दुश्मन भी


जिस मानव ने निज मन इन्द्रिय को जीत लिया, उस मानव के प्रति आत्मा पूर्ण मितवत है
अपनी इन्द्रिय मन पर जिसका अधिकार नहीं, उसके प्रति आत्मा होता पूर्ण शत्रुवत है


सुख दुख मानापमान में जो सम रहता है, हर वृत्ति शान्त है अन्तःकरण व्यवस्थित है
ईश्वर ही नित्य विराजित है जिसके मन में, वह आत्मवशी परमात्मा में ही स्थित है


विज्ञान ज्ञान से पूर्ण तृप्त है मन जिसका, जिस नर की स्थिति अविकारी इन्द्रियजित है
जो भेद न देखे मिट्टी पत्थर सोना में, ऐसा ही योगी परमात्मा में स्थित है


जो बन्धु, सुहृद, मध्यस्थ, मित्र में सम रहता, वैरी द्वेषी या उदासीन से खेद नहीं
वह कहलाता समबुद्धियुक्त नरश्रेष्ठ पुरुष, धर्मात्मा पापी में जो करता भेद नहीं


वश में शरीर करके निज मन इन्द्रिय समेत, आशा संग्रह का भाव न जिसकी आत्मा में
उस योगी को चाहिए परम एकान्तवास, पाकर के निश्चल ध्यान करे परमात्मा में


जो शुद्ध, शान्त हो, ऐसा भूस्थल चुनकर, हो बिछा कुशा मृगछाला और वस्त्र आसन
जो हो अत्यधिक न ऊँचा अथवा नीचा हो, उसका अनुकूलन करके दिव्य प्रतिष्ठापन


उस आसन पर स्थित होकर एकाग्रमना, चित्तेन्द्रिय को अपने वश में सायास करे
फिर इन्द्रियजनित क्रियाओँ को निष्क्रिय करके, निज अन्तःकरण शुद्धि का योगाभ्यास करे


काया शिर एवं ग्रीवा को सुस्थिर करके, नासा के अग्रभाग पर दृष्टि जमा करके
निश्चल हो ईश्वर के स्वरूप में ध्यानमग्न, परितः दृश्यों से अपना ध्यान हटा करके


कर छिन्न भिन्न मन के सारे भय संशय को, मन शान्त, संयमित, पालन करता ब्रह्मचर्य
जिसकी सब चित्तवृत्तियाँ हों मुझमें प्रवृत्त, ऐसे नर को मिलता है मेरा साहचर्य


निज मन को वश में करने वाले जिस नर की, आत्मा का चिंतन मुझमें सदा व्याप्त होता
जो मुझ परमात्मा के स्वरूप में संस्थित है, ऐसे योगी को परमानन्द प्राप्त होता


जो भोजन या उपवास अधिकतम करता है, जो मानव रहता अधिक समय तक सोता है
यह योग कभी भी उसका सिद्ध नहीं होता, जो मानव अधिक जागने वाला होता है


कर्मों में जिसकी चेष्टायें है यथायोग्य, जिस नर का समुचित यथायोग्य 
जो यथायोग्य सोता है और जागता है, यह दुःखविनाशी योग उसी का सिद्ध जान


जब आत्मनियंत्रित चित्त पूर्ण परमात्मस्थित हो जाता है
सब भोग स्पृहा रहित पुरुष तब योगयुक्त कहलाता है


जैसे निर्वात स्थल पर कोई दीपशिख, होकर अचलायमान स्थिर हो जाती है
वैसे ईश्वर में ध्यानावस्थित योगी की, स्वाधीन मनःस्थिति स्थिर हो जाती है


जब योगयुक्ति द्वारा हो पूर्ण निरुद्ध चित्त, होकर सुशन्त विश्रान्त और उपराम हुआ
जब आत्मा में परमात्मा को साक्षात करे, परमात्मा का आश्रय उसका सुखधाम हुआ


जिसका अनुभव होता है सूक्ष्मबुद्धि द्वारा, वह परम अनन्तानन्द इन्द्रियों से अतीत
उसका अनुभव कर स्थित हो परमात्मा में, वह पुरुष नहीं होता कदापि विचलित प्रतीत


परमात्मा प्राप्ति रूप आनन्द जिसे मिलता, जो माने अन्य न बडा लाभ सुख इस सुख से
परमात्मा की सम्प्राप्ति उसे हो जाती है, वह योगी कभी न डिगता है दारुण दुख से


यह योग परम साधन है जीवनयात्रा का, जो होता है दुख सागर से संयोग रहित
उसको धारण करना है नर का श्रेष्ठ कर्म, स्थिरमन से उत्साहपूर्वक धैर्य सहित


संकल्पों के प्रभाव से पूर्ण अशेष करे, मन में फैले सारे कामना वितानों को
तदनन्तर पूर्ण विनियमित करके भलीभाँति, अपने मन के समस्त इन्द्रिय संस्थानों को


अभ्यास क्रमिक करके उपरति को प्राप्त करे,स्थिरमन का कर परमात्मा में स्थापन
परमात्मा में ही ध्यान हमेशा लगा रहे, परमात्मा के अतिरिक्त न हो कोई चिंतन


