ज्ञान कर्म संन्यास योग
भगवान बोले
सूरज से यह अविनाशी योग कहा मैंने, फिर कहा सूर्य ने निज सुत वैवस्वत मनु से
यह योग इस तरह क्रमशः हस्तांतरित हुआ, इक्ष्वाकु नृपति ने पाया वैवस्वत मनु से
था इसको परम्परा में पाया ऋषियों ने, उनकी संततियों में इसका अवधान हुआ
कालान्तर में यह दीर्घकाल तक लुप्त रहा, इसके प्रसार में बहुत बडा व्यवधान हुआ
है भक्त सखा प्रिय, अतः तुझे बतलाया योग पुरातन है
उत्तम रहस्यमय गोपनीय शाश्वत है और सनातन है
अर्जुन बोले
बीता न अधिक है समय आप को जन्म लिए, पर सूर्य कल्प आरंभ काल में आया था
मैं कैसे समझूँ क्या सच है, कितना सच है, जिसको प्रभु ने यह अव्यय योग बताया था
भगवान बोले
मेरे तेरे अब तक हो चुके अनेक जन्म, हो चुका परन्तु तुझे वह अब तक विस्मृत है
मैं अन्तर्यामी हूँ मैं सब कुछ देख रहा, मुझको जन्मों का हाल पूर्णतः स्मृत है
मैं अज अविनाशी प्राणीश्वर होकरके भी, अपनी निसर्ग को निजाधीन कर लेता हूँ
मैं अपनी योगजन्य माया का अश्रय ले, जग में मन चाहा रूप प्रकट कर देता हूँ
जब जब होता है इस धरती पर धर्मपतन, जब जब अधर्म का रूप कुरूप विकट होता
तब मैं अनित्य प्राणी शरीर धारण करता, जग में मेरा साकार स्वरूप प्रकट होता
मैं आता साधु सज्जनों के उद्धार हेतु, जग के सारे पापीगण के संहार हेतु
हर युग में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ, उस शाश्वत और सनातन धर्म सुधार हेतु
ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक हैं, जिस मानव को हो जाता है यह ज्ञान प्राप्त
उसको जन्मों के बंधन बाँध न पाते हैं, वह अन्तकाल में निश्चित होता मुझे प्राप्त
जिनका था पूर्ण नियंत्रण क्रोध राग भय पर, जो एकनिष्ठ हो मुझ पर केवल थे आश्रित
इस ज्ञानरूप तप से वे परम पवित्र हुए, निर्बंध हुए मेरे स्वरूप में हैं स्थित
मैं भी उन भक्तों को वैसा ही भजता हूँ, मेरे आराधक जैसा मुझको भजते हैं
मैं उन्हें मुक्ति का साधन मार्ग दिखाता हूँ, सारे मानवगण मेरा अनुसरण करते हैं
वह पुरुष देवताओं का पूजन करता है, जो भी निज कर्मों के फल का अनुरागी है
होते हैं शीघ्र प्रसन्न देवता पूजा से, वह अभिलाषी नर सकल सिद्धि का भागी है
ब्राह्मण क्षत्रिय औ’ वैश्य शूद्र इन वर्णों के, गुण कर्मों के संकुल का मैं ही कर्ता हूँ
इस सकल सृष्टि का उद्भव है मेरे द्वारा, मुझ अविनाशी को तो भी समझ अकर्ता हूँ
कर्मों के बंधन मुझको बाँध नहीं सकते, उनके फल में मेरी कोई स्पृहा नहीं
इस तरह तत्व से जिसने मुझको जान लिया, वह समझो कर्मों के बंधन से बँधा नहीं
इस तत्वज्ञान अनुरूप हुए हैं कर्म सभी, इसके पहले कतिपय मुमुक्ष पुरुषों द्वारा
ऐसा तेरा कर्मों के प्रति आचरण रहे, जो कर्म सदा सम्पन्न हुए पुरुखों द्वारा
कहते हैं कर्म किसे अथवा अकर्म क्या है, कुछ बुद्धिमान मोहित हो जाते कभी कभी
मैं भलीभाँति वह कर्मतत्व बतलाऊँगा, जिससे तू होगा मुक्त अहित होंगे न कभी
चाहिए जानना कर्मों के स्वरूप को भी, जानना चाहिए सँग ही सँग अकर्म क्या है
इस जीवन में कर्मों की गति है बडी गहन, अनिवार्य जानना यह भी है विकर्म क्या है
