Friday, 7 October 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम-श्री मद भगवद गीता के ७०० श्लोकों का हिन्दी पद्यांतरण

GITAMRITAM गीताऽमृतम-श्री मदभगवद गीता के ७०० श्लोकों का हिन्दी पद्यांतरण
नम्र निवेदन


मुनिश्रेष्ठ श्री वेदव्यास द्वारा रचित भगवान श्री विष्णु के मुख सरसिज से उद्भूत वाणी ’श्री मदभगवद गीता’ का हिंदी पद्य रूपान्तरण स्वरूप ’गीतामृतम’ सम्पूर्ण होकर जन गण मन को समर्पित है ।
सर्व प्रथम मैं अपने साहित्यिक गुरु पूज्यपाद श्री विजय शंकर शुक्ल जी के चरणकमलों में अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ जिनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से मुझे सर्वदा आत्मबल मिला ।

उन कवियों/ साहित्यकारों, जिन्होंने राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट एवं प्रसारित करने के निमित्त ”राष्ट्रीय साहित्य सेवा संस्थान’ परिवर्तित नाम ’राष्ट्रीय समग्र सेवा संस्थान’ की स्थापना से लेकर संचालन तक में अपना अमूल्य योगदान दिया, जिनमें डा. सुग्रीव सिंह ’विमल’, डा. किशोरी शरण शर्मा, आर्य भूषण गर्ग, श्याम नारायण पाण्डेय, स्व. विश्व नाथ सिंह ’विकल गोण्डवी’, विश्वम्भर नाथ पाण्डेय, देवकी नन्दन ’शान्त’, विजय त्रिपाठी प्रभृति अनेक अक्षरब्रह्म साधकों का नाम उल्लेखनीय है, को भी उनके उस योगदान के लिए सदैव स्मरण रखूँगा ।

गीता के विषय में मैं यह कहना चाहूँगा कि गीता मानव को उत्तम जीवन जीने का कौशल सिखाती है ।
गीता किसी व्यक्ति, समूह, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग विशेष नहीं अपितु सम्पूर्ण चराचर जगत के कल्याण मार्ग का साधन है ।

गीता ज्ञान धारण करके मनुष्य हिंसा, भय, दुख, पश्चात्ताप, निराशा, आलस्य, अकर्मण्यता, लोलुपकामना, पाप आदि कुविचारों से मुक्त हो जाता है ।

गीता भुक्ति से विरत कर, युक्ति एवं मुक्ति पथ पर ले जाती है ।

इस कृति में प्रायः मुक्तक विधा का प्रयोग किया गया है । काव्य की प्रभावोत्पादकता बनी रहे इसका ध्यान रखने का प्रयास किया गया है ।

मेरा प्रयास रहा है कि गीता के मूल संस्कृत श्लोकों में प्रयुक्त शब्दों एवं भावार्थों का अधिकाधिक समावेश हो, एवं मुख्य धारा से विचलन न हो ।
आशा है कि इसे पढ कर लोक मानस में राष्ट्र प्रेम के साथ "सर्वे भवन्तु सुखिन” की भावना पुष्ट होगी ।

सर्वभूतहितेरत-
स्वामी दिनेशानन्द
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गुरुदेवादि वंदना
सद्गुरु के श्री चरणों में पूर्ण समर्पित मन धन गात करूँ
उनके आदर्शों आचरणों के प्रति सश्रद्ध प्रणिपात करूँ
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेश रूप गुरु अमल विमल मति देता है
वह कल्पवृक्ष सर्वदा अयाचित नर को शुभ गति देता है
गुरु परमब्रह्म परमाश्रय है उससे चलता जग सारा है
गुरु ज्ञान सर्वाहितकारी है पावन गंगा की धारा है

गणपति सुखदायक वीर विनायक वक्रतुण्ड का अभिनन्दन
दारुण दुख बाधा क्लेश कष्टहारी को कोटि कोटि वन्दन
जिनकी हो जाये कृपा दृष्टि मिट जायें सब करुणा क्रन्दन
सब पर हो कृपावृष्टि हे लम्बोदर गौरी शंकर नन्दन
द्रुतलेखी ज्ञान निधान महा पितु मातु भक्त दुखहारी हो
हे महाकाय रवि कोटि प्रभायुत गजमुख सब सुखकारी हो
हे संकट मोचन सुवन त्रिलोचन बहुविधि भव भय हारी हो
मंगलकारी सर्वदा सर्वजनहितकारी अविकारी हो

