Sunday, 28 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम -सत्रहवाँ अध्याय-श्रद्धा त्रय विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -सत्रहवाँ अध्याय
श्रद्धा त्रय विभाग योग


अर्जुन बोले


केशव ! जो शास्त्र निरत होकर करते हैं पूजा श्रद्धा मय
उनकी निष्ठा कैसी होती, सात्विक, राजस या तामस मय


भगवान बोले


इन श्रद्धाओं की हर मानव में तीन विधायें होती हैं
सात्विकी राजसी और तामसी ये श्रद्धायॆ होती हैं


जिसका अन्तस्तल है जैसा वैसी ही उसकी श्रद्धा है
वह पुरुष स्वयं वैसा होता है जैसी उसकी श्रद्धा है


सात्विक श्रद्धा वाले मानव देवों की पूजा करते हैं
राजसी पुरुष राक्षसों और यक्षों की पूजा करते हैं
तीसरी और निष्ठा है जो तामसी वृत्ति कहलाती है
तामसी वृत्ति के नर भूतों प्रेतों की पूजा करते हैं


विपरीत शास्त्र विधि के जो कल्पित घोर उग्र तप करते हैं
वे काम राग बल अहंकारमय दम्भ आचरण करते हैं


कायस्थ भूतगण, मुझको भी, होते वे कृश करने वाले
जिनका ऐसा आचरण वही होते आसुर स्वभाव वाले


हर प्राणी के स्वभाव के कारण अलग अलग, आहारों की भी तीन तरह की श्रेणी है
इनके सब पृथक पृथक भेदों को मुझसे सुन, तप दान यज्ञ की अपनी अलग त्रिवेणी है


बल बुद्धि आयु आरोग्य और जो सुखवर्धक, रसयुक्त भोज्य जो प्रीति बढाने वाले हैं
जो स्निग्ध और सुस्थिर हैं प्रिय सात्विक जन को, रुचिकर जो सात्विक भाव बढाने वाले हैं


कटु अम्ल लवण अति उष्ण तीक्ष्ण रूखे हैं जो, जो ज्वलन प्रदाहपूर्ण हैं और विदाहक हैं
उत्पन्न करें जो चिन्ता रोग और दुख को, वे भोज्य द्रव्य राजसी वृत्ति संवाहक हैं


अधपका रसरहित होता जो दुर्गन्ध पूर्ण, जो भी भोजन उच्छिष्ट पर्युषित होता है
स्वच्छता और शुचिता से जो तैयार नहीं, उसको पाकर तामसी उल्लसित होता है


यज्ञों का करना ही नर का कर्तव्य परम, इस मति से शास्त्र विहित जो यज्ञ किया जाता
जिसमें सन्निहित नहीं फल की अभिलाषा है, उन यज्ञों को ही सात्विक यज्ञ कहा जाता


हे भरत श्रेष्ठ ! फल अथवा दम्भाचरण हेतु, जो मानव यज्ञों का आयोजन करते हैं
कहलाते हैं ये यज्ञ सदा राजसी यज्ञ, ऐसों को ही राजसी वृत्ति जन कहते हैं


शास्त्रोक्त विधान हीन होता जो मंत्र रहित, दक्षिणा और श्रद्धा का जिसमें है अभाव
जिसमें हो अन्नदान सा पावनदान नहीं, उन यज्ञों का कहलाता है तामसी भाव


ब्राह्मणों ज्ञानियों गुरुओं का पूजन अर्चन, अथवा देवों का यजन और जप होता है 
शुचिता आर्जव ब्रह्मचर्य अहिंसा का पालन, मानव शरीर सम्बन्धी यह तप होता है


उद्वेगहीन, प्रिय, हितकारी, यथार्थ भाषण, अभ्यास सहित जो ईश नाम जप होता है
वेदों एवं शास्त्रों का पाठन पठन श्रवण, वाणी से सम्बन्धित सारा तप होता है


मन की प्रसन्नता शान्तभाव मन का निग्रह, भगवद चिंतन विचार जब मन में रहते हैं
अन्तस्तल में शुचिता पवित्रता रहे सदा, इसको ही मानस सम्बन्धी तप कहते हैं


पूर्वोक्त तरह के तीनों तप सात्विक कहलाये जाते हैं
निष्काम योगियों द्वारा श्रद्धा से अपनाये जाते हैं


सत्कार मान पूजा अथवा हो स्वार्थसिद्धि, पाखण्ड भाव से जो अपनाये जाते हैं
जिसका परिणाम सुनिश्चित होता नहीं कभी, राजसी भाव के तप कहलाये जाते हैं


अपनी काया मन वाणी को पीडित करके, मूढता पूर्वक हठ से जो तप  होता है
जिसमें अनिष्ट हो निहित दूसरे लोगों का, ऐसा अनिष्टकारी तामस तप होता है


जो दान दिया जाता है निज कर्तव्य समझ, जो देश काल या पात्रों के प्रति होता है
जिसमें हो प्रत्युपकार भावना निहित नहीं, सद्भावयुक्त वह दान सात्विक होता है


फल अथवा प्रत्युपकार भावना हो जिसमें, इस दृष्टिकोण से जो भी दान दिया जाता
जिसको प्रदान करने में होता महा कष्ट, राजसी भाव का दान वही है कहलाता


जिसमें हो असत्कार अथवा हो तिरस्कार, कलुषित भावना पूर्ण जो दान दिया जाता
जो अनुचित देश काल पात्रों के प्रति होता, वह दान सर्वथा तामस दान कहा जाता


सच्चिदानन्दघन ब्रह्म नाम कहलाता सदा ऊँ तत सत
उससे ही रचे गये ये ब्राह्मण वेद यज्ञ सम्पूर्ण जगत


है यही अपेक्षित ब्रह्मवादियों को शास्त्रों में है विधान
हरि नाम ऊँ का उच्चारण करके होते तप यज्ञ दान


तत नाम कहा जाता उसको जिसने सारा संसार रचा
तप दान और यज्ञों का फल उस परमात्मा को अर्पित है
जो है मुमुक्ष इच्छाविहीन उसका ऐसा ही चिंतन है
उसके द्वारा प्रदत्त सब कुछ उसके ही लिए समर्पित है


सत सत्य भाव में परमात्मा के लिए प्रयोग किया जाता
उत्तम कर्मों के करने में सत का उपयोग किया जाता


तप दान और यज्ञों में भी सत ही प्रयोग में आता है
जो कर्म समर्पित ईश्वर को वह भी सत ही कहलाता है


हे अर्जुन हवन दान तप जो श्रद्धाविहीन, अथवा जो हैं सत्कर्म न होते शुभकारी
श्रद्धा विहीन यह सब कुछ असत कहा जाता, परलोक, लोक दोनों में तनिक न हितकारी


