Thursday, 28 July 2011

GITAMRITAM (गीता‍मृतम - दशवाँ अध्याय - विभूति योग)

GITAMRITAM (गीता‍मृतम - दशवाँ अध्याय - विभूति योग)
भगवान बोले

हे महाबाहु फिर भी सुन मेरे वचनों को, जो अति प्रभावशाली हैं, परम रहस्य सहित
तू मुझमें अतिशय प्रीति लगानेवाला है, उसको सुन जिसमें है तेरा कल्याण निहित


ऋषिगण अथवा देवता मेरी लीला का पार नहीं पाते
मैं हूँ दुरूह सृष्टा इससे वे मुझको जान नहीं पाते


मुझको अनादि, अज, लोकेश्वर जो पुरुष सदैव मानता है
वह पापी पापमुक्त होता जो सम्यक मुझे जानता है


निश्चय करने की शक्ति, ज्ञान, शम, दम, अमोह, उत्पत्ति, प्रलय
हो सहनशीलता, सत्यवादिता, सुख, दुख या भय और अभय


तप, तुष्टि, अहिंसा, समता, यश, अपकीर्ति, दान जो होते हैं
सब प्राणी में मेरे द्वारा ये भाव प्रस्फुटित होते हैं


मनु, सनकादि, सप्तऋषि, जिनकी यह सम्पूर्ण प्रजा है
मुझमें रहते लीन जिन्हें मैंने ही स्वयं रचा है


मेरी विभूतियों और योग का ज्ञान जिसे हो जाता है
इसमें संदेह नहीं वह निश्चल भक्तियुक्त हो जाता है


मैं सब लोकों का आदि हेतु ऐसा जो मनन किया करते
वे श्रद्धा भक्ति युक्त ज्ञानी मेरा ही भजन किया करते


जो निज मन को, प्राणों को मुझमें अर्पण कर, मेरे प्रभाव गुण का संचारण करते हैं
आपस में मेरी कथा सुनाते सुनते जो, हो नित्य तुष्ट मुझको ही धारण करते हैं


जो प्रीतिपूर्वक मुझे निरंतर भजते हैं, जो मुझमें सम्यक ध्यान आप्त हो जाते हैं
उन भक्तों को मैं बुद्धियोग दे देता हूँ, जिसको पाकर वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं


उन भक्तों पर अनुकम्पा करने की खातिर, उनके अन्तस्तल में प्रविष्ट हो लेता हूँ
मैं तत्वज्ञानरूपी दीपक द्वारा उनका, अज्ञानजनित भ्रम तमस नष्ट कर देता हूँ


अर्जुन बोले


सबसे हैं परम पवित्र आप, हैं परमब्रह्म, हैं पुरुष सनातन पावनधाम कहाते हैं
सर्वत्र व्याप्त हैं, और अजन्मा आदिदेव, बस एक आप दिव्याभिराम कहलाते हैं


जो असित, व्यास, देवल, नारद सारे ऋषि मुनि गण कहते हैं
प्रभु आप स्वयं वह सब अपने मुख से मेरे प्रति कहते हैं


जो कुछ अब तक बतलाया गया आप द्वारा, हे केशव ! उसको अर्जुन सत्य मानता है
हो कोई देवता, दानव अथवा मानव हो, प्रभु की लीला को कोई नहीं जानता है


हे पुरुषोत्तम आप सभी भूतों के ईश्वर, हे देवों के देव भूत भावन जगस्वामी
कोई नहीं जान सकता भगवन की लीला, आप स्वयं ही अपने में हैं अन्तर्यामी


अपनी विभूतियों की व्याख्या में हैं समर्थ पर्याप्त आप
जिनके द्वारा लोकों की रचना कर उनमें हैं व्याप्त आप


जिससे तुमको मैं जानूँ बतलाओ चिंतन का ढंग मुझे
भगवन बतलाओ चिंतन के उन भावों का प्रत्यंग मुझे


निज योगशक्ति लीला विभूति के बारे में, कहिए विस्तार सहित जब तक मन क्षिप्त न हो
अपने अमृतमय वचनों को तब तक कहिए, मेरे मन की उत्कंठा जब तक तृप्त न हो


भगवान बोले


मेरी सारी विभूतियाँ परम अलौकिक हैं, उनके बारे में पार्थ तुझे बतलाऊँगा
क्योंकि अर्जुन मेरा विस्तार असीमित है, इसलिए उन्हें मैं मुख्यतया समझाऊँगा


अर्जुन ! सब भूतों के अन्तस्तल में स्थित, सब में आत्मा के रूप बसा अनन्त मैं हूँ
सम्पूर्ण जगत के भूतों का आदि मैं हूँ, मैं ही भूतों का मध्य और अन्त मैं हूँ


