Sunday, 7 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - ग्यारहवाँ अध्याय -विश्वरूप दर्शन योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - ग्यारहवाँ अध्याय
विश्वरूप दर्शन योग

अर्जुन बोले 


अध्यात्म परक इन बचनों से सब कुछ स्पष्ट हो गया है
इन कृपापूर्ण उपदेशों से मन का भ्रम नष्ट हो गया है


हे कमलनेत्र ! भूतों का प्रभव प्रलय साभार सुना मैंने
प्रभु मुख से प्रभु की अविनाशी महिमा विस्तार सुना मैंने


भगवान ! अब तक जो कुछ मुझको बतलाया है, उसमें अन्यथा नहीं, वह सब कुछ वैसा है
बल, वीर्य, शक्ति, ऐश्वर्य, ज्ञान मय प्रभु स्वरूप, प्रत्यक्ष देखना चाहूँगा वह कैसा है


प्रभु ! मेरे द्वारा देखा जाना यदि संभव हो बतलायें
हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन करवाएँ


भगवान बोले


हे पार्थ देख! सैकडों हज़ारों रूपों को, नाना प्रकार के और विविध वरंओं वाले
नाना प्रकार के देख मेरे आकारों को, हैं परम अलौकिक और दिव्य रूपों वाले


अब तक जो देखे नहीं जा सके कभी किसी के द्वारा भी, 
हे अर्जुन ! देख अदिति के बारह पुत्रों के अवतारों को
आठों वसुओं, ग्यारह रुद्रों से युक्त रूप विस्मयकारी
उनचास मरुद्गण देख और दोनों अश्विनी कुमारों को


मेरे शरीर में सचराचर स्थित समग्र संसार देख
हे अर्जुन तू इच्छानुरूप जो चाहे वह साकार देख


तू देख न पायेगा प्राकृत नेत्रों से है देखना व्यर्थ
देता हूँ दिव्य चक्षु जिससे मेरे दर्शन में हो समर्थ


संजय बोले


हे राजन ! योगेश्वर हरि ने अर्जुन को जब यह बतलाया
तदनन्तर परम विराट रूप ईश्वर का उसको दिखलाया


जिनके अनेक मुख नेत्र विविध रूपों वाले, आश्चर्य चकितकारी अद्भुत दर्शन वाले
हाथों में लिए अनेक दिव्य शस्त्रास्त्रों को, हैं परम विभूषित जो दिव्याभूषण वाले


जो दिव्य वस्त्र एवं माला धारण करते, जिनके शरीर में दिव्य गंध का अनुलेपन
जो विस्मयकारी रूप और आश्चर्यपूर्ण, विश्वतमुख महाविराट स्वरूप परम चेतन


यदि एक साथ नभ में सहस्र आदित्य उगें, संकलित रूप से वह उष्मा एवं प्रकाश
उसकी तुलना उससे शायद ही हो पाये, जो विश्वरूप परमात्मा का होता प्रकाश


वे विविध भाँति के पृथक पृथक सम्पूर्ण जगत, 
उस क्षण सब कुछ थे दिए दिखा अर्जुन को
देवाधिदेव श्रीकृष्ण चन्द्र की काया में 
दिखलाई पडे सभी स्थायी अर्जुन को


आश्चर्यचकित पुलकित शरीर हो, अर्जुन ने मन थाम लिया
फिर शीश झुकाकर विश्वरूप प्रभु को करबद्ध प्रणाम किया


अर्जुन बोले


मैं देख रहा हूँ देव तुम्हारी काया में, देवों, ऋषियों को, योगारूढ उपायों को
कमलासनस्थ ब्रह्मा को, अद्भुत सर्पों को, जग के विभिन्न भूतों के उन समुदायों को


हे सकल विश्व के स्वामी विश्वविराट रूप, हैं आप विभिन्न हाथ, मुख, उदर, नेत्रधारी
प्रभु मुझको आप अनन्त रूप में दिखते हैं, है आदि न मध्य न अन्त सर्वजनहितकारी


सिर पर शोभित है मुकुट हाथ में गदा चक्र, दग्धानल रवि सम दीप्तिपूर्ण द्युति पुंज रूप
है जिसका दर्शन करना होता बडा कथिन, मैं प्रभु का देख रहा हूँ अप्रमेय रूप


हैं वेदितव्य, परमाक्षर, आप सकल जग में, इस जग के परम निधान आप मेरा मत है
अव्यय स्वरूप हैं शाश्वत धर्मगोप्ता हैं, हैं पुरुष सनातन ऐसा मेरा अभिमत है


मध्यान्त आदि से रहित अपरिमित शक्तियुक्त, अनगिनत भुजा, शशि रवि समान नेत्रों वाले
जिसके तापों से तप्त हो रहा सकल जगत, प्रज्ज्वलित अग्निज्वाला समान वक्त्रों वाले


द्यावा पृथ्वी के मध्य शून्यमय अन्तराल, हे प्रभु ये सभी आप ही द्वारा निर्मित हैं
यह उग्र भयंकर अद्भुत रूप देख करके, हैं भयाक्रांत ये तीनों लोक प्रव्यथित हैं