गोपिका संग सहस्र लिये मन भावन पावन रास रचैया
ग्वाल सखा सँग धेनु चराते जो नटवर नागर वंशी बजैया
त्राण दिया जन जीवन को भयमुक्त हो कालिय नाग नथैया
कहते उन्हें यदुनन्दन मोहन माधव केशव कृष्ण कन्हैया

हे हंस वाहिनी मधुरभाषिनी क्लेशनिवारिणि नमस्कार
हे वीणावादिनि सरल सुहासिनि भव भय हारिणि नमस्कार
हे ज्ञान प्रकाशिनि तम नाशिनि कवि हृदय विहारिणि नमस्कार
हे ब्रह्मविचारसार विस्तारिणि पुस्तक धारिणि नमस्कार

है राम कृष्ण को नमन मेरा सीता को देवी राधा को
अंजनि सुत रामदूत को भी, जो हर लेते हर बाधा को
ब्रह्मा शिव विष्णु सहित सारे देवों को मेरा नमस्कार
यक्षों गन्धर्वों ऋषि मुनि गण साध्यों सिद्धों को नमस्कार

पीडित शोषित वंचित जन परित्यक्तों को मेरा नमस्कार
परहितकारी उन सभी राष्ट्रभक्तों को मेरा नमस्कार
वाल्मीकि व्यास तुलसी कबीर बंकिम रवीन्द्र कवि दिनकर को
प्रणिपात करूँ मैं वीर विनायक दामोदर सावरकर को
उन रक्तस्नात केसरपुष्पों वाली कश्मीर घाटियों को
है नमन मेरा नर एवं जगद्रोही आतंकवादियों को
उनके प्रति भी कृतज्ञ हूँ मैं जो खून बहाने वाले हैं
वे सारे मारे जायेंगे केशव फिर आने वाले वाले हैं
प्रणिधायकाय है नमस्कार मेरा शिव विष्णु विधाता को
तन मन धन अर्पित करके नमन करूँ मैं भारतमाता को  ॥

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GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्री गीता जी की आरती

GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्री गीता जी की आरती

गीते ! भगवन की वाणी, सब जीवों की कल्याणी, दुःखों से तू ही उबारती ।
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

तुझको पाकर मन का सारा अंधकार मिट जाये
तेरी कृपा दृष्टि पा करके ज्ञान चक्षु खुल जाये
माता विद्या बढाने वाली, मोक्ष दिलाने वाली, नैया तू पार उतारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

तू है सब जीवों की माता तू ही सबकी धाता
तेरा ही आश्रय लेकरके रचता जगत विधाता
माता तू ही है भवभयनाशिनि तू ही है ज्ञानप्रकाशिनि, भक्तों को अपने दुलारती
माता हम सब उतारें तेरी आरती ॥

काम क्रोध मद लोभ छोडकर जो तेरे ढिंग आये
सुख सुख में समान हो करके परमधाम पा जाये
माता तू है सावित्री सीता, तू ही है पावन गंगा, पापी के पाप निवारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

धर्म कर्म का पथ दिखलाकर सबको निर्भय करती
शरणागत के पापों को तू मन में कभी न धरती
माता, केशव का चक्र चलाके, शंकर का शूल उठाके, दुष्टों को तू ही संहारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥

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भजन

मेरे आँगन में गोविन्द आया करो ||


पहले तुम असुरन को मारो पाछे वंशी बजाया करो     ||
आतंकी विषधर नागों को नाथ के मोहन नचाया करो  ||
व्याकुल गाय गोपिका गोपी गिरि गोवर्धन उठाया करो ||
भ्रष्टाचार और शोषण के शिशुपालों को नसाया करो      ||
निश्छल भक्ति हमें दे करके माया तिमिर हटाया करो   ||
काम क्रोध मद लोभ मोह से हमको हमेशा बचाया करो ||
लाज द्रोपदी की ज्यों राखी सबकी लाज बचाया करो     ||
सभी दुष्ट हो जायें "घायल" ऐसा चक्र चलाया करो  ॥     ||