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Saturday, 20 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सोलहवाँ अध्याय -दैवासुर सम्पद विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सोलहवाँ अध्याय 
दैवासुर सम्पद विभाग योग


भगवान बोले


जिसकी होती है ज्ञान योग में दृढ स्थिति, जो सत्व और संशुद्धियुक्त है पूर्ण अभय
सार्जव स्वाध्याय सहित शास्त्रों का पठन करे, दम दान यज्ञ तप में रत होकर सरल हृदय


हो सत्य, अक्रोध, त्याग, हिंसा का भाव नहीं, परनिंदारहित, शान्ति एवं कोमलता हो
हो विषय विरक्त, अनैतिकता के प्रति लज्जा, हो दयावान, मन में जिसके अचपलता हो


जिनमें अद्रोह, धृति, क्षमा, तेज एवं शुचिता, जो निज पूज्यता भाव से मुक्त पुरुषगण हैं
हे अर्जुन ये सारे गुण जो हैं बतलाये, दैवी सम्पदा युक्त पुरुषों के लक्षण हैं


अज्ञान घमण्ड दम्भ जिसमें है क्रोध भाव, जिसका है हृदय कठोर और अभिमान जिसे
अर्जुन जिसकी भी होती है प्रवृत्ति ऐसी, आसुरी सम्पदा वाला ही नर जान उसे


दैवी आसुरी सम्पदायें हैं इस जग में, आसुरी सम्पदायें देती हैं पृक्ति सदा
दैवी सम्पदावान अर्जुन तू शोक न कर, दैवी सम्पदा सर्वथा देती हैं मुक्ति सदा


हे पार्थ लोक में दो प्रकार के प्राणी हैं, पहले हैं जो होते दैवी स्वभाव वाले
विस्तार सहित दैवी स्वभाव को बतलाया, अब उनको सुन जो हैं आसुरी भाव वाले


आसुरी भाव वाले मनुष्य वे होते हैं, जिनको प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति का ज्ञान नहीं
जिनमें आचरण सत्य शुचिता का है अभाव, जिनके मन में इन सबके प्रति सम्मान नहीं


जग आश्रय रहित असत्य बिना ईश्वर के है, आसुरी वृत्ति वाले कहते संयोग मात्र
इसकी उत्पत्ति काम से है अन्यथा नहीं, है इसका कारण नर नारी सम्भोग मात्र


अवलम्बन लेकर मिथ्यापरक विचारों का, निज विमल स्वभाव नष्ट करके मतिमन्द हुए
सब भूतों के अपकारी वही क्रूरकर्मा, जग अहित हेतु उत्पन्न और स्वच्छन्द हुए


मद मान दम्भ दुष्पूर्य कामनायुक्त पुरुष, अपनी मति के अनुरूप अनुकरण करते हैं
अज्ञान और मिथ्या सिद्धांतों पर आश्रित, आचरणभ्रष्ट हो करके विचरण करते हैं


होकर आजीवन चिंताओं से युक्त सदा, विषयोपभोग में निशि दिन तत्पर रहते हैं
वे विषय भोग के सुख को सच्चा सुख समझें, इतना ही सुख है वे ऐसा ही कहते हैं


शतशत आशा की जंजीरों में फँसे हुए, वे काम क्रोध के वशीभूत होकर रहते
जिससे अधिकाधिक विषय भोग का अवसर हो, अन्याय पूर्वक धन बल का संग्रह करते


मैने यह इतना सब कुछ प्राप्त कर लिया है, आगे भी सभी मनोरथ पूर्ण करूँगा मैं
इतना सारा धन वैभव प्राप्त किया मैंने, फिर फिर इनसे निज को परिपूर्ण करूँगा मैं


मैंने अपने उस वैरी को है मार दिया, अन्यों को भी मारूँगा मैं बलवाला हूँ
सिद्धियाँ सभी मेरे चरणों की दासी हैं, मैं ईश्वर हूँ ऐश्वर्य भोगने वाला हूँ


मेरे समान है कौन बडा इस दुनिया में, मैं बडा धनाड्य और मेरा परिवार बडा
कर दान यज्ञ आमोद प्रमोद करूँगा मैं, ऐसा जो सोचे उसका है अज्ञान बडा


ये चित्तभ्रान्त नर मोहजाल से आच्छादित, अपने मन में झूठा भ्रम लेकर फिरते हैं
विषयोपभोग में लिप्त आसुरी वृत्ति युक्त, अपवित्र भयंकर महा नरक में गिरते हैं


धन मान मदान्वित निज को परम श्रेष्ठ समझें, स्तब्ध हुए निज महिमा मण्डन करते हैं
जो माना जाता शास्त्रों के विपरीत सदा, पाखण्ड पूर्ण वह यज्ञायोजन करते हैं


बल क्रोध घमण्ड कामना एवं अहंकार, से परिपूरित होकर पर निंदा करते हैं
मैं परमात्मा सबके शरीर में स्थित हूँ, वे नर समझो मुझसे ही ईर्ष्या करते हैं


जो द्वेष दूसरों से करते हैं पुरुष अधम, जो क्रूर हृदय हैं पाप आचरण करते हैं
जग में वे मेरी सृजित व्यवस्था अन्तर्गत, आसुरी योनियों को ही धारण करते हैं


मैं हूँ अप्राप्त मूढों को जन्मों जन्मों तक, भोगते वही आसुरी योनि की दुर्गति को
आसुरी योनियों से भी घोर नरक वाली, वे दुष्ट प्राप्त होते अत्यन्त नीच गति को


हैं आत्मविनाशक काम क्रोध लालसा सभी, यह इनका है गुणधर्म और मजबूरी है
ये तीनों ही नरकों का द्वार दिखाते हैं, इसलिए सर्वथा इनका त्याग जरूरी है


हे अर्जुन इन तीनों नरकों के द्वारों से, जो पुरुष स्वयं को पूर्णमुक्त कर पाता है
अपने कल्याण मार्ग पर जो नित चलता है, वह मुझे प्राप्त कर परमधाम पा जाता है


शास्त्रोक्त कर्म को त्याग पुरुष जो कामाचारी होता है
सुख सिद्धि परमगति नहीं किसी का भी अधिकारी होता है


हैं शास्त्र प्रमाणित, कार्याकार्य व्यवस्था में, तू तदनुरूप निज कर्मों का निष्पादन कर
शास्त्रानुसार जो नियत कर्म कहलाते हैं, हे अर्जुन तू उन कर्मों का सम्पादन कर


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Friday, 12 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम -पंद्रहवाँ अध्याय -पुरुषोत्तम योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -पंद्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम योग
 भगवान बोले