जिन जिन विषयों के प्रति मन विचरण करता है, उनसे मन की चंचल गति को अवरुद्ध करे
मन के चिंतन की धारा दिशा मोड करके, परमात्मा की सत्ता में उसे निरुद्ध करे


जिसका मन पूर्ण शान्त है, जो है पाप रहित, हों सभी रजोगुण की चेष्टायें पूर्ण शान्त
योगी जो होता पारब्रह्म में पूर्ण लिप्त, उसको होता उत्तम सुख परमानन्द प्राप्त


वह पाप रहित योगी इस तथाकथित विधि से, जो सतत लगाता आत्मा को परमात्मा में
सुखरूप सच्चिदानन्द उसे मिल जाता है, अनुभव करता आनन्द परम परमात्मा में


व्यापक असीम चेतन में एकनिष्ठ स्थित, आत्मा को ही सब भूतों में स्थित देखे
जो योगयुक्त है समभावी समदर्शी है, सब भूतों को आत्मा में ही कल्पित देखे


सब भूतों को मुझमें, मुझको सब भूतों में, देखे जो व्यापक, मुझसे लुप्त नहीं होता
जो सब भूतों का मुझको समझे आत्मरूप, उस नर से मेरा कुछ भी गुप्त नहीं होता


सब भूतों में हूँ आत्मरूप से मैं स्थित, इस मत से जो मुझ परमात्मा को भजता है
वह योगी यद्यपि सब प्रकार से बरत रहा, फिर भी समझो वह मुझमें नित्य बरतता है


जो योगी आत्मवत सब भूतों में सम देखे, सुख हो अथवा दुख दोनों में सम होता है
हे अर्जुन, मेरा यही परम दृढ अभिमत है, वह योगी मुझको परमश्रेष्ठ प्रिय होता है


अर्जुन बोले


समभावरूप जो योग आपने बतलाया, इसकी स्थिरता में संशय है मधुसूदन
मैं नहीं देखता इसको स्थायी अविचल, क्योंकि अत्यन्त चपल होता है मानव मन


हे कृष्ण, बडा ही चंचल होता है यह मन, दृढ प्रमथनकारी एवं प्रबल भयंकर है
जैसे अत्यंत रोकना कठिन प्रभंजन को, वैसे ही इसका निग्रह करना दुष्कर है


भगवान बोले


हे महाबाहु, यद्यपि मन होता बडा चपल, जो बडी कठिनता से ही वश में आता है
लेकिन हे कुन्तीसुत अर्जुन, वैराग्य और, अभ्यास अनवरत से वश में हो जाता है


जिसका है नहीं नियंत्रण कोई निज मन पर, उस मानव द्वारा योगप्राप्ति असम्भव है
मेरा मत है, जो आत्मवशी है यत्नशील, यह योगप्राप्ति उसके ही द्वारा संभव है


अर्जुन बोले


जो श्रद्धापूर्ण, परन्तु असंयम है जिसमें, हे केशव, जो विचलन को प्राप्त हुआ करता
जिसको न हस्तगत हुई अन्त में योगसिद्धि, ऐसा साधक किस गति को प्राप्त हुआ करता


ही महाबाहु, ऐसा विचलित मोहित मानव, वंचित हो भगवद्प्राप्ति हेतु छाया से भी
क्या छिन्न भिन्न होकर वह बादल के समान, होता सुदूर मायापति से, माया से भी


हैं कृष्ण आप ही, योग्य समर्थवान केवल, मेरे मन के समस्त भ्रम संशय भेदन में
इस जग में दिखता और दूसरा नहीं क्वचित, जो हो समर्थ भ्रम तम के मूलोच्छेदन में


भगवान बोले


अर्जुन, किंचित परलोक लोक में कहीं नहीं, उस योगभ्रष्ट की दुर्गति या विनाश होता
कल्याणपरक प्रभु प्राप्ति कर्म करने वाले, ऐसे मानव का सचमुच नहीं नाश होता


जो योगभ्रष्ट होते, वे पुण्यकारियों के, स्वर्गादि परम उत्तम लोकों को जाते हैं
चिरकाल बिताकर वहाँ अनन्तर शुभकर्मा, श्रीमानों के घर में नवजीवन पाते हैं


या उन लोकों में नहीं किसी योगी गृह में, उस वैरागी मानव को जन्म सुलभ होता
लेकिन इस विधि से ऐसा पुनर्जन्म होना, जग में हर नर के लिए बहुत दुर्लभ होता


उस पूर्वजन्म के संचित सारे बुद्धियोग, से नर संस्कारों को पा जाता अनायास
हे कुरुनंदन, उसके प्रभाव से वही पुरुष, फिर योगसिद्धि खातिर करता बढकर प्रयास


पिछले संस्कारों से ईश्वर में लीन हुआ, यद्यपि वह परवश अन्यान्तर्गत होता है
जिज्ञासु, समत्वबुद्धि में स्थित योगयुक्त, वह मानव शब्दब्रह्म पारंगत होता है