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भजन
तनी मोहन मुरलिया बजउत्या ना


जौन रूप अर्जुन काँ देखाया, हमहूँ काँ उहै देखउत्या ना                  ||


गली गली द्रौपदी पुकारै, हमरौ लजिया बचउत्या ना                      ||


गणिका गीध अजामिल काँ तारया, हमरौ पार लगौत्या ना            ||


वृन्दावन की कुन्ज गलिन मां, फिर से रास रचउत्या ना                ||


माया कै जंजाल न छूटै, गीता कै ज्ञान करउत्या ना                       ||


तब तौ कह्या हम हर जुग मां अउबै, का होइगै तुँहका बतउत्या ना  ||


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ऊँ श्री परमात्मने नमः
श्री गीतामृतम
अथ करन्यासः
ऊँ अस्य श्री गीतामृतम माला मन्त्रस्य स्वामी दिनेशानन्द ऋषिः मुक्त छ्न्दः श्रीकृष्ण परमात्मा देवता, ’सारे वर्णों में मैं ही हूँ ऊँकार रूप, मैं महाकाल हूँ सब कालों का ज्ञाता हूँ’ इति बीजम ॥ ’मैं सर्वमुखी हूँ महाविराट रूप वाला, मैं हूँ समास में द्वन्द्व सभी का धाता हूँ’ इति शक्तिः ॥ ’ कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति कीलकम ॥ ’तू मेरी कृपा दृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इत्यंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ’सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति तर्जनीभ्यां नमः ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुखभवसागर तर जायेगा’ इति मध्यमाभ्यां नमः ॥ मेरे शरीर में सचराचर स्थित समग्र संसार देख’ इति अनामिकाभ्यां नमः ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुसार जो चाहे वह साकार देख’ इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ’मैं देख रहा हूँ देव तुम्हारी काया में देवों ऋषियों को योगारूष उपायों को’ इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ इति करन्यासः ॥

अथ हृदयादि न्यासः
’कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति हृदयाय नमः ॥ ’तू मेरी कृपादृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इति शिरसे स्वाहा ॥ ’ सब धर्मों को तजकर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति शिखायै वषट ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा’ इति कवचाय हुम ॥ ;मेरे शरीर में सचारर स्थित समग्र संसार देख’ इति नेत्र त्रयाय वौषट ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुरूप जो चाहे वह साकार देख’ इति अस्त्राय फट ॥ ऊँ श्री कृष्ण प्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ॥

अथ ध्यानम
गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता, मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता ।
इसे भवघ्नी चिदानन्द अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें, परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थ ज्ञान मंजरी कहें ।
इन नामों का जप स्थिरमन से जो नर कर लेता है, शीघ्र प्राप्त कर ज्ञान सिद्धि फिर परमधाम पा लेता है ।

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम, देवकी परमानन्दम कृष्णम वन्दे जगद गुरुम ।
लाँघे पर्वत पंगु तब मूक होत वाचाल । तब करते हैं कृपा प्रभु यदुनन्दन गोपाल ॥
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गीतामृतम से कुछ सम्पुट


सुरक्षा हेतु
इसका छेदन शस्त्रास्त्र नहीं कर सकते ...........( अध्याय २/२३)
मोक्ष प्राप्ति हेतु
ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक..........(अध्याय ४/९)
पाप मुक्ति हेतु
इस जग में जितने भी हैं पापकर्म वाले..........(अध्याय ४/३६)
सुख शान्ति हेतु
जो कर्मों के फल का परित्यागी होता है.........(अध्याय ५/१२)
कल्याण हेतु
जो सतत अनन्य भावना से मेरी उपासना....(अध्याय ९/२२)
विद्या ज्ञान प्राप्ति हेतु
उन भक्तों पर अनुकम्पा करने......................(अध्याय १०/११)
धन धान्य प्राप्ति हेतु
एकादश रुद्रों में शंकर यक्षों में ........................(अध्याय १०/२३)
कामना प्राप्ति हेतु
शस्त्रास्त्रों में मैं वज्र रूप गौओं में कामधेनु.........(अध्याय १०/२८)
विजय हेतु
मैं ही कहलाता हूँ जयिष्णु की नीति परम...........(अध्याय १०/३८)
तू मार प्रतीक रूप में ........................................(अध्याय ११/३४)
भूत प्रेत बाधा निवारण हेतु
यह सभी आपकी कीर्ति नाम गुण का प्रभाव.......(अध्याय ११/३६)
पाप क्षमा हेतु
शय्या आसन भोजन.........................................(अध्याय ११/४२)
क्षमा दूसरों को इस जग में.................................(अध्याय ११/४४)
आरोग्य हेतु
हो परम सूक्ष्म..................................................(अध्याय १५/१३)
संकट निवारण हेतु
कट जायेंगे सारे संकट.....................................(अध्याय १८/५८)
सर्वतोन्मुखी उन्नति हेतु
हैं जहाँ विराजित योगेश्वर...................................(अध्याय १८/७८)
                                 