मैं विष्णु सभी आदित्यों में, ज्योतित किरणों वाला रवि हूँ
पवनों में मैं ही हूँ मरीचि, नक्षत्रों में मैं ही शशि हूँ


वेदों में मैं हूँ सामवेद, इन्द्रिय समूह में मैं मन हूँ
देवों में मैं ही वासव हूँ, भूतों में ऊर्जा चेतन हूँ


एकादश रुद्रों में शंकर, यक्षों में धनपति हूँ कुबेर
वसुओं में मैं ही पावक हूँ, गिरि शिखरों में हूँ मैं सुमेर


मैं सभी पुरोधाओं में मुख्य बृहस्पति हूँ, सेनापतियों में मुझको ही स्कन्द जान
सबका कर्ता धर्ता हूँ अतः पार्थ मुझको, सारे जलाशयों से भी बडा समुद्र जान


जग के सारे महर्षियों में मैं ही भृगु हूँ, शब्दों में एक अक्षर मुझको ऊँकार मान
जपयज्ञ रूप यज्ञों में सदा प्रतिष्ठित हूँ, पर्वत में मुझे हिमालय का आकार मान


वृक्षों में मैं ही पीपल हूँ, ऋषियों में मैं ही नारद हूँ
हूँ चित्ररथ सब गन्धर्वों में, सिद्धों में कपिल विशारद हूँ


जो सुधा संग उत्पन्न हुआ उच्चैःश्रवा अश्वों में हूँ
ऐरावत हूँ गयंदगण में, मैं नराधिपति पुरुषों में हूँ


शस्त्रास्त्रों में मैं बज्ररूप गौओं में कामधेनु हूँ मैं
सर्पों का राजा वासुकि मैं, प्रजनन में कामदेव हूँ मैं


नागों में मैं हूँ शेषनाग, हूँ वरुण समस्त जलचरों में
शासनकर्ताओं में यम हूँ, अर्यमा पितर हूँ पितरों में


दैत्यों में हूँ प्रहलाद स्वयं, मृगराज सिंह हूँ पशुओं में
गणना में मैं हूँ महाकाल, हूँ गरुण समस्त पक्षियों में


पावनकर्ता में वायु सुखद, राघव हूँ शस्त्रधारियों में
नदियों में मैं ही सुरसरि हूँ, हूँ मकर समस्त मछलियों में


विद्याओं में अध्यात्मज्ञान, आद्यन्त, मध्य हूँ सर्गों में
अर्जुन ! मैं सबका समाधान, हूँ तत्वज्ञान सब तर्कों में


सारे वर्णों में मैं ही हूँ ऊँकाररूप, मैं महाकाल हूँ सब कालों का ज्ञाता हूँ
मैं सर्वमुखी हूँ महाविराट रूप वाला, मैं हूँ समास में द्वन्द्व, सभी का धाता हूँ


मैं ही हूँ सारे भूतों का विनाशकर्ता, उनकी उत्पत्ति मात्र का भी मैं कारण हूँ
नारी में मैं मेधा हूँ, धृति हूँ, स्मृति हूँ, श्री, कीर्ति, क्षमा, एवं वाणी उच्चारण हूँ


श्रुतियों में मैं हूँ बृहत्साम, छन्दों में मैं गायत्री छन्द
मासों में मार्गशीर्ष मैं हूँ, सब ऋतुओं में मैं हूँ बसन्त


छल में कहते हैं द्यूत मुझे, विजयी पुरुषों की मैं जय हूँ
मैं तेजस्वी का तेजस हूँ, सात्विक पुरुषों का निश्चय हूँ


मैं वासुदेव हूँ सारे वृष्णिवंशियों में, पाण्डव में पार्थ रूप में जाना जाता हूँ
सारे मुनियों में वेदव्यास मुझको जानो, कवियों में मैं ही शुक्राचार्य कहाता हूँ


मैं ही कहलाता हूँ जयिष्णु की नीति परम, दण्डाधिकारियों की हूँ मैं ही दमन शक्ति
मैं गोपनीय भावों का परम रहस्य मौन, हूँ ज्ञानवान पुरुषों की तत्वज्ञान भक्ति


अर्जुन ! वह मैं हूँ जो सब भूतों के संभव का कारण है
मुझसे उत्पन्न चराचर, पैदा हुआ न कोई अकारण है


ये मेरी सब विभूतियाँ दिव्य अलौकिक हैं, अर्जुन ! कोई भी इनका पार नहीं पाया
मैंने जो बतलाया वर्णन विस्तार नहीं, तुझको केवल सारांशरूप ही समझाया