जिस तरु की होती ब्रह्मारूप मुख्यशाखा, मैं उस अश्वत्थ जगत की जड हूँ कहलाता 
सब वेद कहे जाते हैं पत्ते उस तरु के, जो उसे तत्व से जाने वही वेद ज्ञाता


गुण विषयों रूप कोपलें जगत वृक्ष की ये, तिर्यक नर योनि रूप में हैं सर्वत्र व्याप्त
कर्मानुसार ये ममता और अहंता भी, वासना जडें ऊपर नीचे हर जगह व्याप्त


संसार रूप यह वृक्ष नहीं है दृढ स्थित, इस जगत वृक्ष की जडें अनादि अनंता हैं
वैराग्य शस्त्र से यह तरु छिन्न भिन्न कर दे, जिस तरु की मूलें ममता और अहंता हैं


जिसको पाकरके पुनरागमन नहीं होता, उस परमेश्वर का पद पाने का उपक्रम कर.
यह जग प्रवृत्ति विस्तारित है जिसके कारण, उस प्रभु स्वरूप के मनन ध्यान का प्रक्रम कर


जिसने जीता है संगदोष कामना सहित, अध्यात्मनित्य जिनके मदमान समाप्त हुए
सुख दुख रूपी द्वन्दों से जो हैं पूर्ण मुक्त, वे ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त हुए


होता है प्रत्यागमन नहीं जिसको पाकर के, शशि पावक में वह चमक नहीं उसको चमका दे
वह धाम मेरा है अतुलित परम प्रकाश पुंज सा, सूरज में भी वह तेज नहीं उसको दमका दे


वह अंश मेरा है जो शरीर में जीवात्मा कहलाता है
प्रकृतिस्थ सभी इन्द्रिय मन का वह आकर्षण करवाता है


जैसे समीर हर गंधों को अपने सँग में ले जाता है
वैसे आत्मा इन्द्रिय मन को नूतन तन में ले जाता है


आत्मा मन प्राण त्वचा रसना कानों का आश्रय लेता है
एवं नेत्रादि इन्द्रियों से विषयों का सेवन करता है


तन त्याग, शरीरस्थिति अथवा हो विषयभोग, ये स्थितियाँ अज्ञानी नहीं जानते हैं
जो ज्ञान विवेक रूप नेत्रों के स्वामी हैं, वे तत्ववेत्ता ज्ञानी इन्हें जानते हैं


कुछ यत्नपरायण होते हैं जो योगीजन, इस आत्मा का सम्यक होता है ज्ञान उन्हें
शुद्धान्तःकरण नहीं  जिनका, हैं अज्ञानी, इसके बारे में होता है अज्ञान उन्हें


जो तेज चन्द्रमा में है जो है पावक में, तू उसको मुझ परमेश्वर का ही तेज जान
वह तेज सूर्य का, जिससे जगत प्रकाशित है, उसको भी मुझ परमात्मा का ही तेज जान


हो परम सूक्ष्म करके प्रवेश इस पृथ्वी में, निज ऊर्जा से भूतों को धारण करता हूँ
रस रूप अमृतमय सोम रूप धारण करके, सारी औषधियों का मैं पोषण करता हूँ


हर प्राणी के तन में रचने बसने वाले, वह प्राणवायु बन मैं स्थित हो जाता हूँ
मैं ही अपान मैं ही वैश्वानर अग्निरूप, होकर के स्वयं चतुर्विध अन्न पचाता हूँ


मुझसे ही स्मृति ज्ञान अपोहन होता है, सब भूतों के हृदयों में निष्ठित मैं ही हूँ
वेदों का मैं ही कर्त्ता भी हूँ ज्ञाता भी, वेदों में ज्ञान स्वरूप प्रतिष्ठित मैं ही हूँ


पाये जाते हैं दो प्रकार के पुरुष यहाँ, पहला है नाशवान दूजा अविनाशी है
सब भूत प्राणियों के शरीर हैं नाशवान, आत्मा ही कहलाता अक्षर अविनाशी है


इन दोनों से भी उत्तम अन्य पुरुष है जो, वह तीनों लोकों का पोषक है धाता है
जिसको अक्षर अव्यय अविनाशी कहते हैं, वह परमपुरुष ही परमात्मा कहलाता है


इस नाशवान जडवर्ग क्षेत्र से मैं अतीत, मैं जीवात्मा से भी उत्तम कहलाता हूँ
सारे वेदों में मेरा ही गुणगान भरा, सारे लोकों में पुरुषोत्तम कहलाता हूँ


हे अर्जुन ! जो भी ज्ञानी नर पुरुषोत्तम मुझे समझता है
मुझ वासुदेव परमेश्वर को वह सब प्रकार से भजता है


अत्यंत ज्ञानमय गुप्त शास्त्र, इससे जो युक्त यथार्थ हुआ
निष्पाप पार्थ ! यह तत्व जान वह, समझो पूर्ण कृतार्थ हुआ


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GITAMRITAM गीताऽमृतम -चौदहवाँ अध्याय - गुणत्रय विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -चौदहवाँ अध्याय
गुणत्रय विभाग योग


भगवान बोले


ज्ञानों में भी अति उत्तम जो वह तथ्य पुनः समझाऊँगा
जिससे मुनियों को मिली सिद्धि वह परम ज्ञान बतलाऊँगा


इसके आश्रय से मुझे प्राप्त नर जीवन ग्रस्त नहीं होता
यह ज्ञान प्राप्त कर प्रलय काल में व्याकुल त्रस्त नहीं होता


इस महत ब्रह्मरूपी निसर्ग की योनिमध्य, चेतनता रूपी गर्भ स्थापन करता हूँ
हे अर्जुन उस जड चेतन का संयोग करा, सारे भूतों का मैं उत्पादन करता हूँ


यह प्रकृति समस्त योनिधारी भूतों की होती है माता
हे अर्जुन गर्भाधान हेतु बनता मैं पिता वीर्यदाता


यह प्रकृति सत्व, रज तम पैदा करती शरीर में
जो अव्यय आत्मा को निबद्ध करते शरीर में


निश्पाप पार्थ उन तीनों में से एक सत्व, निर्मल होता है एवं है प्रकाशवान
बस एक सत्व गुण होता है विकारवंचित, उससे सम्बन्धित होता है सुख और ज्ञान


हे अर्जुन ! यह रज गुण होता है रागरूप, मानव मन को तृष्णाओं से आबद्ध करे
आसक्ति और कामना रूप संजालों से, आत्मा को कर्मों के फल से सम्बद्ध करे


अज्ञान तमस उत्पन्न करे हे महाबाहु, इससे सारे जीवों का मोहन होता है
निद्रा आलस्य प्रमाद अनेक विचारों का, इस जीवात्मा पर दुष्कर बंधन होता है