जो नर कर्मों में भी अकर्म का द्रष्टा है, जिसको अकर्म में कर्म दिखाई देता है
है वही क्षिप्रचेता समस्त विद्वानों मे, योगी, सारे कर्मों का वही प्रणेता है
कामना और संकल्प विवर्जित होकरके, शास्त्रोक्त कर्म का जो निष्पादन करते हैं
होते हैं भस्म कर्म उसके ज्ञानानल में, वे पण्डित हैं ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं
जिसकी कर्मों, परिणामों में आसक्ति नहीं, परमात्मा में वह नित्य तृप्त हो जाता है
संसाराश्रय से रहित कर्म को करके भी, वह नर कर्मों का कर्ता नहीं कहाता है
जो इन्द्रियजित निज अन्तःकरण नियंत्रक हो, जिसका मन भोग विषय में व्याप्त नहीं होता
होकर गताश भौतिक कर्मों को करके भी, ऐसा मानव पापों को प्राप्त नहीं होता
इच्छा के बिना प्राप्तियों से जो तुष्ट रहे, जो ईर्ष्या हर्ष शोक से कभी न मोहित हो
कर्मों के पाश न उस योगी को बाँध सकें,जो सिद्धि असिद्धि दशा में कभी न विचलित हो
आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है जिसकी, जिसका मन परमात्मा में लय हो जाता है
जो मात्र यज्ञ कर्मों का सम्पादन करता, उसके कर्मों का पूर्ण विलय हो जाता है
जिन यज्ञों में आहुति अर्पण हव्य ब्रह्म है, ब्रह्मरूप कर्ता ब्रह्मानल द्रव्य ब्रह्म है
ब्रह्मकर्म स्थित ऐसे योगी के द्वारा, प्राप्त किया जाने वाला फल भव्य ब्रह्म है
यज्ञों का करके विधि विधान से अनुष्ठान, कुछ योगीजन करते हैं पूजन देवयजन
कुछ योगवान परमात्मारूप अनल में ही, आत्मा का ही करते यियक्षुतापूर्ण हवन
कुछ योगीजन जिह्वा कर्णादि इन्द्रियों का, संयम रूपी पावक में दहन किया करते
कुछ अन्य योग से युक्त पुरुष शब्दादि विषय, इन्द्रियरूपी दाहक में हवन किया करते
इन्द्रिय एवं प्राणों की सभी क्रियाओं को, करके निवेश कुछ योगी ज्ञान प्रकाशन में
इस तरह अलौकिक हवन किया करते हैं वे, कर अपने मन पर संयम योग हुताशन में
कुछ मानव द्रव्ययोग का अश्रय लेते हैं, कुछ योगयज्ञ, कुछ तपोयज्ञ के अनुगामी
कुछ यति संशितव्रतधारी करते ज्ञानयज्ञ, स्वाध्यायरूप, ज्ञानस्वरूप पथ के गामी
कुछ देते प्राणों की आहुति अपान में हैं, कुछ प्राणों में अपान की आहुति दे करके
कुछ योगी हैं जो प्राणायाम परायण हैं, आहुतियाँ देते प्राणापान रोक करके
कुछ नियताहारी योगीजन ऐसे भी हैं, प्राणों में ही प्राणों के हव्य प्रदाता हैं
यज्ञों से सारे पाप भस्म कर देते हैं, ये साधक यज्ञों के स्वरूप के ज्ञाता हैं
हे अर्जुन यज्ञशिष्ट अन्नों के सेवन से, मानव ईश्वर का परमधाम पा जाता है
जो यज्ञविहीन पुरुष है किसी लोक में भी, वह कभी नहीं सुख का अनुभव कर पाता है
एवंविध वितत अनेक कोटि की यज्ञ विधा, वेदों की वाणी में व्याख्यायित युक्तियुक्त
ऐसे कर्मज यज्ञों के तत्व निरूपण से, कर्मों के बंधन से तू होगा पूर्णमुक्त
हे पार्थ परंतप ! द्रव्ययज्ञ की तुलना में, स्वाध्याय ज्ञानयज्ञों की अधिक महत्ता है
जब मानव का शुभ ज्ञान चक्षु खुल जाता है, सब कर्मों की विलीन हो जाती सत्ता है
तुम तत्वज्ञानियों के ढिंग जाकर उनसे जयश्रीराम करो
उनकी सेवा निष्कपट करो उनको दण्डवत प्रणाम करो