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GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य

GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य

धरा ने पूछा


प्रभु हमें ज्ञान दो कैसे मानव प्रारब्धों का भोग करे
सँग में प्रभु पद में निश्छल भक्ति भाव का भी संयोग करे

श्री विष्णु ने कहा

जो प्रारब्धों का भोग और सँग सँग गीता अभ्यास करे
है जग में सुखी मुक्त वह नर भवबन्धन का उपहास करे


चाहे जैसा हो महापाप मानव गीता का करे ध्यान
संस्पर्श नहीं करते किंचित उसको नलिनी जल के समान


पावन गीता का ग्रन्थ जहाँ जिस घर जिस जगह प्रतिष्ठित है
समझो मय तीर्थ प्रयागराज साक्षात विराजित संस्थित है


सारे योगी पन्नग ऋषियों के साथ देवता रहते हैं
है जहाँ विराजमान गीता ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं


गोपाल बाल कान्हा भी हर क्षण वास वहाँ पर करते हैं
नारद ध्रुव आदि पार्षदों के सँग शीघ्र अनुग्रह करते हैं


हे धरा तुझे मैं बतलाऊँ करता हूँ नित मैं वास वहाँ
गीता का पाठन और श्रवण गीता का हो अभ्यास जहाँ


गीताश्रय में है वास मेरा गीता है मेरा सुघर भवन
गीताश्रय से मेरे द्वारा पोषित पालित है सकल भुवन


है ब्रह्मरूपिणी परमश्रेष्ठ विद्या गीता है अतुलनीय
है अर्धमात्राक्षरा और नित्या पदावली अकथनीय


निज मुख से चिदानन्द माधव ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया
तत्वार्थ ज्ञान वेदस्वरूप गीता का अनुसंधान किया


जो अष्टादश अध्यायों का निश्चल मन से व्यवहारी हो
तच्क्षण हो ज्ञान सिद्धि उसको भगवदपद का अधिकारी हो


सम्पूर्ण पाठ दुष्कर हो यदि उसका आधा भी पढ जावे
निश्चय गोदान समान पुण्य का मार्ग नया नित गढ जावे


छः भाग नित्य जो पढता है गंगास्नान फल पाता है
जो तीन भाग नित पढता है वह सोमयाग फल पाता है


जो मात्र एक अध्याय नित्य पढता है भक्ति भाव लेकर
वह दीर्घ काल तक रुद्रलोक में बसता है शिवगण होकर


अध्याय श्लोक या अंश मात्र का जो आचारी होता है
वह हर मन्वन्तर में मानव जीवन अधिकारी होता है


दस सात पाँच दो तीन चार अध्याय अंश जो हो संभव
शत सदियों तक शशिलोक वास, फिर पुरुष योनि होती संभव


अवसान काल पर जो मुख से गीता उच्चारण करता है
फिर पुनर्जन्म पाकर मानव शरीर वह धारण करता है


गीता अभ्यास पुनः करके वह उत्तम गति पा जाता है
’गीता’ का उच्चारण करके नर सद्गति को पा जाता है


जिसके सिर पर हो महपाप गीतार्थ श्रवण अनुरागी हो
वैकुन्ठ प्राप्त होता उसको हरिपदानन्द का भागी हो