जो नित्य प्रयत्नपूर्वक योगाभ्यास करे, पापों से छुटकारा मिलता है उस यति को
पिछले जन्मों के संस्कारों से सिद्ध पुरुष, हो पापरहित, पा जाता प्राप्त परमगति को


ज्ञानी, तपसी से योगी होता सदा श्रेष्ठ, हे अर्जुन, तू प्रभु प्राप्ति हेतु उद्योगी बन
योगी है श्रेष्ठ सभी सकाम कर्ताओं से, इसलिए पार्थ, तू योगी बन, तू योगी बन


सम्पूर्ण योगियों में वह श्रद्धायुक्त पुरुष, है अधिक श्रेष्ठ, जिसकी साधना चिरंतन है
जो पूर्णरूप से मेरे हुआ परायण है, वह परम श्रेष्ठ है, ऐसा मेरा चिंतन है
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Saturday, 25 June 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम- अध्याय पाँच- कर्म संयास योग

अध्याय पाँच- कर्म संयास योग

अर्जुन बोले


कर्मों के प्रति संयास और फिर कर्मयोग, दोनों की जब तब करते आप प्रशंसा हैं
इन दोनों में से मेरे लिए कौन हितकर, है अधिक, आप जिसकी करते अनुशंसा हैं


भगवान बोले


कर्मों के प्रति संयास योग का साधन भी, एवं यह कर्मयोग दोनों हैं हितकारी
वैभिन्य अगमता और सुगमता का केवल, है कर्मयोग ही, सुगम श्रेष्ठतर हितकारी


जो रखता नहीं द्वेष आकांक्षा अन्यों से, वह कर्मयोग साधक संयासी कहलाता
जो राग द्वेष आदिक द्वन्द्वों से रहित हुआ, अर्जुन, उसका सुख से भव बंधन कट जाता


है सांख्य और ये कर्मयोग दोनों अभिन्न, अज्ञानी है जो इनमें भेद बताता है
दोनों में से कोई भी सिद्ध हुआ जिसको, वह परमात्मा की सत्ता से मिल जाता है


जिस परमधाम को पाता ज्ञानमार्ग साधक, वह कर्मवान नर को भी प्राप्त हुआ करता
जो ज्ञान कर्म योगों को देखे एकरूप, उसको ही सच्चा दर्शन प्राप्त हुआ करता


मन वचन कर्म कृत कर्मों में कर्तापन का अभाव होना, 
ऐसी स्थिति निष्काम कर्म साधन से प्राप्त हुआ करती
जो कर्मयोग साधक चिंतन करता भग्वदस्वरूप का है
उसको परमात्मा परमब्रह्म की तत्क्षण प्राप्ति हुआ करती


जिसका मन हो निज वश में और जितेन्द्रिय हो, शुद्धान्तःकरणयुक्त हो आत्मतृप्त रहता
अपनी आत्मा को जो परमात्मरूप देखे, ऐसा ही मानव कर्मों से अलिप्त रहता


देखना सूँघना छूना सुनना या चलना, भोजन करना सोना या श्वाँस ग्रहण करना
ये हैं निसर्ग के गुण जो गुण में बरत रहे, है तत्ववेत्ताओं का चिंतन या कहना


बातें करना या किसी वस्तु का त्याग ग्रहण, होता निमेष अथवा होता है उन्मीलन
इन्द्रियाँ स्वयं अपने अर्थों में बरत रहीं, निज कर्तापन का भवरहित हो सब चिंतन


परमात्मा में आधान करे निज कर्मों का, जो कर्मों के फल में आसक्त नहीं होता
जैसे जल से होता अक्लेद्य है कमलपत्र, वैसे वह पापों से संपृक्त नहीं होता


आसक्ति त्याग कर करते कर्म कर्मयोगी, इन्द्रिय शरीर मन द्वारा ममताबुद्धि रहित
सारे कर्मों के प्रति रखकर निरपेक्ष भाव, होकर गतसंग और शुद्धन्तःकरण सहित


जो कर्मों के फल का परित्यागी होता है, सुख शान्ति प्राप्त करता है वह निष्काम पुरुष
जो फलासक्ति से युक्त कामना से प्रेरित, भवबंधन से बँधता है वही सकाम पुरुष


वह संयासी जिसका मन हो उसके वश में, कुछ भी करवाता नहीं, न कुछ भी करता है
नवद्वारों वाले नर शरीर रूपी गृह में, ईश्वर स्वरूप में सानंद स्थित रहता है


नर के कर्तापन, कर्मों या उसके फल में, ईश्वर की किंचित कहीं न भागीदारी है
नर का अपना स्वभाव ही सब कुछ बरत रहा, सब कर्मों में उसकी ही जिम्मेदारी है


जग में मानव के सभी शुभाशुभ कर्मों को, ईश्वर बिल्कुल ही अपने पास नहीं लेता
इसलिये सभी प्राणी मोहित होते रहते, जब अन्तस का अज्ञान ज्ञान को ढक लेता


अपने मन में छाए अज्ञान तमस को जो, निज तत्वज्ञान से पूर्णविनाशित करता है
उसका ज्ञान सूर्य की किरणों के समान, सच्चिदानन्दघन रूप प्रकाशित करता है