परमात्मज्ञान के ज्ञाता तुझको तत्वज्ञान करायेंगे
उनसे शुचितापूर्वक निश्छल कैसे भी प्रश्न ललाम करो
जिसका अनुशीलन कर लेने पर हे अर्जुन, सब प्राणिमात्र को आत्मभाव में देखेगा
निःशेषभाव में स्थित होकर मोहमुक्त, सब जीवों को परमात्मभाव में देखेगा
इस जग में जितने भी हैं पाप कर्म वाले, उनसे भी यदि अत्यधिक पाप कर जायेगा
तो भी इस ज्ञानरूप नौका पर चढ करके, तू महापाप का महाजलधि तर जायेगा
जैसे प्रज्वलित हुताशन सब समिधाओं को, केवल क्षणभर में भस्मसात कर देता है
वैसे ही ज्ञानरूप पावक सब कर्मों को, बस एक निमिष में आत्मसात कर लेता है
परमात्मज्ञान सम पावन करने की क्षमता, होती है जग में नहीं किसी भी साधन में
वह नर जिसको भी हो जाती है योगसिद्धि, पाता है ज्ञान आत्मा के अनुशासन में
श्रद्धा से युक्त, कर्म तत्पर हो इन्द्रियजित, पाता है वह नर ज्ञान परम कल्याणयुक्त
तदनन्तर ज्ञानयुक्त होने की स्थिति में, अति शीघ्र प्राप्त होती सुशान्ति आनन्दयुक्त
श्रद्धाविहीन अविवेकी संशय वालों की, जीवन यात्रा की गति हो जाती छिन्न भिन्न
समझो परलोक लोक सब उसका व्यर्थ हुआ, सुख शान्ति नहीं मिलती, मन रहता सदा खिन्न
हे अर्जुन, कर्मयोग का जो आश्रय लेकर, कर देता कर्मों को परमात्मा में अर्पण
उस आत्मवंत संशयविहीन नर को जग में, बाँधते नहीं कर्मों के बंधन आकर्षण
अपने विवेक ज्ञानस्वरूप शस्त्रों द्वारा, मूलोच्छेदन कर संशय का अज्ञान जनित
हे भारत ! तू निष्काम कर्मयोगी होकर, कर अभी खडा हो, महा धर्म संग्राम त्वरित
**************
भगवान बोले
सूरज से यह अविनाशी योग कहा मैंने, फिर कहा सूर्य ने निज सुत वैवस्वत मनु से
यह योग इस तरह क्रमशः हस्तांतरित हुआ, इक्ष्वाकु नृपति ने पाया वैवस्वत मनु से
था इसको परम्परा में पाया ऋषियों ने, उनकी संततियों में इसका अवधान हुआ
कालान्तर में यह दीर्घकाल तक लुप्त रहा, इसके प्रसार में बहुत बडा व्यवधान हुआ
है भक्त सखा प्रिय, अतः तुझे बतलाया योग पुरातन है
उत्तम रहस्यमय गोपनीय शाश्वत है और सनातन है
अर्जुन बोले
बीता न अधिक है समय आप को जन्म लिए, पर सूर्य कल्प आरंभ काल में आया था
मैं कैसे समझूँ क्या सच है, कितना सच है, जिसको प्रभु ने यह अव्यय योग बताया था
भगवान बोले
मेरे तेरे अब तक हो चुके अनेक जन्म, हो चुका परन्तु तुझे वह अब तक विस्मृत है
मैं अन्तर्यामी हूँ मैं सब कुछ देख रहा, मुझको जन्मों का हाल पूर्णतः स्मृत है
मैं अज अविनाशी प्राणीश्वर होकरके भी, अपनी निसर्ग को निजाधीन कर लेता हूँ
मैं अपनी योगजन्य माया का अश्रय ले, जग में मन चाहा रूप प्रकट कर देता हूँ
जब जब होता है इस धरती पर धर्मपतन, जब जब अधर्म का रूप कुरूप विकट होता
तब मैं अनित्य प्राणी शरीर धारण करता, जग में मेरा साकार स्वरूप प्रकट होता
मैं आता साधु सज्जनों के उद्धार हेतु, जग के सारे पापीगण के संहार हेतु
हर युग में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ, उस शाश्वत और सनातन धर्म सुधार हेतु
ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक हैं, जिस मानव को हो जाता है यह ज्ञान प्राप्त