मन में गीतार्थ प्रकाशित कर शुभ कर्मों को अपनाता है
वह जीवन्मुक्त कहाता है देहान्त परमपद पाता है


गीता का आश्रय लेकर ही इस जग में होकर पापमुक्त
जनकादि अनेक नृपति सुखकर पा गये परमपद तापमुक्त


गीता माहात्म्य बिना गीता का पाठ अधूरा होता है
ऐसा समझो वह नर अपनी श्रमशक्ति व्यर्थ ही खोता है


गीता माहात्म्य सहित गीता का पाठ सदा जो करता है
उसका दुर्लभ फल पाता है वह नर भवसागर तरता है

सूत ने कहा

माहात्म्य सनातन गीता का मैंने जो कहा अपेक्षित है
गीता के बाद पढा जाये उसका परिणाम सुनिश्चित है   ॥

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GITAMRITAM गीताऽमृतम -
 श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य का अनुसंधान


शौनक बोले


मुनि व्यास सहित श्रुतियों द्वारा जो कहा गया वह बतलाओ
हे सूत ! वुलक्षण गीता का माहात्म्य मुझे भी समझाओ


सूत ने कहा


है परम पुरातन गोपनीय जिसके बारे में प्रश्न किया
गीता माहात्म्य कथन में अब तक कोई नहीं समर्थ हुआ


गीता माहात्म्य बडा दुर्गम कहलाता है
श्रीकृष्ण एक जो भली प्रकार जानते हैं
कुछ कुछ है ज्ञान व्यास शुक याज्ञवल्क्य को भी
अर्जुन विदेह भी थोडा बहुत जानते हैं


कुछ अन्य दूसरे हैं जो इसको सुनकर के
सारे लोकों में इसका कीर्तन करते हैं
हमने भी जो कुछ सुना व्यास जी के मुख से
अब आज आप से उसका वर्णन करते हैं


भगवान विष्णु के मुख सरसिज से जो निःसृत
उसका हृदयंगम कर लेने का आग्रह है
नर का कर्तव्य यही गीता कंठस्थ करे
सब व्यर्थ अनेकानेक शास्त्र का संग्रह है


है सर्वज्ञान प्रेरक गीत सारे धर्मों का है निचोड
सब शास्त्र समाहित हैं इसमें गीता का कोई नहीं जोड


दुस्तर भवसागर को तरने का जो सपना साकार करे
वह गीता महापोत चढकर सुख से भवसागर पार करे


जो पुरुष सचेष्ट पुण्य गीता का नित्य पाठ कर लेता है
भय शोक आदि से मुक्त हुआ वह विष्णु धाम पा लेता है


जो गीता का अभ्यासपूर्वक श्रवण नहीं कर पाता है
वह मूढ मोक्षकामी बालक सम अपनी हँसी उडाता है


जो मानव पावन गीता को निशिदिन सुनते या पढ जाते
संदेह नहीं उनसे मानव क्या सुर भी पार नहीं पाते


नर काया मैल सर्वदा जल या गंगाजल से धुलता है
संसार रूप का मैल सदा ही गीता जल से धुलता है


गीता का पाठन पठन नहीं गीता का जिसको ज्ञान नहीं
हो अरुचि श्रवण में, श्रद्धा और भावना से सम्मान नहीं


संसार बीच ऐसा मनुष्य शूकर समान विचरण करता
वह सबसे बडा नीच जो गीता ज्ञान नहीं धारण करता


व्रत चेष्टा तप यश ज्ञान तथा हैं अर्थहीन आचार सभी
गीतार्थ पठन से रहित नराधम को करते धिक्कार सभी


निष्फल वह ज्ञान धर्मरोधी आसुरी कहाया जाता है
वेदान्त वेद निन्दित गीता में कभी न गाया जाता है


जो सोते चलते खडे बोलते निशि दिन गीता गाता है
वह सतत यथार्थ ज्ञानरत शाश्वत मोक्षधाम पा जाता है


जो श्रेष्ठ पुरुष योगी सिद्धों संतों में गीता पाठ करे
यज्ञों भक्तों के बीच सुनाकर परमधाम को प्राप्त करे


गीता का नित्य पठन पाठन या श्रवण नित्य जो करता है
दक्षिणा दान संग अश्वमेध के तुल्य यज्ञ वह करता है