जिसका मन एकरूप होता परमात्मा से, जिसकी मतिगति परमात्मा में होती विराम
वह ईशपरायण पुरुष पाप से रहित हुआ, पा जाता है वह मोक्ष परमगति परमधाम


जो ज्ञान और विद्या से पूर्ण अलंकृत हैं, हैं विनयशीलता के निधान जो शिष्टि युक्त
ब्राह्मण चाण्डाल गाय हाथी श्वानों के प्रति, ऐसे मानव ही होते हैं समदृष्टि युक्त


जिस नर के मन की स्थिति है समभवपूर्ण, समझो उसने सारा जग वैभव जीता है
परमात्मा है निर्दोष और समरूप सदा, ऐसा नर ब्रह्मतत्व का अमृत पीता है


अप्रित होने पर कोई भी उद्वेग न हो, प्रिय वस्तु प्राप्ति पर हर्ष नहीं होता जिसको
वह स्थिरबुद्धि ब्रह्मविद है संशयविहीन, ईश्वर में एकनिष्ठ स्थित समझो उसको


जो बाह्यविषय के प्रति होता आसक्तिरहित, उसके मन में सात्विक आनंद व्याप्त होता
तदनन्तर ध्यानयोग में स्थित उस नर को, परमात्मा का अक्षय आनन्द प्राप्त होता


इन्द्रिय द्वारा जब विषय भोग नर करता है, यद्यपि ये पुरुषों को सुखरूप भासते हैं
होते हैं ये अनित्य दुःख के कारण बनते, ज्ञानी विवेकमय पुरुष न उनमें रमते हैं


जो काम क्रोध के वेग सहन कर मृत्युपूर्व, होता बिल्कुल इनके प्रभाव से मुक्त पुरुष
इस जग में उसका ही जीवन सार्थक होता, कहलाता है वह सुखी, योग से युक्त पुरुष


जो अपनी आत्मा में ही सुख का अनुभव कर, आत्मा में ज्ञानयुक्त होकर ही रमण करे
परमात्मा में हो जिसकी एकनिष्ठ श्रद्धा, वह संयासी परमात्मा में ही श्रयण करे


जिनके सारे कल्मषकषाय का शमन हुआ, जिनके मन में है शेष नहीं कोई संशय
इन्द्रियजित, परहितरत, प्रभु में स्थिर स्थित, होता है शान्त ब्रह्म का उन्हें प्राप्त आश्रय


उद्वेलित जिन्हें नहीं करते हैं काम क्रोध, जो कर लेता है अपने मन पर विजय प्राप्त
हो चुका जिसे परमात्मा का साक्षात्कार, उसके मत में परमात्मा है सर्वत्र व्याप्त


बाहर के विषय भोग से पूर्ण अक्षुण्ण रहे, निज नेत्र दृष्टि को भृकुति मध्य में स्थित कर
नासिका मध्य से बहने वाली श्वाँस रूप, उस प्राणापान वायु को सम्यक स्थिर कर


मन बुद्धि और इन्द्रियाँ जीत ली हैं जिसने, वह निरहंकारी मोक्षपरायण परमशुक्त
जिसको इच्छा भय क्रोध न विचलित करते हैं, ऐसा मुनिश्रेष्ठ कहा जाता है सदामुक्त


मैं एकमात्र भोक्ता सारे तप यज्ञों का, सबका हितकारी, सब पर मेरी कृपा चरम
सारे लोकों का स्वामी जो मुझको माने, उस तत्वज्ञानी को मिलती है शान्ति परम


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Thursday, 23 June 2011

अध्याय चार- ज्ञान कर्म संन्यास योग

ज्ञान कर्म संन्यास योग
भगवान बोले

सूरज से यह अविनाशी योग कहा मैंने, फिर कहा सूर्य ने निज सुत वैवस्वत मनु से
यह योग इस तरह क्रमशः हस्तांतरित हुआ, इक्ष्वाकु नृपति ने पाया वैवस्वत मनु से


था इसको परम्परा में पाया ऋषियों ने, उनकी संततियों में इसका अवधान हुआ
कालान्तर में यह दीर्घकाल तक लुप्त रहा, इसके प्रसार में बहुत बडा व्यवधान हुआ


है भक्त सखा प्रिय, अतः तुझे बतलाया योग पुरातन है
उत्तम रहस्यमय गोपनीय शाश्वत है और सनातन है


अर्जुन बोले


बीता न अधिक है समय आप को जन्म लिए, पर सूर्य कल्प आरंभ काल में आया था
मैं कैसे समझूँ क्या सच है, कितना सच है, जिसको प्रभु ने यह अव्यय योग बताया था


भगवान बोले


मेरे तेरे अब तक हो चुके अनेक जन्म, हो चुका परन्तु तुझे वह अब तक विस्मृत है
मैं अन्तर्यामी हूँ मैं सब कुछ देख रहा, मुझको जन्मों का हाल पूर्णतः स्मृत है