हे पार्थ ! सत्व गुण सदा पुरुष का सुख आनन्द बढाता है
रज गुण  मानव को कर्मों के निष्पादन को उकसाता है
तम गुण मानव के ज्ञान बुद्धि को आच्छादित करके रहता
जिसके कारण नर के शरीर में आलस घर कर जाता है


रज और तमोगुण का होता जब दलन कभी, अर्जुन जीवों में तभी सतोगुण बढता है
रज और सत्व के दबने से तम गुण बढता, तम सत्व क्षीण होता है तो रज बढता है


जिस समय देह के सब द्वारों में ज्ञान विवेक प्रकाशित है
उस समय सत्वगुण का प्रभाव समझो परिपूर्ण विराजित है


फल की अभिलाषा से सारे कर्मों का निष्पादन होता
मानव जब लोभ प्रवृत्ति स्वार्थ के सोपानों पर चढता है
होती उत्पन्न अशान्ति, विषय भोगों में आकांक्षा करता
हे अर्जुन ! पुरुष देह में समझो तभी रजोगुण बढता है


कर्मों में अरुचि प्रमाद बढे, हो अहंकार एवं मोहन
तब होती वृद्धि तमोगुण की ऐसा समझो हे कुरुनन्दन


यदि सत्व बढा हो उस क्षण मानव मृत्यु प्राप्त होता है
शुभकर्मा का उसको निर्मल लोक प्राप्त होता है


जिसकी हो मृत्यु रजोगुण में, मानव की योनि उसे मिलती
तम गुण मृतकों को जीव जन्तुओं जैसी मूढ योनि मिलती


राजस कर्मों का फल दुखमय होता है, सात्विक से वैराग्य और सुख ज्ञान जान
अंधकार देता है तामस कर्म सदा, उसके ही प्रतिफल को तू अज्ञान जान


लोभ सदा उत्पन्न रजोगुण से होता, सत्व गुणों से होता है सद्ज्ञान उदय
मोह प्रमाद तमोगुण से उत्पन्न जान, औए उसी से होता है अज्ञान उदय


स्वर्गादि उच्च लोकों को पाते सत्वगुणी, जो रजोगुणी वे मर्त्यलोक को जाते हैं
जिनकी है घोर जघन्य तमोगुण की प्रवृत्ति, तामसी पुरुष नरकादि लोक को जाते हैं


कोई दृष्टा जिस समय सत्व रज तम गुण के, अतिरिक्त किसी को कर्त्ता नहीं मानता है
उसको मेरे स्वरूप को प्राप्त हुआ समझो, जो मुझ ईश्वर को इनसे परे जानता है


काया के कारण होते सत्व और रज तम, जो तीनों गुण का उल्लंघन कर जीता है
वह जरा मृत्यु जन्मों के दुख से मुक्त हुआ, ईश्वर को पाकर आनन्द अमृत पीता है


अर्जुन बोले


इन तीन गुणों का जो उल्लंघन कर जाता, क्या लक्षण उसके कैसा होता है प्रतीत
वह प्राणी इस जग में किस तरह बरतता है, जो प्राणी होता है इस गुणत्रय से अतीत


भगवान बोले


जो पुरुष सत्व रज तम गुण के छा जाने पर, है प्रकट न करता उनसे द्वेष अनिच्छा भी
अथवा उनसे सम्यक निवृत्त हो जाने की, मन में रहती है जिसके तनिक न इच्छा भी


जो साक्षी के समान स्थित निश्चल होकर, गुण गुण में सदा बरतते यही समझता है
हो एकनिष्ठ सच्चिदानन्द घन में स्थित, फिर इस स्थिति से कभी न विचलित होता है


जो आत्मभाव में स्थित सुख दुख सम समझे, ज्ञानी, प्रिय अथवा अप्रिय जिसे समान लगे
कोई करता हो निंदा अथवा स्तुति भी, जिस नर को यह सारा वर्ताव समान लगे


अपमान मान दोनों में ही जो सम रहता, अरि मित्र सभी के प्रति समता अपनाता है
निज कर्त्तापन के अहंकार से रहित हुआ, होता जो नर वह, गुणातीत कहलाता है


जो पुरुष अचंचल भक्तियोग से मुझमें ध्यान लगाता है
वह गुणातीत होकर के मेरी प्राप्ति योग्य बन जाता है


उस परमब्रह्म, उस नित्यधर्म, उस अमृत का मैं आश्रय हूँ
उस अविनाशी आनन्द महासुख का भी मैं परमाश्रय हूँ


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Wednesday, 10 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - तेरहवाँ अध्याय -क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - तेरहवाँ अध्याय
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

भगवान बोले

हे अर्जुन ! नर शरीर ही क्षेत्र कहा जाता, जो इसे जानता है क्षेत्रज्ञ कहाता है
क्षेत्रज्ञ नाम से जाना जाता है आत्मा, ऐसा जो समझे वह तत्वज्ञ कहाता है


है क्षेत्र कही जाती निसर्ग यह विकृतियुक्त, अर्जुन ! मुझको सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ जान
क्षेत्रज्ञ नाम से जाना जाता पुरुष तत्व, जो इसे जान लेता है वह है ज्ञानवान


जिस कारण यह उत्पन्न हुआ वह कारण भी बतलाऊँगा
यह क्षेत्र जहाँ है जैसा है जो कुछ भी है उसमें विकार
क्षेत्रज्ञ किसे कहते सचमुच होता उसका प्रभाव क्या है
कहता हूँ साररूप उनको, हे अर्जुन सुन मेरे विचार


क्षेत्रज्ञ क्षेत्र का तत्व गया है बतलाया, ऋषि मुनियों एवं विविध वेद मंत्रों द्वारा
उनका विधिवत विभागशः हुआ निरूपण है, सम्यक वर्णित है ब्रह्मसूत्र पदों द्वारा


मन बुद्धि प्रकृति हैं इसमें पाँचों महाभूत, है अहंकार भी इसमें दस इन्द्रियों सहित
यह क्षेत्र समस्त विकारों का है संवाहक, स्पर्श, रूप, रस, शब्द, गन्ध हैं आदि निहित


इच्छा, ईर्ष्या, सुख दुख का इसमें समावेश, है युक्त स्थूल देह के पिण्डाकारों से
इसके अवयव में हैं चेतना धारणा भी, आच्छादित है यह क्षेत्र अनेक विकारों से


जिसमें मानाभिमान एवं छल दम्भ आचरण का अभाव
हिंसा विहीन मन वाणी की शुचिता पवित्रता क्षमा भाव
गुरु के चरणों में श्रद्धा हो बाहर भीतर की शुचिता हो
स्थिरमन ज्ञानयुक्त है वह जिसका ऐसा है हाव भाव