कुछ देवों के संकाय आप में करते दिखते हैं प्रवेश,
कुछ भय से नाम गुणों का उच्चारण कर करते अभिवादन
सिद्धों महर्षियों का समूह उत्तम उत्तम स्तोत्रों से
करते दिखते हैं मुझको प्रभु की स्तुति और स्वस्ति वाचन


आदित्य, रुद्र, वसु, विश्वेदेव, अश्विनिकुमार, राक्षस, उनचास मरुद्गण एवं पितर निकर
गन्धर्व, यक्ष, सब साध्यों, सिद्धों के निकाय, वे सब प्रभु तुमको देख रहे विस्मित होकर


मय विविध नेत्र, मुख, जंघा, पद, कर, उदर, दंत, प्रभु के इस भयकारी स्वरूप से सब आकुल
हे महाबाहु, जो रूप आपने दिखलाया, वह महाभयंकर रूप देख मैं हूँ व्याकुल


नभचुम्बी दीप्त विविधवर्णी विस्तारित मुख, प्रज्ज्वलित नेत्र , भय से आक्रांत  हो गया हूँ
भयभीत मनःस्थिति में धीरज खो करके, हे विष्णु, देखकर रूप अशान्त हो गया हूँ


विकराल दंतमय, प्रलयकाल की अग्निसदृश प्रज्ज्वलित रूप
प्रभु का मुख महाकराल देख मैं भूला सभी दिशाओं को
मन का सुख, शान्ति, खुशी सारी अब आज तिरोहित हुई प्रभो
हे जगन्नथ प्रस्फुटित करें अपनी प्रसन्न मुद्राओं को


प्रभु के शरीर में समा रहे धृतराष्ट्र पुत्र, मैं देख रहा भूपालों के समुदाय सहित
उन भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, सूतसुत को, अपनी सेना के प्रमुख युयुत्स निकाय सहित


अत्यन्त वेग से दौड रहे हैं सब के सब, प्रबु के विशाल मुख में प्रवेश करते दिखते
कुछ योद्धाओं के पूर्ण विदीर्ण हुए हैं शिर, वे सभी आप के दाँतों में लटके दिखते


जैसे अनेक सरिताओं की जलधाराएं, उद्यत होती हैं सागर में मिल जाने को
वैसे संसारलोक के ये सब योद्धा नर, गतिमान हुए, मुख में विलीन हो जाने को


जैसे देदीप्यमान हो कोई दीपशिखा, उस पर गिरते हैं शलभ नष्ट हो जाने को
वैसे विकराल आप के मुख में ये योद्धा, करते प्रवेश सारे विनष्ट हो जाने को


लोकों को ग्रास बनाते आप दीखते हैं, अत्यन्त चावपूर्वक लेलिह्यमान होकर
हे विष्णु प्रचण्ड तेज से अपने इस जग को, प्रभु तपा रहे हैं आप प्रकाशवान होकर


हैं कौन आप अति उग्र रूपवाले स्वामी, हे देवप्रवर दीजिए आप अपना परिचय
होकर प्रसन्न अपने बारे में बतलाएं, हे आदिपुरुष स्वीकार करें मेरा अनुनय


मैं हुआ प्रवृत्त नष्ट करने को लोकों को, मैं आदि पुरुष, कर्त्ता भी संहर्ता कराल हूँ
इन योद्धाओं को बिना युद्ध ही मरा समझ, मैं इन लोकों का नाशक वर्धित महाकाल हूँ


उठ जा इसलिए प्राप्त कर यश बन शत्रुजीत, धनधान्यपूर्ण यह राज्यभोग सुख पायेगा
इन दुष्टों को पहले ही मार चुका हूँ मैं, अर्जुन तू केवल विजयहेतु कहलायेगा


तू मार प्रतीक रूप में जिनको मैंने नष्ट कर दिया है
इन द्रोणाचार्य, भीष्मजयद्रथ इन सूतपुत्र योद्धाओं को
इसलिए पूर्ण निर्भय होकर निज तन मन से कर महासमर
निश्चय ही रण में जीतेगा तू इन वैरी सेनाओं से


संजय बोले


केशव के वचनों को सुनकर किरीटधारी, अर्जुन ने हाथ जोडकर किया नमन भय से
होकर सकम्प फिर बारम्बार प्रणाम किया, गदगद वाणी से कुछ कहने के आशय से


अर्जुन बोले


यह सभी आपकी कीर्ति नाम गुण का प्रभाव, यह सारा जग अनुराग हर्ष को प्राप्त हुआ
सिद्धों के गण करते हैं नमस्कार चहूँदिशि, हैं भाग रहे राक्षस भय उनमें व्याप्त हुआ


प्रभु नमन आपको करने से कैसे निज को वंचित कर लूँ,
हैं आप विधाता के भी धाता आप स्वयं हैं जगद्धाम
हे देवेश्वर महात्मन आप परे हैं असत और सत से
सच्चिदानन्दघन ब्रह्म आप को मेरा है शतशः प्रणाम