मैं अज अविनाशी प्राणीश्वर होकरके भी, अपनी निसर्ग को निजाधीन कर लेता हूँ
मैं अपनी योगजन्य माया का अश्रय ले, जग में मन चाहा रूप प्रकट कर देता हूँ


जब जब होता है इस धरती पर धर्मपतन, जब जब अधर्म का रूप कुरूप विकट होता
तब मैं अनित्य प्राणी शरीर धारण करता, जग में मेरा साकार स्वरूप प्रकट होता


मैं आता साधु सज्जनों के उद्धार हेतु, जग के सारे पापीगण के संहार हेतु
हर युग में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ, उस शाश्वत और सनातन धर्म सुधार हेतु


ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक हैं, जिस मानव को हो जाता है यह ज्ञान प्राप्त
उसको जन्मों के बंधन बाँध न पाते हैं, वह अन्तकाल में निश्चित होता मुझे प्राप्त


जिनका था पूर्ण नियंत्रण क्रोध राग भय पर, जो एकनिष्ठ हो मुझ पर केवल थे आश्रित
इस ज्ञानरूप तप से वे परम पवित्र हुए, निर्बंध हुए मेरे स्वरूप में हैं स्थित


मैं भी उन भक्तों को वैसा ही भजता हूँ, मेरे आराधक जैसा मुझको भजते हैं
मैं उन्हें मुक्ति का साधन मार्ग दिखाता हूँ, सारे मानवगण मेरा अनुसरण करते हैं


वह पुरुष देवताओं का पूजन करता है, जो भी निज कर्मों के फल का अनुरागी है
होते हैं शीघ्र प्रसन्न देवता पूजा से, वह अभिलाषी नर सकल सिद्धि का  भागी है


ब्राह्मण क्षत्रिय औ’ वैश्य शूद्र इन वर्णों के, गुण कर्मों के संकुल का मैं ही कर्ता हूँ
इस सकल सृष्टि का उद्भव है मेरे द्वारा, मुझ अविनाशी को तो भी समझ अकर्ता हूँ


कर्मों के बंधन मुझको बाँध नहीं सकते, उनके फल में मेरी कोई स्पृहा नहीं
इस तरह तत्व से जिसने मुझको जान लिया, वह समझो कर्मों के बंधन से बँधा नहीं


इस तत्वज्ञान अनुरूप हुए हैं कर्म सभी, इसके पहले कतिपय मुमुक्ष पुरुषों द्वारा
ऐसा तेरा कर्मों के प्रति आचरण रहे, जो कर्म सदा सम्पन्न हुए पुरुखों द्वारा


कहते हैं कर्म किसे अथवा अकर्म क्या है, कुछ बुद्धिमान मोहित हो जाते कभी कभी
मैं भलीभाँति वह कर्मतत्व बतलाऊँगा, जिससे तू होगा मुक्त अहित होंगे न कभी


चाहिए जानना कर्मों के स्वरूप को भी, जानना चाहिए सँग ही सँग अकर्म क्या है
इस जीवन में कर्मों की गति है बडी गहन, अनिवार्य जानना यह भी है विकर्म क्या है


जो नर कर्मों में भी अकर्म का द्रष्टा है, जिसको अकर्म में कर्म दिखाई देता है
है वही क्षिप्रचेता समस्त विद्वानों मे, योगी, सारे कर्मों का वही प्रणेता है


कामना और संकल्प विवर्जित होकरके, शास्त्रोक्त कर्म का जो निष्पादन करते हैं
होते हैं भस्म कर्म उसके ज्ञानानल में, वे पण्डित हैं ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं


जिसकी कर्मों, परिणामों में आसक्ति नहीं, परमात्मा में वह नित्य तृप्त हो जाता है
संसाराश्रय से रहित कर्म को करके भी, वह नर कर्मों का कर्ता नहीं कहाता है


जो इन्द्रियजित निज अन्तःकरण नियंत्रक हो, जिसका मन भोग विषय में व्याप्त नहीं होता
होकर गताश भौतिक कर्मों को करके भी, ऐसा मानव पापों को प्राप्त नहीं होता


इच्छा के बिना प्राप्तियों से जो तुष्ट रहे, जो ईर्ष्या हर्ष शोक से कभी न मोहित हो
कर्मों के पाश न उस योगी को बाँध सकें,जो सिद्धि असिद्धि दशा में कभी न विचलित हो


आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है जिसकी, जिसका मन परमात्मा में लय हो जाता है
जो मात्र यज्ञ कर्मों का सम्पादन करता, उसके कर्मों का पूर्ण विलय हो जाता है


जिन यज्ञों में आहुति अर्पण हव्य ब्रह्म है, ब्रह्मरूप कर्ता ब्रह्मानल द्रव्य ब्रह्म है
ब्रह्मकर्म स्थित ऐसे योगी के द्वारा, प्राप्त किया जाने वाला फल भव्य ब्रह्म है


यज्ञों का करके विधि विधान से अनुष्ठान, कुछ योगीजन करते हैं पूजन देवयजन
कुछ योगवान परमात्मारूप अनल में ही, आत्मा का ही करते यियक्षुतापूर्ण हवन