जिसने अविचल मन भक्तिभाव से गीता का अभ्यास किया
उसने उन वेद पुराण शास्त्र समझो सबका अभ्यास किया


गीता के अर्थों को जो सुनता गाता और सुनाता है
वह परहितकारी मानव प्रभु का परमधाम पा जाता है


जो नर घर में गीता का पूजन आयोजन करवाता है
फिर त्रिविध ताप उत्पन्न व्याधि दुख का भय नहीं सताता है


उस पर दुर्गति या पाप शाप होते हैं अप्रभावकारी
मानव शरीर के छहों शत्रु होते हैं नहीं अहितकारी


गीता का अभिनन्दन वन्दन सम्पन्न जहाँ पर होता है
ईश्वर का निश्चल भक्तिभाव उत्पन्न वहाँ पर होता है


स्नापित अथवा अस्नापित हो पावन या कोई अपावन हो
उस विश्वरूप का ध्यान करे तो पुरुष सर्वदा पावन हो


भोजन सर्वत्र ग्रहण करता हर तरह दान लेने वाला
बन्धन से बँधता कभी नहीं गीता वाचन करने वाला


निज अन्तःकरण सहित जो नित गीता में ध्यान लगाता है
सर्वाग्निक क्रियावान पण्डित वह नितजापी कहलाता है


वह दर्शनीय योगी ज्ञानी याज्ञिक धनवान कहाता है
वह सब वेदों का ज्ञाता है एवं ध्यानी कहलाता है


गीता होती है जहाँ उपस्थित जहाँ पाठ नित होता है
सब तीर्थों सहित प्रयागराज का वास वहाँ पर होता है


सर्प देवता योगी ऋषि उस देह देश में करते वास
गीता स्थित है जिस घर में वह होता इनका आवास


गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता
मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता


इसे भवघ्नी चिदानंद अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें
परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थज्ञान मंजरी कहें


इन नामों का जप स्थिर मन से जो नर कर लेता है
शीघ्र प्राप्त कर ज्ञानसिद्धि फिर परमधाम पा लेता है


कर्मों को करने के संग जो नर गीता का पाठ करे
सभी कर्म निर्दोष सिद्ध हों सुन्दर फल को प्राप्त करे


पितरों के प्रति श्राद्ध कर्म में जो गीता अपनाते हैं
हो जाते संतुष्ट पितरगण सद्गति को पा जाते हैं


गीता से संतुष्ट श्राद्ध से तृप्त पितर जब होते हैं
पितृलोक में जाकर के आशीष पुत्र को देते हैं


जो गीता लिख गले हाथ मस्तक पर धारण करता है
दारुण विघ्न उपद्रव बाधा का निस्तारण करता है


भारत में चारों वर्णों में जो भी हैं मनुजदेहधारी
जो नहीं हुए गीतामृत के पढने सुनने के व्यवहारी


वे समझो अमृत छोड मात्र विष का ही पान किया करते
सुख मोक्ष उन्हें मिलता है जो गीतामृत पान किया करते


दुख से पीडित संसारी जो भगवद्गीता का श्रवण करे
अमृत की प्राप्ति उसे होती श्रीहरि के पद में श्रयण करे


पा गए परमपद जनक आदि नृप गीता ज्ञान निरत होकर
गीता का आश्रय ले करके इस जग में पाप विरत होकर


है ऊँच नीच का भेद नहीं जग के सारे मानव समान
यह ब्रह्मरूपिणी गीता दे सबको हितकारी परमज्ञान


सादर गीतार्थ श्रवण करके जिसमें प्रसन्नता व्याप्त नहीं
उसको प्रमादवश जग में श्रम का प्रतिफल होता प्राप्त नहीं


गीता माहात्म्य बिना गीता का पठन पुरुष जो करता है
होता है वृथा पाठफल वह अपना श्रम निष्फल करता है


माहात्म्य सहित जो सुने और श्रद्धा से गीता पाठ करे
दुर्लभ गति उसे प्राप्त होती वह भवसागर को पार करे


गीता का जो माहात्म्य सनातन यह मैंने बतलाया है
गीता के बाद पढा जिसने उसने यथोक्त फल पाया है   ॥


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