उसको जन्मों के बंधन बाँध न पाते हैं, वह अन्तकाल में निश्चित होता मुझे प्राप्त
जिनका था पूर्ण नियंत्रण क्रोध राग भय पर, जो एकनिष्ठ हो मुझ पर केवल थे आश्रित
इस ज्ञानरूप तप से वे परम पवित्र हुए, निर्बंध हुए मेरे स्वरूप में हैं स्थित
मैं भी उन भक्तों को वैसा ही भजता हूँ, मेरे आराधक जैसा मुझको भजते हैं
मैं उन्हें मुक्ति का साधन मार्ग दिखाता हूँ, सारे मानवगण मेरा अनुसरण करते हैं
वह पुरुष देवताओं का पूजन करता है, जो भी निज कर्मों के फल का अनुरागी है
होते हैं शीघ्र प्रसन्न देवता पूजा से, वह अभिलाषी नर सकल सिद्धि का भागी है
ब्राह्मण क्षत्रिय औ’ वैश्य शूद्र इन वर्णों के, गुण कर्मों के संकुल का मैं ही कर्ता हूँ
इस सकल सृष्टि का उद्भव है मेरे द्वारा, मुझ अविनाशी को तो भी समझ अकर्ता हूँ
कर्मों के बंधन मुझको बाँध नहीं सकते, उनके फल में मेरी कोई स्पृहा नहीं
इस तरह तत्व से जिसने मुझको जान लिया, वह समझो कर्मों के बंधन से बँधा नहीं
इस तत्वज्ञान अनुरूप हुए हैं कर्म सभी, इसके पहले कतिपय मुमुक्ष पुरुषों द्वारा
ऐसा तेरा कर्मों के प्रति आचरण रहे, जो कर्म सदा सम्पन्न हुए पुरुखों द्वारा
कहते हैं कर्म किसे अथवा अकर्म क्या है, कुछ बुद्धिमान मोहित हो जाते कभी कभी
मैं भलीभाँति वह कर्मतत्व बतलाऊँगा, जिससे तू होगा मुक्त अहित होंगे न कभी
चाहिए जानना कर्मों के स्वरूप को भी, जानना चाहिए सँग ही सँग अकर्म क्या है
इस जीवन में कर्मों की गति है बडी गहन, अनिवार्य जानना यह भी है विकर्म क्या है
जो नर कर्मों में भी अकर्म का द्रष्टा है, जिसको अकर्म में कर्म दिखाई देता है
है वही क्षिप्रचेता समस्त विद्वानों मे, योगी, सारे कर्मों का वही प्रणेता है
कामना और संकल्प विवर्जित होकरके, शास्त्रोक्त कर्म का जो निष्पादन करते हैं
होते हैं भस्म कर्म उसके ज्ञानानल में, वे पण्डित हैं ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं
जिसकी कर्मों, परिणामों में आसक्ति नहीं, परमात्मा में वह नित्य तृप्त हो जाता है
संसाराश्रय से रहित कर्म को करके भी, वह नर कर्मों का कर्ता नहीं कहाता है
जो इन्द्रियजित निज अन्तःकरण नियंत्रक हो, जिसका मन भोग विषय में व्याप्त नहीं होता
होकर गताश भौतिक कर्मों को करके भी, ऐसा मानव पापों को प्राप्त नहीं होता
इच्छा के बिना प्राप्तियों से जो तुष्ट रहे, जो ईर्ष्या हर्ष शोक से कभी न मोहित हो
कर्मों के पाश न उस योगी को बाँध सकें,जो सिद्धि असिद्धि दशा में कभी न विचलित हो
आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है जिसकी, जिसका मन परमात्मा में लय हो जाता है
जो मात्र यज्ञ कर्मों का सम्पादन करता, उसके कर्मों का पूर्ण विलय हो जाता है
जिन यज्ञों में आहुति अर्पण हव्य ब्रह्म है, ब्रह्मरूप कर्ता ब्रह्मानल द्रव्य ब्रह्म है
ब्रह्मकर्म स्थित ऐसे योगी के द्वारा, प्राप्त किया जाने वाला फल भव्य ब्रह्म है
यज्ञों का करके विधि विधान से अनुष्ठान, कुछ योगीजन करते हैं पूजन देवयजन
कुछ योगवान परमात्मारूप अनल में ही, आत्मा का ही करते यियक्षुतापूर्ण हवन