कुछ योगीजन जिह्वा कर्णादि इन्द्रियों का, संयम रूपी पावक में दहन किया करते
कुछ अन्य योग से युक्त पुरुष शब्दादि विषय, इन्द्रियरूपी दाहक में हवन किया करते


इन्द्रिय एवं प्राणों की सभी क्रियाओं को, करके निवेश कुछ योगी ज्ञान प्रकाशन में
इस तरह अलौकिक हवन किया करते हैं वे, कर अपने मन पर संयम योग हुताशन में


कुछ मानव द्रव्ययोग का अश्रय लेते हैं, कुछ योगयज्ञ, कुछ तपोयज्ञ के अनुगामी
कुछ यति संशितव्रतधारी करते ज्ञानयज्ञ, स्वाध्यायरूप, ज्ञानस्वरूप पथ के गामी


कुछ देते प्राणों की आहुति अपान में हैं, कुछ प्राणों में अपान की आहुति दे करके
कुछ योगी हैं जो प्राणायाम परायण हैं, आहुतियाँ देते प्राणापान रोक करके


कुछ नियताहारी योगीजन ऐसे भी हैं, प्राणों में ही प्राणों के हव्य प्रदाता हैं
यज्ञों से सारे पाप भस्म कर देते हैं, ये साधक यज्ञों के स्वरूप के ज्ञाता हैं


हे अर्जुन यज्ञशिष्ट अन्नों के सेवन से, मानव ईश्वर का परमधाम पा जाता है
जो यज्ञविहीन पुरुष है किसी लोक में भी, वह कभी नहीं सुख का अनुभव कर पाता है


एवंविध वितत अनेक कोटि की यज्ञ विधा, वेदों की वाणी में व्याख्यायित युक्तियुक्त
ऐसे कर्मज यज्ञों के तत्व निरूपण से, कर्मों के बंधन से तू होगा पूर्णमुक्त


हे पार्थ परंतप ! द्रव्ययज्ञ की तुलना में, स्वाध्याय ज्ञानयज्ञों की अधिक महत्ता है
जब मानव का शुभ ज्ञान चक्षु खुल जाता है, सब कर्मों की विलीन हो जाती सत्ता है


तुम तत्वज्ञानियों के ढिंग जाकर उनसे जयश्रीराम करो
उनकी सेवा निष्कपट करो उनको दण्डवत प्रणाम करो
परमात्मज्ञान के ज्ञाता तुझको तत्वज्ञान करायेंगे
उनसे शुचितापूर्वक निश्छल कैसे भी प्रश्न ललाम करो


जिसका अनुशीलन कर लेने पर हे अर्जुन, सब प्राणिमात्र को आत्मभाव में देखेगा
निःशेषभाव में स्थित होकर मोहमुक्त, सब जीवों को परमात्मभाव में देखेगा


इस जग में जितने भी हैं पाप कर्म वाले, उनसे भी यदि अत्यधिक पाप कर जायेगा
तो भी इस ज्ञानरूप नौका पर चढ करके, तू महापाप का महाजलधि तर जायेगा


जैसे प्रज्वलित हुताशन सब समिधाओं को, केवल क्षणभर में भस्मसात कर देता है
वैसे ही ज्ञानरूप पावक सब कर्मों को, बस एक निमिष में आत्मसात कर लेता है


परमात्मज्ञान सम पावन करने की क्षमता, होती है जग में नहीं किसी भी साधन में
वह नर जिसको भी हो जाती है योगसिद्धि, पाता है ज्ञान आत्मा के अनुशासन में


श्रद्धा से युक्त, कर्म तत्पर हो इन्द्रियजित, पाता है वह नर ज्ञान परम कल्याणयुक्त
तदनन्तर ज्ञानयुक्त होने की स्थिति में, अति शीघ्र प्राप्त होती सुशान्ति आनन्दयुक्त


श्रद्धाविहीन अविवेकी संशय वालों की, जीवन यात्रा की गति हो जाती छिन्न भिन्न
समझो परलोक लोक सब उसका व्यर्थ हुआ, सुख शान्ति नहीं मिलती, मन रहता सदा खिन्न


हे अर्जुन, कर्मयोग का जो आश्रय लेकर, कर देता कर्मों को परमात्मा में अर्पण
उस आत्मवंत संशयविहीन नर को जग में, बाँधते नहीं कर्मों के बंधन आकर्षण


अपने विवेक ज्ञानस्वरूप शस्त्रों द्वारा, मूलोच्छेदन कर संशय का अज्ञान जनित
हे भारत ! तू निष्काम कर्मयोगी होकर, कर अभी खडा हो, महा धर्म संग्राम त्वरित


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Monday, 20 June 2011

GITA AMRITAM गीताऽमृतमः अध्याय तीन

अध्याय तीनःकर्म योग
अर्जुन बोले


यदि ज्ञान श्रेष्ठ है कर्मों से यदि आप यथोचित कहते हैं
इस क्रूर कर्म में क्यों केशव फिर मुझे नियोजित करते हैं ?