जो कुछ भी जग में दिखता है ऐश्वर्ययुक्त, जो कुछ भी लगता कान्तियुक्त या शक्तियुक्त
वह सब कुछ है मेरी विभूतियों का प्रभाव, है तेज मेरा, उन सबमें मेरा अंश युक्त


हे अर्जुन ! अधिक प्रयोजन क्या, उन तथ्यों के विस्तारण से
यह जग है मेरी योगशक्ति के अंशमात्र के धारण से                ॥


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Sunday, 24 July 2011

GITAMRITAM (गीता‍मृतम - नवाँ अध्याय -राजविद्या राजगुह्य योग )

नवाँ अध्याय - राजविद्या राजगुह्य योग
भगवान बोले

तुझ दृष्टिदोष से रहित भक्त को गोपनीय, मेरे द्वारा वह ज्ञान बताया जायेगा
विज्ञान सहित यह ज्ञान समझकर भलीभाँति, तू दुखरूपी भवसागर को तर जायेगा

विज्ञान सहित यह ज्ञान सुगम अति उत्तम है, विद्याओं और रहस्यों का अधिशासी है
यह अति पवित्र, प्रत्यक्ष फलद, है धर्मयुक्त, यह मेरी सत्ता का स्वरूप अविनाशी है


जो श्रद्धाहीन पुरुष यह धर्माचरण नहीं कर पाते हैं
वे मुझको प्राप्त न होकर भवसागर में आते जाते हैं


जैसे जल ढका हुआ होता है बर्फों से, वैसे ही मुझसे यह सारा जग आवृत है
सब प्राणी संकल्पों से स्थित हैं मुझमें, पर मेरी सत्ता उनमें नहीं समावृत है


तू देख मेरी ईश्वरी शक्ति का कौतूहल, वास्तव में मुझमें कोई भूत नहीं स्थित
धारण पोषण करता मैं सभी प्राणियों का, पर भूतों में मैं कभी नहीं रहता स्थित


जैसे विस्तृत समीर मण्डल आकाश मध्य में स्थित है
वैसे सब भूतों की सत्ता मुझ परमेश्वर में स्थित है


हे अर्जुन कल्पों की समाप्ति पर भूत सभी, मेरी प्रकृति के अन्दर लय हो जाते हैं
उनकी रचना करता हूँ कल्पारम्भ समय, तब इस जग में वे पुनः उदय हो जाते हैं


अपनी स्वयं प्रकृति को जब मैं अभियोजित करता हूँ
परवश हुए भूतगण को कर्मानुसार रचता हूँ


कर्मों के प्रति मैं उदासीन आसक्ति रहित रहता हूँ
इसीलिए हे अर्जुन ! उनसे कभी नहीं बँधता हूँ


मैं सबका स्वामी हूँ मेरी इच्छा पर ही, 
प्रकृति चराचर सहित सकल जग को रचती है
मैं हूँ एकमात्र कर्ता संसार चक्र का, 
जिसके संकेतों पर विश्वधुरी चलती है


जो मूढ और अज्ञानी हैं वे मुझको नहीं जानते हैं, 
उनको मैं तुच्छ मनुज शरीरधारी समान ही दिखता हूँ
मेरे उस भूत महेश्वर का है भाव उन्हें कुछ पता नहीं
इसलिए उन्हें मैं केवल साधारण मानव सा लगता हूँ


हैं व्यर्थ सभी, जिनकी आशायें, धर्म, ज्ञान, वे अज्ञानी जन कहलाते विक्षिप्तचित्त
रहता सदैव उनका स्वभाव, चिंतन, विचार, राक्षसी, आसुरी और मोहिनी में प्रवृत्त


दैवी निसर्ग के आश्रित सभी महान पुरुष, ज्ञानीजन अन्य दूसरे आश्रय तजते हैं
मेरा भूतेश्वर अव्ययरूप समझ करके, काग्रभाव से मुझे निरंतर भजते हैं


दृढ निश्चय वाले ऐसे भक्तिमान प्राणी, मेरा कीर्तन कर यत्न साधना करते हैं
कर बारम्बार प्रणाम मुझे श्रद्धापूर्वक, वे ध्यानयुक्त होकर उपासना करते हैं


कुछ ज्ञानयज्ञ के साधक निर्गुण निराकार, की एकनिष्ठ अविचल उपासना करते हैं
हैं अन्य दूसरे मानव जो कुछ पृथक रूप, मुझ प्रभु विश्वतमुख की उपासना करते हैं


मैं हूँ यज्ञ, स्वधा भी मैं हूँ, औषधि और मनोरथ हूँ
मैं ही मंत्र, अग्नि, घृत मैं हूँ, मैं ही हवन क्रियापथ हूँ