जो जन्म मृत्यु दुख दोष रोग वृद्धापन पर, करता है नहीं बिना कारण कोई चिंतन
निरहंकारी, भोगों के प्रति आसक्तिरहित, जिसका हो वश में निज शरीर निज इन्द्रिय मन


जो पत्नी पुत्र भवन धन में आसक्त न हो, जग में न किसी के भी प्रति जिसकी ममता हो
अप्रिय अथवा प्रिय वस्तु प्राप्त हो जाने पर, मन पर काबू रखने की जिसमें क्षमता हो


मुझ परमेश्वर का जो अनन्य चिंतन करता, जो सतत मुझे भजता रहता है भक्ति सहित
जिसको प्रिय होता शुद्ध तथा एकांतवास, वह ज्ञानी, जो विषयों से हो आसक्ति रहित


अधात्मज्ञान में नित्य निरंतर रति स्थिति को ही, तत्वार्थरूप में ईश्वर दर्शन ज्ञान कहा जाता है
इसके विपरीत सभी वह जो कुछ है इस दुनिया में, वह ज्ञान नहीं है, वह केवल अज्ञान कहा जाता है


सत अथवा असत नहीं है वह, वह है अनादि, है परमब्रह्म, जो परमानन्द प्रदाता है
उसके बारे में भलीभाँति बतलाऊँगा, है वही ज्ञेय, वह सबसे बढकर ज्ञाता है


उसके फैले हैं पद कर सभी दिशाओं में, सिर नेत्र और मुख फैले सभी दिशाओं में
सब ओर सभी कुछ सुनता है वह कानों से. जग को आच्छादित करके सभी दिशाओं में


यद्यपि वह है इन्द्रियों तथा आसक्ति रहित, इन्द्रिय विषयों को वही जानने वाला है
निर्गुण होकर भी गुणभोक्ता कहलाता है, वह सबका धारण पोषण करने वाला है


जड जंगम सब भूतों के बाहर भीतर है, या ऐसा कह लें वह स्वयमेव चराचर है
वह अति समीप एवं अत्यंत दूर स्थित, सूक्ष्मातिसूक्ष्म है उसे जानना दुष्कर है


वह परमात्मा अविभाज्य रूप से व्योम सदृश परिपूर्ण व्याप्त
दिखता विभक्त जड जंगम में सम्पूर्ण जगत का धारक है
है एक मात्र वह सब कुछ, जो जानने योग्य है इस जग में
वह ब्रह्मा विष्णु महेश रूप कर्त्ता धर्ता संहारक है


वह सभी ज्योतियों से बढकर है परमज्योति, माया से भी उसको अति परे कहा जाता
बोधस्वरूप है तत्वज्ञान से ज्ञेय प्राप्य, सबके हृदयों में स्थित उसे कहा जाता


यह क्षेत्र, ज्ञान एवं परमात्मा का स्वरूप, जो परम ज्ञेय है उसको मैं बतलाता हूँ
जो तत्वज्ञान का आश्रय ले इसको जाने, ऐसे ही अपने भक्तों को अपनाता हूँ


यह प्रकृति और यह पुरुष अनादि कहे जाते, ये नहीं किसी के द्वारा हैं उत्पन्न जान
ये विषय विकार त्रिगुणमय जो भी हैं पदार्थ, बस प्रकृति मात्र से ही इनको उत्पन्न जान


यह कार्य करण उत्पत्ति कर्म निसर्ग द्वारा ही होता है
सुख दुख का भोग सदा इस जीवात्मा द्वारा ही होता है


प्रकृतिस्थ पुरुष उन त्रिगुणरूप द्रव्यों का आस्वादन करता
साहचर्य गुणों से अच्छी बुरी योनियों को धारण करता


साक्षी होने से उपदृष्टा, सम्मति देने से अनुमंता, 
मानव शरीर में स्थित यह जीवात्मा ही परमात्मा है
 यह भर्ता है यह भोक्ता है ब्रह्मादिक देवों का स्वामी
सच्चिदानन्दघन शुद्ध ब्रह्म होने से यह परमात्मा है


इस तरह पुरुष एवं निसर्ग के गुणों सहित, जो मानव इसका पूर्ण ज्ञान पा लेता है
कर्मों कर्तव्यों का भी निष्पादन करके,संसार चक्र में फिर फिर जन्म न लेता है


कुछ ज्ञानयोग के द्वारा परमात्मा का दर्शन करते हैं
कुछ लोग देखते हैं ईश्वर को सूक्ष्म बुद्धि ध्यान द्वारा
कुछ अन्य लोग जो सुगम मार्ग मध्यम पथ  का अश्रय लेकर
निष्काम भाव से उसे प्राप्त करते हैं कर्मयोग द्वारा


इनसे भी इतर अन्य जो हैं कुछ मन्दबुद्धि, वे सुनकर ही प्रभु की उपसना करते हैं
वे श्रवण परायण नर भी बडी सुगमता से, निश्चित ही मृत्युअरूप भवसागर तरते हैं


हे भरतर्षभ ! इस जग में जो कुछ भी स्थावर जंगम है
उनकी उत्पत्ति हेतु केवल, क्षेत्रज्ञ क्षेत्र का संगम है


जो भूतों में अविनाशी ईश्वर का परमार्थ देखता है
सबमें समस्थ देखे जो प्रभु को वही यथार्थ देखता है


सब भूतों में स्थित ईश्वर समभावपूर्ण, ऐसा जिसका चिंतन है जिसकी सन्मति है
अन्यों का वध करना होगा निज वध समान, जो ऐसा समझे मिलती उसे परमगति है


सब कर्मों को यह प्रकृति स्वयं ही करती है, ऐसा जिसका विचार है जिसका दर्शन है
आत्मा को मात्र अकर्त्ता देखे कर्मों में, उस मानव का ही दर्शन सम्यक दर्शन है


जब पुरुष विभिन्न स्वरूपों में परमात्मा में, देखे सुस्थिर संव्याप्त सभी भूतात्मा को
सब भूतों में जब ईश्वर का विस्तार दिखे, हो जाता है वह प्राप्त तभी परमात्मा को


अर्जुन अनादि निर्गुण अविनाशी होकर भी, परमात्मा मानव के शरीर में स्थित है
वास्तव में परमात्मा कुछ स्वयं नहीं करता, निर्लिप्त भाव से सदा विराजित संस्थित है


जैसे सर्वत्र व्याप्त है नभ अत्यंत सूक्ष्म, पर किसी वस्तु से किंचित लिप्त नहीं होता
वैसे शरीर में स्थित निर्गुण आत्मा भी, नर देह दोष गुण से संलिप्त नहीं होता


बस एक सूर्य से ज्यों अर्जुन सारा ब्रह्माण्ड प्रकाशित है
वैसे यह क्षेत्र शरीर रूप आत्मा से पूर्ण प्रकाशित है


क्षेत्रज्ञ क्षेत्र का अन्तर जिसने समझ लिया, जिससे हो भूत प्रकृति बंधन से मुक्ति प्राप्त
जिसने जाना यह तत्वज्ञान नेत्रों द्वारा, उस ज्ञानी को होता ईश्वर का धाम प्राप्त


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Tuesday, 9 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - बारहवाँ अध्याय -भक्ति योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - बारहवाँ अध्याय 
भक्ति योग


अर्जुन बोले


कुछ भक्त सतत भजते प्रभु का साकार रूप, कुछ निराकार सच्चिदानन्द का करें ध्यान
ऐसे हैं जग में दो प्रकार के योगवान, उन दोनों में से कौन अधिक होता महान ?


