GITAMRITAM गीताऽमृतम-श्री मदभगवद गीता के ७०० श्लोकों का हिन्दी पद्यांतरण
नम्र निवेदन
मुनिश्रेष्ठ श्री वेदव्यास द्वारा रचित भगवान श्री विष्णु के मुख सरसिज से उद्भूत वाणी ’श्री मदभगवद गीता’ का हिंदी पद्य रूपान्तरण स्वरूप ’गीतामृतम’ सम्पूर्ण होकर जन गण मन को समर्पित है ।
सर्व प्रथम मैं अपने साहित्यिक गुरु पूज्यपाद श्री विजय शंकर शुक्ल जी के चरणकमलों में अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ जिनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से मुझे सर्वदा आत्मबल मिला ।
उन कवियों/ साहित्यकारों, जिन्होंने राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट एवं प्रसारित करने के निमित्त ”राष्ट्रीय साहित्य सेवा संस्थान’ परिवर्तित नाम ’राष्ट्रीय समग्र सेवा संस्थान’ की स्थापना से लेकर संचालन तक में अपना अमूल्य योगदान दिया, जिनमें डा. सुग्रीव सिंह ’विमल’, डा. किशोरी शरण शर्मा, आर्य भूषण गर्ग, श्याम नारायण पाण्डेय, स्व. विश्व नाथ सिंह ’विकल गोण्डवी’, विश्वम्भर नाथ पाण्डेय, देवकी नन्दन ’शान्त’, विजय त्रिपाठी प्रभृति अनेक अक्षरब्रह्म साधकों का नाम उल्लेखनीय है, को भी उनके उस योगदान के लिए सदैव स्मरण रखूँगा ।
गीता के विषय में मैं यह कहना चाहूँगा कि गीता मानव को उत्तम जीवन जीने का कौशल सिखाती है ।
गीता किसी व्यक्ति, समूह, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग विशेष नहीं अपितु सम्पूर्ण चराचर जगत के कल्याण मार्ग का साधन है ।
गीता ज्ञान धारण करके मनुष्य हिंसा, भय, दुख, पश्चात्ताप, निराशा, आलस्य, अकर्मण्यता, लोलुपकामना, पाप आदि कुविचारों से मुक्त हो जाता है ।
गीता भुक्ति से विरत कर, युक्ति एवं मुक्ति पथ पर ले जाती है ।
इस कृति में प्रायः मुक्तक विधा का प्रयोग किया गया है । काव्य की प्रभावोत्पादकता बनी रहे इसका ध्यान रखने का प्रयास किया गया है ।
मेरा प्रयास रहा है कि गीता के मूल संस्कृत श्लोकों में प्रयुक्त शब्दों एवं भावार्थों का अधिकाधिक समावेश हो, एवं मुख्य धारा से विचलन न हो ।
आशा है कि इसे पढ कर लोक मानस में राष्ट्र प्रेम के साथ "सर्वे भवन्तु सुखिन” की भावना पुष्ट होगी ।
सर्वभूतहितेरत-
स्वामी दिनेशानन्द
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गुरुदेवादि वंदना
सद्गुरु के श्री चरणों में पूर्ण समर्पित मन धन गात करूँ
उनके आदर्शों आचरणों के प्रति सश्रद्ध प्रणिपात करूँ
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेश रूप गुरु अमल विमल मति देता है
वह कल्पवृक्ष सर्वदा अयाचित नर को शुभ गति देता है
गुरु परमब्रह्म परमाश्रय है उससे चलता जग सारा है
गुरु ज्ञान सर्वाहितकारी है पावन गंगा की धारा है
गणपति सुखदायक वीर विनायक वक्रतुण्ड का अभिनन्दन
दारुण दुख बाधा क्लेश कष्टहारी को कोटि कोटि वन्दन
जिनकी हो जाये कृपा दृष्टि मिट जायें सब करुणा क्रन्दन
सब पर हो कृपावृष्टि हे लम्बोदर गौरी शंकर नन्दन