हैं आप सनातन पुरुष आप ही आदिदेव, इस सकल जगत के आश्रय और निधान आप
इस जग के ज्ञाता, ज्ञेय, और हैं परमधाम, चर और अचर में व्याप्त अनन्त अमान आप


हैं आप प्रजापति अग्नि वायु यम वरुण स्वयं, हे प्रभु स्वीकारें मेरा नमन हजार बार
हैं आप सभी के पिता और प्रपितामह हैं, हम करते बारम्बार आपको नमस्कार


हैं आप अनन्त शक्तिशाली हे सर्वात्मन, आगे से भी पीछे से भी है नमस्कार
हे अमितवीर्य अनन्तविक्रम हे जगव्यापी, स्वीकार करें प्रभु सभी दिशा से नमस्कार


प्रभु की महिमा से मैं सदैव अनभिज्ञ रहा, हे कृष्ण कहा, हे यादव अथवा सखा कहा
हे अच्युत जो भी प्रेम प्रमाद हठात कहा, बस क्षमा करें मुझको यदि कुछ अन्यथा कहा


शय्या आसन भोजन विहार विनोद के क्षण, मत ध्यान धरें अपमानों को प्रतिवादों को
प्रभु क्षमा करें एकाकी अथवा सार्वजनिक, मेरे अनुचित व्यवहारों या अपराधों को


 इस जड चेतन जग के कर्त्ता गुरु आप स्वयं, प्रभु से कोई अत्यधिक कहाँ हो सकता है
तीनों लोकों में आप सदृश दूसरा नहीं, है नहीं सदृश तो अधिक कहाँ हो सकता है


क्षमा दूसरों को इस जग में क्षमाशील करते जैसे
पिता पुत्र को, सखा सखा को, पति पत्नी को क्षमा करें
प्रभु मैं काया सहित आप के चरणों में प्रणिपात करूँ
वैसे ही अपराध हमारे हे परमेश्वर क्षमा करें


मन मेरा भय से व्याकुल व्यग्र अधीर हुआ, देखूँ अदृष्ट अद्भुत स्वरूप हर्षित होकर
इसलिए चतुर्भुज विष्णुरूप का दर्शन दें, मुझको हे जगन्निवास परम प्रसन्न होकर


प्रभु के सिर पर स्वर्णिम किरीट हो यही देखना चाहूँगा
हो एक हाथ में गदा, दूसरे कर में चक्र सुदर्शन हो
वह रूप चतुर्भुज दिखलाकर मुझको अब पूर्ण कृतार्थ करें
हे सहसबाहु अब इच्छा है बस उसी रूप का दर्शन हो


भगवान बोले


निज योगशक्ति की माया से तुझको अर्जुन, होकर प्रसन्न अपना यह रूप दिखाया है

तेजस्स्वरूप यह महाविराट असीम रूप, तेरे अतिरिक्त दूसरा देख न पाया है

इस मृत्युलोक में अर्जुन मेरा विश्वरूप, प्राणी द्वारा देखा जा सकता नहीं कभी
तप, दान, वेद, यज्ञों से, अन्य क्रिया से भी, तेरे सिवाय देखा जा सकता नहीं कभी

मन को व्यथा विहीन, विमूढ भाव को तज, भयभीत न हो मेरा विकराल स्वरूप देख
अब हो जा तू विस्मय भय रहित प्रसन्नमना, अर्जुन ! मेरा फिर वही चतुर्भुज रूप देख

संजय बोले

प्रभु वासुदेव ने अर्जुन से इतना कहकर, अपना वह रूप चतुर्भुज फिर से दिखलाया
भगवान कृष्ण ने सौम्य रूप धारण करके, भयभीत हुए अर्जुन को धीरज दिलवाया

अर्जुन बोले

अत्यन्त शान्त नर रूप देखकर हे केशव, मैं इस क्षण स्थिरमति को प्राप्त हो गया हूँ
भय विस्मय की स्थिति अब मन से दूर हुई, निज स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ

भगवान बोले

जो रूप चतुर्भु तुमने मेरा देखा है, दुर्दर्श बडा है, इसका दर्शन है दुर्लभ
लालायित रहते दर्शन को देवता सभी, होता है बडी कठिनता से यह उन्हें सुलभ

जैसे तुमको यह रूप चतुर्भुज दिखलाया, यह मेरा रूप नहीं देखा जा सकता है
वेदों, तप, दान, यज्ञ अथवा कोई विधि हो, उनसे यह रूप नहीं देखा जा सकता है

प्रत्यक्ष किया जा सकता हूँ जिसके द्वारा, अर्जुन ! मानव के पास महान शक्ति है वह
मुझमें प्रवेश, मेरा दर्शन जिससे सम्भव, हे परम तपस्वी ! एक अनन्य भक्ति है वह

जो निज कर्मों का अर्पन मुझमें करता है, मुझ पर आश्रित हो, द्वेषपूर्ण अभिव्यक्ति रहित
सबके प्रति हि निर्वैर भाव, वह भक्तिमान, होता है प्राप्त मुझे, जो है आसक्ति रहित

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