भगवान बोले


जो श्रद्धा से मुझ सगुण रूप परमेश्वर के, एकाग्रचित्त हो भजन ध्यान में लगते हैं
होते हैं वही मान्य उत्तम योगी मुझको, वे योगयुक्त मुझको अतिशय प्रिय लगते हैं


सर्वत्रव्याप्त, अक्षर, अचिन्त्य का रूप सदा, अपने अनस्तल में दृढ धारण करते हैं
कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अनिर्देश्य, अव्यक्त नाम, होकर ध्यावस्थित उच्चारण करते हैं


सारे इन्द्रिय संस्थानों को वश में करके, सर्वत्र समत्वबुद्धि अन्तर्गत रहते हैं
वे मानव मुझको ही होते हैं प्राप्त सदा, जो सब विधि भूतों के हित में रत रहते हैं


जो निराकार में रखते हैं आसक्ति भक्ति, उन पुरुषों के साधन में अधिक परिश्रम है
देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त विषय, की गति अत्यधिक कठिन दुखपूर्ण अधिकतम है


पर मेरे परम परायण मेरे आराधक, अपने कर्मों को मुझमें अर्पण करते हैं
जो एक अनन्य भक्ति से मुझ परमेश्वर का, निशिदिन मन में आराधन चिन्तन करते हैं


सम्पूर्ण चेतना इन्द्रिय मन निवेश करके, मुझमें जो रच बस जाता मेरा आराधक
इस मृत्यु रूप भवसागर से निश्चित उसका, हे अर्जुन ! शीघ्र स्वयं मैं बनता उद्धारक


तेरे द्वारा मन और बुद्धि का यदि मुझमें निवेश होगा
तो निश्चय ही मुझमें तेरी स्थिति तेरा प्रवेश होगा


यदि लगे न मन मुझमें तेरा, तो अर्जुन बस इतना ही कर
अभ्यास योग से युक्त हुआ मुझको पाने की इच्छा कर


अभ्यास योग भी दुष्कर हो, कर्मों को कर अर्पण मुझको
मेरे निमित्त कर्मों का अर्पण सिद्धि दिलायेगा तुझको


यदि मेरी प्राप्ति योग का अश्रय भी है नहीं तेरे वश में
कर्मों के फल का त्याग करे, करके मन बुद्धि पूर्ण वश में


मर्महीन अभ्यास कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञानयोग से परमेश्वर का ध्यान श्रेष्ठ है
त्याग सदा मानव को परम शान्ति देता है, ध्यानस्थिति से कर्मपाक परिदान श्रेष्ठ है


भूतों के प्रति करुण, मित्रवत, द्वेषरहित, अहंकार ममता विहीन हो दयावान
ऐसा ही योगी मुझको प्रिय लगता है, सुख दुख में समभाव युक्त हो क्षमावान


जो योगी मन में सदैव संतुष्ट रहे, जिसकी आत्मा में दृढनिश्चय होता है
मुझमें पूर्ण समर्पित जो मन बुद्धि सहित, ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है


जिसको किसी जीव से हो उद्वेग नहीं, जिससे जीवों को उद्वेग न होता है
हर्ष, क्षोभ, भय उद्वेगों से मुक्त हुआ, वह भी मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है


पक्षपात से मुक्त, निपुण, हो व्यथाहीन, जो अनपेक्ष और शुचिता मय होता है
सब प्रकार के आरम्भों का परित्यागी, ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है


जिसके मन में होता है हर्ष न शोक कभी, कांक्षाविहीन विद्वेषरहित जो होता है
शुभ और अशुभ कर्मों का परित्यागी होता, ऐसा ही भक्तिमान मुझको प्रिय होता है


जो शत्रु मित्र के प्रति समदर्शी होता है, मानापमान में स्थित है समबुद्धि सहित
सर्दी गर्मी सुख दुख में जो समान रहता, जो मानव होता अभिलाषा आसक्ति रहित


जो रहता तुल्य प्रशंसा निन्दा में सदैव, जिस तिस प्रकार संतुष्ट मौनव्रत होता है
अपने निवासस्थल के प्रति आसक्ति रहित, वह स्थिरबुद्धि भक्त मुझको प्रिय होता है


मेरे द्वारा यथोक्त धर्म्यामृत वचनों के, सेवन उपासना में जो सक्रिय होते हैं
मुझमें केवल जिन भक्तों की श्रद्धा होती, वे भक्त मेरे मुझको अतिशय प्रिय होते हैं ||


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Sunday, 7 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - ग्यारहवाँ अध्याय -विश्वरूप दर्शन योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - ग्यारहवाँ अध्याय
विश्वरूप दर्शन योग

अर्जुन बोले 


अध्यात्म परक इन बचनों से सब कुछ स्पष्ट हो गया है
इन कृपापूर्ण उपदेशों से मन का भ्रम नष्ट हो गया है


हे कमलनेत्र ! भूतों का प्रभव प्रलय साभार सुना मैंने
प्रभु मुख से प्रभु की अविनाशी महिमा विस्तार सुना मैंने


भगवान ! अब तक जो कुछ मुझको बतलाया है, उसमें अन्यथा नहीं, वह सब कुछ वैसा है
बल, वीर्य, शक्ति, ऐश्वर्य, ज्ञान मय प्रभु स्वरूप, प्रत्यक्ष देखना चाहूँगा वह कैसा है


प्रभु ! मेरे द्वारा देखा जाना यदि संभव हो बतलायें
हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन करवाएँ


भगवान बोले


हे पार्थ देख! सैकडों हज़ारों रूपों को, नाना प्रकार के और विविध वरंओं वाले
नाना प्रकार के देख मेरे आकारों को, हैं परम अलौकिक और दिव्य रूपों वाले


अब तक जो देखे नहीं जा सके कभी किसी के द्वारा भी, 
हे अर्जुन ! देख अदिति के बारह पुत्रों के अवतारों को
आठों वसुओं, ग्यारह रुद्रों से युक्त रूप विस्मयकारी
उनचास मरुद्गण देख और दोनों अश्विनी कुमारों को