द्रुतलेखी ज्ञान निधान महा पितु मातु भक्त दुखहारी हो
हे महाकाय रवि कोटि प्रभायुत गजमुख सब सुखकारी हो
हे संकट मोचन सुवन त्रिलोचन बहुविधि भव भय हारी हो
मंगलकारी सर्वदा सर्वजनहितकारी अविकारी हो
गोपिका संग सहस्र लिये मन भावन पावन रास रचैया
ग्वाल सखा सँग धेनु चराते जो नटवर नागर वंशी बजैया
त्राण दिया जन जीवन को भयमुक्त हो कालिय नाग नथैया
कहते उन्हें यदुनन्दन मोहन माधव केशव कृष्ण कन्हैया
हे हंस वाहिनी मधुरभाषिनी क्लेशनिवारिणि नमस्कार
हे वीणावादिनि सरल सुहासिनि भव भय हारिणि नमस्कार
हे ज्ञान प्रकाशिनि तम नाशिनि कवि हृदय विहारिणि नमस्कार
हे ब्रह्मविचारसार विस्तारिणि पुस्तक धारिणि नमस्कार
है राम कृष्ण को नमन मेरा सीता को देवी राधा को
अंजनि सुत रामदूत को भी, जो हर लेते हर बाधा को
ब्रह्मा शिव विष्णु सहित सारे देवों को मेरा नमस्कार
यक्षों गन्धर्वों ऋषि मुनि गण साध्यों सिद्धों को नमस्कार
पीडित शोषित वंचित जन परित्यक्तों को मेरा नमस्कार
परहितकारी उन सभी राष्ट्रभक्तों को मेरा नमस्कार
वाल्मीकि व्यास तुलसी कबीर बंकिम रवीन्द्र कवि दिनकर को
प्रणिपात करूँ मैं वीर विनायक दामोदर सावरकर को
उन रक्तस्नात केसरपुष्पों वाली कश्मीर घाटियों को
है नमन मेरा नर एवं जगद्रोही आतंकवादियों को
उनके प्रति भी कृतज्ञ हूँ मैं जो खून बहाने वाले हैं
वे सारे मारे जायेंगे केशव फिर आने वाले वाले हैं
प्रणिधायकाय है नमस्कार मेरा शिव विष्णु विधाता को
तन मन धन अर्पित करके नमन करूँ मैं भारतमाता को ॥
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नम्र निवेदन
मुनिश्रेष्ठ श्री वेदव्यास द्वारा रचित भगवान श्री विष्णु के मुख सरसिज से उद्भूत वाणी ’श्री मदभगवद गीता’ का हिंदी पद्य रूपान्तरण स्वरूप ’गीतामृतम’ सम्पूर्ण होकर जन गण मन को समर्पित है ।
सर्व प्रथम मैं अपने साहित्यिक गुरु पूज्यपाद श्री विजय शंकर शुक्ल जी के चरणकमलों में अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ जिनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से मुझे सर्वदा आत्मबल मिला ।
उन कवियों/ साहित्यकारों, जिन्होंने राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट एवं प्रसारित करने के निमित्त ”राष्ट्रीय साहित्य सेवा संस्थान’ परिवर्तित नाम ’राष्ट्रीय समग्र सेवा संस्थान’ की स्थापना से लेकर संचालन तक में अपना अमूल्य योगदान दिया, जिनमें डा. सुग्रीव सिंह ’विमल’, डा. किशोरी शरण शर्मा, आर्य भूषण गर्ग, श्याम नारायण पाण्डेय, स्व. विश्व नाथ सिंह ’विकल गोण्डवी’, विश्वम्भर नाथ पाण्डेय, देवकी नन्दन ’शान्त’, विजय त्रिपाठी प्रभृति अनेक अक्षरब्रह्म साधकों का नाम उल्लेखनीय है, को भी उनके उस योगदान के लिए सदैव स्मरण रखूँगा ।
गीता के विषय में मैं यह कहना चाहूँगा कि गीता मानव को उत्तम जीवन जीने का कौशल सिखाती है ।
गीता किसी व्यक्ति, समूह, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग विशेष नहीं अपितु सम्पूर्ण चराचर जगत के कल्याण मार्ग का साधन है ।