क्या हित क्या अनहित ज्ञान नहीं मिश्रित वचनों से बुद्धि भ्रमित
दो ज्ञान सुनिश्चित तथ्यपूर्ण जिसमें मेरा कल्याण निहित


श्री भगवान बोले


हैं अर्जुन जग में दो प्रकार की निष्ठायें है ज्ञान योग में निष्ठा सांख्ययोगियों की
निष्पाप पार्थ मैंने पहले ही बतलाया, निष्काम कर्म में निष्ठा कर्मयोगियों की


जब तक होता है कर्मों का प्रारम्भ नहीं, तब तलक योगनिष्ठा की आप्ति नहीं होती
निज कर्मत्याग योगी के लिये अभीष्ट नहीं, इससे भी किसी सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती


कोई भी मानव किसी काल में क्षण भर भी, कर्मों के बिना कदापि नहीं रह सकता है
वह प्रकृतिजन्य गुण के द्वारा प्रेरित होता, कर्मों को करने की उसकी परवशता है


जो नर हठ पूर्वक इन्द्रिय निग्रह करता है, पर मन द्वारा विषयों में ध्यान लगाता है
वह विमूढात्मा आत्मवंचना पथगामी, ऐसा मानव मिथ्याचारी कहलाता है


जो मानव अनासक्त होकर निज कर्म करे, इन्द्रिय कुल पर स्थापित जिसकी सत्ता है
जो कर्मयोग का आश्रय ले अनवरत चले, है श्रेष्ठ वही उसकी अत्यधिक महत्ता है


कर्तव्यहीनता सदा तिरस्कृत होती है, कर्तव्यपरायणता ही महिमामंडित है
कर्मों का निजस्वरूप से त्याग अवांछित है, मानव शरीर की यात्रा होती खण्डित है


यज्ञों से इतर अन्य कर्मों के करने से, मानव बँध जाता है कर्मों के बंधन से
हे पार्थ कर्म कर संगदोष से मुक्त हुआ, तू सदा रहेगा मुक्त जगत के बंधन से


ब्रह्मा ने कल्पारम्भ समय प्राणीगण की, यज्ञों के साथ सृष्टि की एवं कहा वचन
यह यज्ञ समस्त काम्य भोगों का दाता है, इससे होगी समृद्धि और परमोन्नयन


यज्ञों से होती देवों को संतुष्टि प्राप्त, देवों की तुष्टि ऋद्धि सुख भोग प्रदान करे
इस तरह परस्पर उन्नति करते रहने से, हर मानव निश्चित ही अपना कल्याण करे


यज्ञों द्वारा संतुष्ट हुए ये देव सकल, करते निश्चय ही इच्छित भोगों का विधान
जो उन्हें समर्पित किए बिना उपभोग करे, उस महानराधम को निश्चय ही चोर जान


जो यज्ञ कर्म से बचे अन्न को खाते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से तर जाते हैं
जो उदर पूर्ति की खातिर अन्न पकाते हैं, वे अन्न नहीं बस पाप पाप ही खाते हैं


प्राणी होते उत्पन्न अन्न के कारणवश, है अन्नोत्पत्ति वृष्टि के कारण ही संभव
शुभ यज्ञों के कारण होती है वृष्टि सुलभ, शुभ विहित कर्म से यज्ञों का होता उद्भव


ये कर्म समुच्चय वेदों से उत्पन्न जान, अविनाशी ईश्वर ही वेदों में निष्ठित है
वह परम सर्वगत अक्षर परमात्मा सदैव, होते हैं यज्ञ जहाँ उस जगह उपस्थित है


जग परम्परा प्रचलित पथ से जो विचलित हो, कर्तव्यहीन प्रतिकूल सृष्टि के चलता है
इन्द्रियवश भोगारमणी वह पापायु पुरुष, धिग्जीवन उसका व्यर्थ धरा पर पलता है


जो मानव अपनी आत्मा में ही रमण करे, जो आत्मा में ही तृप्त और संतुष्ट रहे
हो जाते हैं निःशेष कर्म सारे उसके, फिर वह कर्तव्यों के प्रति क्यों आकृष्ट रहे


कर्मों से नहीं प्रयोजन जिसका लेशमात्र, कोई भी अकर्मण्यता से अनुबंध नहीं
वह महापुरुष ज्ञानी कहलाता है जिसका, जगप्राणिमात्र से स्वार्थजनित संबंध नहीं


जिस मानव के मन में होती आसक्ति नहीं, कर्तव्यमार्ग पर अविरत चलता जाता है
हो अनासक्त जो निज कर्मों को करता है, वह पुरुष अन्ततः ईश्वर को पा जाता है


थे परम सिद्धि को प्राप्त हुए ये पूर्वपुरुष, जनकादि क्षिप्रचेता ज्ञानी आसक्ति रहित
हो दृष्टिवंत निज कर्मों को तू करता जा, यह व्यावहारिक अनुभव है तेरे लिये उचित


जिस पथ पर चलते हैं ज्ञानीजन श्रेष्ठ पुरुष, जनसाधारण उनका करते अनुकरण वहाँ
जो भी आदर्श प्रमाण उपस्थित करते वे, साधारणजन वैसा करते आचरण वहाँ