मेरे शरीर में सचराचर स्थित समग्र संसार देख
हे अर्जुन तू इच्छानुरूप जो चाहे वह साकार देख


तू देख न पायेगा प्राकृत नेत्रों से है देखना व्यर्थ
देता हूँ दिव्य चक्षु जिससे मेरे दर्शन में हो समर्थ


संजय बोले


हे राजन ! योगेश्वर हरि ने अर्जुन को जब यह बतलाया
तदनन्तर परम विराट रूप ईश्वर का उसको दिखलाया


जिनके अनेक मुख नेत्र विविध रूपों वाले, आश्चर्य चकितकारी अद्भुत दर्शन वाले
हाथों में लिए अनेक दिव्य शस्त्रास्त्रों को, हैं परम विभूषित जो दिव्याभूषण वाले


जो दिव्य वस्त्र एवं माला धारण करते, जिनके शरीर में दिव्य गंध का अनुलेपन
जो विस्मयकारी रूप और आश्चर्यपूर्ण, विश्वतमुख महाविराट स्वरूप परम चेतन


यदि एक साथ नभ में सहस्र आदित्य उगें, संकलित रूप से वह उष्मा एवं प्रकाश
उसकी तुलना उससे शायद ही हो पाये, जो विश्वरूप परमात्मा का होता प्रकाश


वे विविध भाँति के पृथक पृथक सम्पूर्ण जगत, 
उस क्षण सब कुछ थे दिए दिखा अर्जुन को
देवाधिदेव श्रीकृष्ण चन्द्र की काया में 
दिखलाई पडे सभी स्थायी अर्जुन को


आश्चर्यचकित पुलकित शरीर हो, अर्जुन ने मन थाम लिया
फिर शीश झुकाकर विश्वरूप प्रभु को करबद्ध प्रणाम किया


अर्जुन बोले


मैं देख रहा हूँ देव तुम्हारी काया में, देवों, ऋषियों को, योगारूढ उपायों को
कमलासनस्थ ब्रह्मा को, अद्भुत सर्पों को, जग के विभिन्न भूतों के उन समुदायों को


हे सकल विश्व के स्वामी विश्वविराट रूप, हैं आप विभिन्न हाथ, मुख, उदर, नेत्रधारी
प्रभु मुझको आप अनन्त रूप में दिखते हैं, है आदि न मध्य न अन्त सर्वजनहितकारी


सिर पर शोभित है मुकुट हाथ में गदा चक्र, दग्धानल रवि सम दीप्तिपूर्ण द्युति पुंज रूप
है जिसका दर्शन करना होता बडा कथिन, मैं प्रभु का देख रहा हूँ अप्रमेय रूप


हैं वेदितव्य, परमाक्षर, आप सकल जग में, इस जग के परम निधान आप मेरा मत है
अव्यय स्वरूप हैं शाश्वत धर्मगोप्ता हैं, हैं पुरुष सनातन ऐसा मेरा अभिमत है


मध्यान्त आदि से रहित अपरिमित शक्तियुक्त, अनगिनत भुजा, शशि रवि समान नेत्रों वाले
जिसके तापों से तप्त हो रहा सकल जगत, प्रज्ज्वलित अग्निज्वाला समान वक्त्रों वाले


द्यावा पृथ्वी के मध्य शून्यमय अन्तराल, हे प्रभु ये सभी आप ही द्वारा निर्मित हैं
यह उग्र भयंकर अद्भुत रूप देख करके, हैं भयाक्रांत ये तीनों लोक प्रव्यथित हैं


कुछ देवों के संकाय आप में करते दिखते हैं प्रवेश,
कुछ भय से नाम गुणों का उच्चारण कर करते अभिवादन
सिद्धों महर्षियों का समूह उत्तम उत्तम स्तोत्रों से
करते दिखते हैं मुझको प्रभु की स्तुति और स्वस्ति वाचन


आदित्य, रुद्र, वसु, विश्वेदेव, अश्विनिकुमार, राक्षस, उनचास मरुद्गण एवं पितर निकर
गन्धर्व, यक्ष, सब साध्यों, सिद्धों के निकाय, वे सब प्रभु तुमको देख रहे विस्मित होकर


मय विविध नेत्र, मुख, जंघा, पद, कर, उदर, दंत, प्रभु के इस भयकारी स्वरूप से सब आकुल
हे महाबाहु, जो रूप आपने दिखलाया, वह महाभयंकर रूप देख मैं हूँ व्याकुल


नभचुम्बी दीप्त विविधवर्णी विस्तारित मुख, प्रज्ज्वलित नेत्र , भय से आक्रांत  हो गया हूँ
भयभीत मनःस्थिति में धीरज खो करके, हे विष्णु, देखकर रूप अशान्त हो गया हूँ


विकराल दंतमय, प्रलयकाल की अग्निसदृश प्रज्ज्वलित रूप
प्रभु का मुख महाकराल देख मैं भूला सभी दिशाओं को
मन का सुख, शान्ति, खुशी सारी अब आज तिरोहित हुई प्रभो
हे जगन्नथ प्रस्फुटित करें अपनी प्रसन्न मुद्राओं को


प्रभु के शरीर में समा रहे धृतराष्ट्र पुत्र, मैं देख रहा भूपालों के समुदाय सहित
उन भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, सूतसुत को, अपनी सेना के प्रमुख युयुत्स निकाय सहित


अत्यन्त वेग से दौड रहे हैं सब के सब, प्रबु के विशाल मुख में प्रवेश करते दिखते
कुछ योद्धाओं के पूर्ण विदीर्ण हुए हैं शिर, वे सभी आप के दाँतों में लटके दिखते


जैसे अनेक सरिताओं की जलधाराएं, उद्यत होती हैं सागर में मिल जाने को
वैसे संसारलोक के ये सब योद्धा नर, गतिमान हुए, मुख में विलीन हो जाने को


जैसे देदीप्यमान हो कोई दीपशिखा, उस पर गिरते हैं शलभ नष्ट हो जाने को
वैसे विकराल आप के मुख में ये योद्धा, करते प्रवेश सारे विनष्ट हो जाने को


लोकों को ग्रास बनाते आप दीखते हैं, अत्यन्त चावपूर्वक लेलिह्यमान होकर
हे विष्णु प्रचण्ड तेज से अपने इस जग को, प्रभु तपा रहे हैं आप प्रकाशवान होकर


हैं कौन आप अति उग्र रूपवाले स्वामी, हे देवप्रवर दीजिए आप अपना परिचय
होकर प्रसन्न अपने बारे में बतलाएं, हे आदिपुरुष स्वीकार करें मेरा अनुनय