गीता ज्ञान धारण करके मनुष्य हिंसा, भय, दुख, पश्चात्ताप, निराशा, आलस्य, अकर्मण्यता, लोलुपकामना, पाप आदि कुविचारों से मुक्त हो जाता है ।
गीता भुक्ति से विरत कर, युक्ति एवं मुक्ति पथ पर ले जाती है ।
इस कृति में प्रायः मुक्तक विधा का प्रयोग किया गया है । काव्य की प्रभावोत्पादकता बनी रहे इसका ध्यान रखने का प्रयास किया गया है ।
मेरा प्रयास रहा है कि गीता के मूल संस्कृत श्लोकों में प्रयुक्त शब्दों एवं भावार्थों का अधिकाधिक समावेश हो, एवं मुख्य धारा से विचलन न हो ।
आशा है कि इसे पढ कर लोक मानस में राष्ट्र प्रेम के साथ "सर्वे भवन्तु सुखिन” की भावना पुष्ट होगी ।
सर्वभूतहितेरत-
स्वामी दिनेशानन्द
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गुरुदेवादि वंदना
सद्गुरु के श्री चरणों में पूर्ण समर्पित मन धन गात करूँ
उनके आदर्शों आचरणों के प्रति सश्रद्ध प्रणिपात करूँ
गुरु ब्रह्मा विष्णु महेश रूप गुरु अमल विमल मति देता है
वह कल्पवृक्ष सर्वदा अयाचित नर को शुभ गति देता है
गुरु परमब्रह्म परमाश्रय है उससे चलता जग सारा है
गुरु ज्ञान सर्वाहितकारी है पावन गंगा की धारा है
गणपति सुखदायक वीर विनायक वक्रतुण्ड का अभिनन्दन
दारुण दुख बाधा क्लेश कष्टहारी को कोटि कोटि वन्दन
जिनकी हो जाये कृपा दृष्टि मिट जायें सब करुणा क्रन्दन
सब पर हो कृपावृष्टि हे लम्बोदर गौरी शंकर नन्दन
द्रुतलेखी ज्ञान निधान महा पितु मातु भक्त दुखहारी हो
हे महाकाय रवि कोटि प्रभायुत गजमुख सब सुखकारी हो
हे संकट मोचन सुवन त्रिलोचन बहुविधि भव भय हारी हो
मंगलकारी सर्वदा सर्वजनहितकारी अविकारी हो
गोपिका संग सहस्र लिये मन भावन पावन रास रचैया
ग्वाल सखा सँग धेनु चराते जो नटवर नागर वंशी बजैया
त्राण दिया जन जीवन को भयमुक्त हो कालिय नाग नथैया
कहते उन्हें यदुनन्दन मोहन माधव केशव कृष्ण कन्हैया
हे हंस वाहिनी मधुरभाषिनी क्लेशनिवारिणि नमस्कार
हे वीणावादिनि सरल सुहासिनि भव भय हारिणि नमस्कार
हे ज्ञान प्रकाशिनि तम नाशिनि कवि हृदय विहारिणि नमस्कार
हे ब्रह्मविचारसार विस्तारिणि पुस्तक धारिणि नमस्कार
है राम कृष्ण को नमन मेरा सीता को देवी राधा को
अंजनि सुत रामदूत को भी, जो हर लेते हर बाधा को
ब्रह्मा शिव विष्णु सहित सारे देवों को मेरा नमस्कार
यक्षों गन्धर्वों ऋषि मुनि गण साध्यों सिद्धों को नमस्कार
पीडित शोषित वंचित जन परित्यक्तों को मेरा नमस्कार
परहितकारी उन सभी राष्ट्रभक्तों को मेरा नमस्कार
वाल्मीकि व्यास तुलसी कबीर बंकिम रवीन्द्र कवि दिनकर को
प्रणिपात करूँ मैं वीर विनायक दामोदर सावरकर को
उन रक्तस्नात केसरपुष्पों वाली कश्मीर घाटियों को
है नमन मेरा नर एवं जगद्रोही आतंकवादियों को
उनके प्रति भी कृतज्ञ हूँ मैं जो खून बहाने वाले हैं
वे सारे मारे जायेंगे केशव फिर आने वाले वाले हैं
प्रणिधायकाय है नमस्कार मेरा शिव विष्णु विधाता को
तन मन धन अर्पित करके नमन करूँ मैं भारतमाता को ॥
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