एक मात्र मैं ही हूँ जग का पिता पितामह, मैं ही माता धाता जग का महाभूप हूँ
यजुर्वेद मैं ही हूँ, ऋक, सामादि वेद हूँ, मैं हूँ विद्यावेद्य और ऊँकाररूप हूँ


सबका प्रभु साक्षी निवास हूँ शरण सुहृद हूँ, मैं ही सब चेष्टाओं की वांछित सद्गति हूँ
प्रभव प्रलय का हेतु निधान और अविनाशी, मैं हूँ सकल विश्व आधार, परम स्थिति हूँ


मैं सूर्य रूप जाज्ज्वल्यमान हो तपता हूँ, वर्षा आकर्षित कर उसको बरसाता हूँ
हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु भी हूँ, मैं सत हूँ, एवं मैं ही असत कहाता हूँ


त्रैविद्योपासक, सोमरसिक जो पापरहित, यज्ञों से स्वर्ग प्राप्ति के अनुरागी होते
अपने पुण्यों से स्वर्ग लोक मिलता उनको, वे नर देवों के दिव्य भोगभागी होते


उस भव्य स्वर्ग के भोगों का आस्वादन कर, पुण्यों के क्षय पर मृत्युलोक में आते हैं
वेदों के आश्रित होकर पूर्ण कामकामी, इस आवागमन मार्ग में आते जाते हैं


जो सतत अनन्य भावना से मेरी उपासना है करता
सब योग क्षेम दायित्व भार उसका मैं स्वयं वहन करता


वे भी समझो मेरी ही पूजा करते हैं, जो अन्य देवताओं को भजते कामयुक्त
यद्यपि वह होता श्रद्धायुक्त सकाम भक्त, पर उसका यह पूजन होता अज्ञानयुक्त



सब यज्ञों का भोक्ता स्वामी भी मैं ही हूँ, पर देवों की सकाम जो पूजा करते हैं
उनको होता इस परमतत्व का ज्ञान नहीं, इसलिये सदा भवसागर में वे गिरते हैं


देवों की पूजा करने वाले देवों को ही प्राप्त करें, पितरों की पूजा करने वाले पितरों को ही प्राप्त करें
भूतों की पूजा करते जो भूतों को वही प्राप्त होते, जो मेरी पूजा करते हैं वे परमेश्वर को प्राप्त करें


जो भक्तिभाव से पत्र, पुष्प, फल, जल अर्पण, करता है मुझको, पूर्ण प्रेम उत्कट होकर
उन निश्छल भक्ति भावनामय नैवेद्यों को, मैं सगुण रूप से खाता स्वयं प्रकट होकर


अर्जुन ! जो भी हवन, दान, तप, तर्पण कर
सब कर्मों भोगों को मुझमें अर्पण कर


अशुभ और शुभ फल का भागी नहीं बने, जो करता सब कर्मों को मुझमें अर्पण
योगयुक्त ऐसे संयासी आत्मा को, बाँध नहीं सकते हैं कर्मों के बंधन


सब भूतों पर रहती है समदृष्टि मेरी, कोई अप्रिय, और न ही है प्रिय मुझको
मुझमें वे हैं भक्त और मैं भक्तों में, प्रीतिपूर्वक जो भी भजते हैं मुझको


जो भी अनन्यभाव से मुझको है भजता, है साधु सदृश कितना भी दुष्कर्मी अतिशय
वह है यथार्थ दृष्टा, ईश्वर के भजन बिना, सब कुछ है व्यर्थ करे ऐसा जो दृढ निश्चय


वह पुरुष शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, ऐसा ही नर पाता चिर शान्ति परमगति को
हे अर्जुन ! तू यह सत्य जान, वह भक्त मेरा, होता है प्राप्त कभी भी नहीं अधोगति को


हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र हों कोई भी, जो मानव मेरे शरणागत हो जाते हैं
चाण्डाल आदि जो पाप योनि में भटक रहे, वे भी मेरा शुभ परमधाम पा जाते हैं


राजर्षि भक्तजन ब्राह्मण सुकृत मुझे ही भज, पा जाते मेरा धाम, व्यर्थ का चिंतन तज
सुख रहित और क्षणभंगुर मानव तन पाकर, हे अर्जुन !मोक्ष हेतु तू केवल मुझको भज


बन भक्त मेरा, मेरा जन कर नमन मुझे, मन में हर क्षण हो मेरा ही चिंतन विशिष्ट
अर्जुन ! अपनी आत्मा को मुझमें कर नियुक्त, तू अन्तकाल में मुझमें होगा समाविष्ट

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