अर्जुन जग में मेरा न तनिक कर्तव्य शेष, अथवा हो कोई प्राप्य वस्तु मुझको अप्राप्त
मैं लोक सरीखा कर्माचरण बरतता हूँ, कर्मों का आश्रय, मुझमें सारे कर्म व्याप्त


इसलिए पूर्ण जाग्रत होकर कर्मों में है आचरण मेरा
क्योंकि इस जग के सारे जन गण करते हैं अनुकरण मेरा


यदि कर्म नहीं करता हूँ मैं इस दुनिया में, फिर तो यग सारा लोक नष्ट हो जायेगा
बन जाऊँगा मैं हेतु सर्वसंकरता का, अस्तित्व प्रजा का नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा


हे भारत ! कर्मों में रत जैसे अज्ञानी, फल की इच्छा रखकर निज कर्म प्रयाण करे
वैसे फलत्यागी अनासक्त कोई ज्ञानी, कर कर्मों का आचरण लोक कल्याण करे


योगस्थ पुरुष का यही परम कर्तव्य मात्र, आसक्तियुक्त नर निज कर्मों से विरत न हो
जो शास्त्रविहित उस कर्म मार्ग पर स्वयं चले, अन्यों के द्वारा भी सकुशल सम्पादन हो


होते हैं सारे कर्म सृष्टि गुण के द्वारा, निजकर्तापन का भाव मूढ अभिमानी है
’मैं ही कर्ता हूँ अपने सारे कर्मों का’, ऐसा विचार जिसका है वह अज्ञानी है


हे महाबाहु इस प्रकृतिजन्य गुणकर्म क्षेत्र, इस प्रकृति चक्र से कोई मुक्त नहीं होता
सारे निसर्ग के गुण, गुण में हैं बरत रहे, इसलिये ज्ञानयोगी आसक्त नहीं होता


इन प्रकृति गुणों से मोहित इन मतिमंदों की, कर्मों के प्रति आसक्ति भाव का विघटन हो
है तत्वज्ञानियों का केवल कर्तव्य यही, उनकी मति में कर्मों से तनिक न विचलन हो


मुझ परमात्मा में निष्ठायें आरोपित कर, सारे कर्मों का अर्पण हो निष्काम करे
तेरा पावन कर्तव्य तुझे बतलाता हूँ, आशा ममता संताप रहित संग्राम करे


मेरे इन उपदेशों का जो पालन करते, अनसूयदृष्टिवाही हो श्रद्धा युक्त हुए
निष्काम कर्म पथ पर जो यात्रा करते हों, वे समझो कर्मों के बंधन से मुक्त हुए


जो नर मेरे उपदेशों पर सम्यक व्यवहार नहीं करते
वे ज्ञानरहित मोहित हो, एवं नष्ट भ्रष्ट होकर मरते


सब प्राणी प्रकृति अधीन हुए, निज पथ का वरण कर रहे हैं
ज्ञानी भी निज स्वभावसंगत शुभ कर्माचरण कर रहे हैं


प्रत्येक इन्द्रियों के विषयों में राग द्वेष का समावेश
सब संग विवर्जित हों, ये हैं कल्याण मार्ग में विघ्न क्लेश


गुणहीन स्वधर्म श्रेष्ठतर है, परकीयधर्म से ज्ञानपरक
निज धर्म हेतु आत्मोत्सर्ग भी होता है कल्याणपरक


अर्जुन बोले


हे कृष्ण बताओ नर किसका किस भाँति अनुकरण करता है
किसके परवश किससे प्रेरित हो पाप आचरण करता है


भगवान बोले


रज गुण से काम प्रकट होता है, काम क्रोध का कारक है
यह काम महाशन नारकीय पापी वैरी संहारक है


जैसे ढकता है धुँआ अग्नि, मल दर्पण को ढक लेता है
ज्यों गर्भ उल्व से आवृत है, त्यों काम ज्ञान ढक  देता है


दुष्पूरणीय नितवर्धमान कामना अनल सम होती है
ढक लेती ज्ञान ज्ञानियों का, यह नित्य वैरिणी होती है


इन्द्रियाँ, बुद्धि, मन स्थल पर यह काम सुशोभित होता है
जब ढक देता यह ज्ञान चक्षु जीवात्मा मोहित होता है


भरतर्षभ ! सभी इन्द्रियों को वश में कर पूर्ण अवश कर दे
तत्काल ज्ञान विज्ञान विनाशक कामशत्रु का वध कर दे


मानव शरीर से परे इन्द्रियाँ होती हैं, मन इन्द्रिय से है सूक्ष्म, बुद्धि मन से सशक्त
जो परे बुद्धि से भी होता अत्यंत प्रखर, वह ईश्वर का है अंश आत्मा रूप व्यक्त


जो परे बुद्धि से सूक्ष्म और बलशाली है, उस आत्मा का सम्यक कर ले साक्षात्कार
निज बुद्धिशक्ति से मन को निज वश में करके, इस काम रूप दुर्जय वैरी को मार मार


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