मैं हुआ प्रवृत्त नष्ट करने को लोकों को, मैं आदि पुरुष, कर्त्ता भी संहर्ता कराल हूँ
इन योद्धाओं को बिना युद्ध ही मरा समझ, मैं इन लोकों का नाशक वर्धित महाकाल हूँ


उठ जा इसलिए प्राप्त कर यश बन शत्रुजीत, धनधान्यपूर्ण यह राज्यभोग सुख पायेगा
इन दुष्टों को पहले ही मार चुका हूँ मैं, अर्जुन तू केवल विजयहेतु कहलायेगा


तू मार प्रतीक रूप में जिनको मैंने नष्ट कर दिया है
इन द्रोणाचार्य, भीष्मजयद्रथ इन सूतपुत्र योद्धाओं को
इसलिए पूर्ण निर्भय होकर निज तन मन से कर महासमर
निश्चय ही रण में जीतेगा तू इन वैरी सेनाओं से


संजय बोले


केशव के वचनों को सुनकर किरीटधारी, अर्जुन ने हाथ जोडकर किया नमन भय से
होकर सकम्प फिर बारम्बार प्रणाम किया, गदगद वाणी से कुछ कहने के आशय से


अर्जुन बोले


यह सभी आपकी कीर्ति नाम गुण का प्रभाव, यह सारा जग अनुराग हर्ष को प्राप्त हुआ
सिद्धों के गण करते हैं नमस्कार चहूँदिशि, हैं भाग रहे राक्षस भय उनमें व्याप्त हुआ


प्रभु नमन आपको करने से कैसे निज को वंचित कर लूँ,
हैं आप विधाता के भी धाता आप स्वयं हैं जगद्धाम
हे देवेश्वर महात्मन आप परे हैं असत और सत से
सच्चिदानन्दघन ब्रह्म आप को मेरा है शतशः प्रणाम


हैं आप सनातन पुरुष आप ही आदिदेव, इस सकल जगत के आश्रय और निधान आप
इस जग के ज्ञाता, ज्ञेय, और हैं परमधाम, चर और अचर में व्याप्त अनन्त अमान आप


हैं आप प्रजापति अग्नि वायु यम वरुण स्वयं, हे प्रभु स्वीकारें मेरा नमन हजार बार
हैं आप सभी के पिता और प्रपितामह हैं, हम करते बारम्बार आपको नमस्कार


हैं आप अनन्त शक्तिशाली हे सर्वात्मन, आगे से भी पीछे से भी है नमस्कार
हे अमितवीर्य अनन्तविक्रम हे जगव्यापी, स्वीकार करें प्रभु सभी दिशा से नमस्कार


प्रभु की महिमा से मैं सदैव अनभिज्ञ रहा, हे कृष्ण कहा, हे यादव अथवा सखा कहा
हे अच्युत जो भी प्रेम प्रमाद हठात कहा, बस क्षमा करें मुझको यदि कुछ अन्यथा कहा


शय्या आसन भोजन विहार विनोद के क्षण, मत ध्यान धरें अपमानों को प्रतिवादों को
प्रभु क्षमा करें एकाकी अथवा सार्वजनिक, मेरे अनुचित व्यवहारों या अपराधों को


 इस जड चेतन जग के कर्त्ता गुरु आप स्वयं, प्रभु से कोई अत्यधिक कहाँ हो सकता है
तीनों लोकों में आप सदृश दूसरा नहीं, है नहीं सदृश तो अधिक कहाँ हो सकता है


क्षमा दूसरों को इस जग में क्षमाशील करते जैसे
पिता पुत्र को, सखा सखा को, पति पत्नी को क्षमा करें
प्रभु मैं काया सहित आप के चरणों में प्रणिपात करूँ
वैसे ही अपराध हमारे हे परमेश्वर क्षमा करें


मन मेरा भय से व्याकुल व्यग्र अधीर हुआ, देखूँ अदृष्ट अद्भुत स्वरूप हर्षित होकर
इसलिए चतुर्भुज विष्णुरूप का दर्शन दें, मुझको हे जगन्निवास परम प्रसन्न होकर


प्रभु के सिर पर स्वर्णिम किरीट हो यही देखना चाहूँगा
हो एक हाथ में गदा, दूसरे कर में चक्र सुदर्शन हो
वह रूप चतुर्भुज दिखलाकर मुझको अब पूर्ण कृतार्थ करें
हे सहसबाहु अब इच्छा है बस उसी रूप का दर्शन हो


भगवान बोले


निज योगशक्ति की माया से तुझको अर्जुन, होकर प्रसन्न अपना यह रूप दिखाया है

तेजस्स्वरूप यह महाविराट असीम रूप, तेरे अतिरिक्त दूसरा देख न पाया है

इस मृत्युलोक में अर्जुन मेरा विश्वरूप, प्राणी द्वारा देखा जा सकता नहीं कभी
तप, दान, वेद, यज्ञों से, अन्य क्रिया से भी, तेरे सिवाय देखा जा सकता नहीं कभी

मन को व्यथा विहीन, विमूढ भाव को तज, भयभीत न हो मेरा विकराल स्वरूप देख
अब हो जा तू विस्मय भय रहित प्रसन्नमना, अर्जुन ! मेरा फिर वही चतुर्भुज रूप देख

संजय बोले

प्रभु वासुदेव ने अर्जुन से इतना कहकर, अपना वह रूप चतुर्भुज फिर से दिखलाया
भगवान कृष्ण ने सौम्य रूप धारण करके, भयभीत हुए अर्जुन को धीरज दिलवाया

अर्जुन बोले

अत्यन्त शान्त नर रूप देखकर हे केशव, मैं इस क्षण स्थिरमति को प्राप्त हो गया हूँ
भय विस्मय की स्थिति अब मन से दूर हुई, निज स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ

भगवान बोले

जो रूप चतुर्भु तुमने मेरा देखा है, दुर्दर्श बडा है, इसका दर्शन है दुर्लभ
लालायित रहते दर्शन को देवता सभी, होता है बडी कठिनता से यह उन्हें सुलभ

जैसे तुमको यह रूप चतुर्भुज दिखलाया, यह मेरा रूप नहीं देखा जा सकता है
वेदों, तप, दान, यज्ञ अथवा कोई विधि हो, उनसे यह रूप नहीं देखा जा सकता है

प्रत्यक्ष किया जा सकता हूँ जिसके द्वारा, अर्जुन ! मानव के पास महान शक्ति है वह
मुझमें प्रवेश, मेरा दर्शन जिससे सम्भव, हे परम तपस्वी ! एक अनन्य भक्ति है वह

जो निज कर्मों का अर्पन मुझमें करता है, मुझ पर आश्रित हो, द्वेषपूर्ण अभिव्यक्ति रहित
सबके प्रति हि निर्वैर भाव, वह भक्तिमान, होता है प्राप्त मुझे, जो है आसक्ति रहित

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