कुछ योगीजन जिह्वा कर्णादि इन्द्रियों का, संयम रूपी पावक में दहन किया करते
कुछ अन्य योग से युक्त पुरुष शब्दादि विषय, इन्द्रियरूपी दाहक में हवन किया करते
इन्द्रिय एवं प्राणों की सभी क्रियाओं को, करके निवेश कुछ योगी ज्ञान प्रकाशन में
इस तरह अलौकिक हवन किया करते हैं वे, कर अपने मन पर संयम योग हुताशन में
कुछ मानव द्रव्ययोग का अश्रय लेते हैं, कुछ योगयज्ञ, कुछ तपोयज्ञ के अनुगामी
कुछ यति संशितव्रतधारी करते ज्ञानयज्ञ, स्वाध्यायरूप, ज्ञानस्वरूप पथ के गामी
कुछ देते प्राणों की आहुति अपान में हैं, कुछ प्राणों में अपान की आहुति दे करके
कुछ योगी हैं जो प्राणायाम परायण हैं, आहुतियाँ देते प्राणापान रोक करके
कुछ नियताहारी योगीजन ऐसे भी हैं, प्राणों में ही प्राणों के हव्य प्रदाता हैं
यज्ञों से सारे पाप भस्म कर देते हैं, ये साधक यज्ञों के स्वरूप के ज्ञाता हैं
हे अर्जुन यज्ञशिष्ट अन्नों के सेवन से, मानव ईश्वर का परमधाम पा जाता है
जो यज्ञविहीन पुरुष है किसी लोक में भी, वह कभी नहीं सुख का अनुभव कर पाता है
एवंविध वितत अनेक कोटि की यज्ञ विधा, वेदों की वाणी में व्याख्यायित युक्तियुक्त
ऐसे कर्मज यज्ञों के तत्व निरूपण से, कर्मों के बंधन से तू होगा पूर्णमुक्त
हे पार्थ परंतप ! द्रव्ययज्ञ की तुलना में, स्वाध्याय ज्ञानयज्ञों की अधिक महत्ता है
जब मानव का शुभ ज्ञान चक्षु खुल जाता है, सब कर्मों की विलीन हो जाती सत्ता है
तुम तत्वज्ञानियों के ढिंग जाकर उनसे जयश्रीराम करो
उनकी सेवा निष्कपट करो उनको दण्डवत प्रणाम करो
परमात्मज्ञान के ज्ञाता तुझको तत्वज्ञान करायेंगे
उनसे शुचितापूर्वक निश्छल कैसे भी प्रश्न ललाम करो
जिसका अनुशीलन कर लेने पर हे अर्जुन, सब प्राणिमात्र को आत्मभाव में देखेगा
निःशेषभाव में स्थित होकर मोहमुक्त, सब जीवों को परमात्मभाव में देखेगा
इस जग में जितने भी हैं पाप कर्म वाले, उनसे भी यदि अत्यधिक पाप कर जायेगा
तो भी इस ज्ञानरूप नौका पर चढ करके, तू महापाप का महाजलधि तर जायेगा
जैसे प्रज्वलित हुताशन सब समिधाओं को, केवल क्षणभर में भस्मसात कर देता है
वैसे ही ज्ञानरूप पावक सब कर्मों को, बस एक निमिष में आत्मसात कर लेता है
परमात्मज्ञान सम पावन करने की क्षमता, होती है जग में नहीं किसी भी साधन में
वह नर जिसको भी हो जाती है योगसिद्धि, पाता है ज्ञान आत्मा के अनुशासन में
श्रद्धा से युक्त, कर्म तत्पर हो इन्द्रियजित, पाता है वह नर ज्ञान परम कल्याणयुक्त
तदनन्तर ज्ञानयुक्त होने की स्थिति में, अति शीघ्र प्राप्त होती सुशान्ति आनन्दयुक्त
श्रद्धाविहीन अविवेकी संशय वालों की, जीवन यात्रा की गति हो जाती छिन्न भिन्न
समझो परलोक लोक सब उसका व्यर्थ हुआ, सुख शान्ति नहीं मिलती, मन रहता सदा खिन्न
हे अर्जुन, कर्मयोग का जो आश्रय लेकर, कर देता कर्मों को परमात्मा में अर्पण
उस आत्मवंत संशयविहीन नर को जग में, बाँधते नहीं कर्मों के बंधन आकर्षण
अपने विवेक ज्ञानस्वरूप शस्त्रों द्वारा, मूलोच्छेदन कर संशय का अज्ञान जनित
हे भारत ! तू निष्काम कर्मयोगी होकर, कर अभी खडा हो, महा धर्म संग्राम त्वरित
**************