Friday, 12 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम -पंद्रहवाँ अध्याय -पुरुषोत्तम योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -पंद्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम योग
 भगवान बोले

जिस तरु की होती ब्रह्मारूप मुख्यशाखा, मैं उस अश्वत्थ जगत की जड हूँ कहलाता 
सब वेद कहे जाते हैं पत्ते उस तरु के, जो उसे तत्व से जाने वही वेद ज्ञाता


गुण विषयों रूप कोपलें जगत वृक्ष की ये, तिर्यक नर योनि रूप में हैं सर्वत्र व्याप्त
कर्मानुसार ये ममता और अहंता भी, वासना जडें ऊपर नीचे हर जगह व्याप्त


संसार रूप यह वृक्ष नहीं है दृढ स्थित, इस जगत वृक्ष की जडें अनादि अनंता हैं
वैराग्य शस्त्र से यह तरु छिन्न भिन्न कर दे, जिस तरु की मूलें ममता और अहंता हैं


जिसको पाकरके पुनरागमन नहीं होता, उस परमेश्वर का पद पाने का उपक्रम कर.
यह जग प्रवृत्ति विस्तारित है जिसके कारण, उस प्रभु स्वरूप के मनन ध्यान का प्रक्रम कर


जिसने जीता है संगदोष कामना सहित, अध्यात्मनित्य जिनके मदमान समाप्त हुए
सुख दुख रूपी द्वन्दों से जो हैं पूर्ण मुक्त, वे ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त हुए


होता है प्रत्यागमन नहीं जिसको पाकर के, शशि पावक में वह चमक नहीं उसको चमका दे
वह धाम मेरा है अतुलित परम प्रकाश पुंज सा, सूरज में भी वह तेज नहीं उसको दमका दे


वह अंश मेरा है जो शरीर में जीवात्मा कहलाता है
प्रकृतिस्थ सभी इन्द्रिय मन का वह आकर्षण करवाता है


जैसे समीर हर गंधों को अपने सँग में ले जाता है
वैसे आत्मा इन्द्रिय मन को नूतन तन में ले जाता है


आत्मा मन प्राण त्वचा रसना कानों का आश्रय लेता है
एवं नेत्रादि इन्द्रियों से विषयों का सेवन करता है


तन त्याग, शरीरस्थिति अथवा हो विषयभोग, ये स्थितियाँ अज्ञानी नहीं जानते हैं
जो ज्ञान विवेक रूप नेत्रों के स्वामी हैं, वे तत्ववेत्ता ज्ञानी इन्हें जानते हैं


कुछ यत्नपरायण होते हैं जो योगीजन, इस आत्मा का सम्यक होता है ज्ञान उन्हें
शुद्धान्तःकरण नहीं  जिनका, हैं अज्ञानी, इसके बारे में होता है अज्ञान उन्हें


जो तेज चन्द्रमा में है जो है पावक में, तू उसको मुझ परमेश्वर का ही तेज जान
वह तेज सूर्य का, जिससे जगत प्रकाशित है, उसको भी मुझ परमात्मा का ही तेज जान


हो परम सूक्ष्म करके प्रवेश इस पृथ्वी में, निज ऊर्जा से भूतों को धारण करता हूँ
रस रूप अमृतमय सोम रूप धारण करके, सारी औषधियों का मैं पोषण करता हूँ


हर प्राणी के तन में रचने बसने वाले, वह प्राणवायु बन मैं स्थित हो जाता हूँ
मैं ही अपान मैं ही वैश्वानर अग्निरूप, होकर के स्वयं चतुर्विध अन्न पचाता हूँ


मुझसे ही स्मृति ज्ञान अपोहन होता है, सब भूतों के हृदयों में निष्ठित मैं ही हूँ
वेदों का मैं ही कर्त्ता भी हूँ ज्ञाता भी, वेदों में ज्ञान स्वरूप प्रतिष्ठित मैं ही हूँ


पाये जाते हैं दो प्रकार के पुरुष यहाँ, पहला है नाशवान दूजा अविनाशी है
सब भूत प्राणियों के शरीर हैं नाशवान, आत्मा ही कहलाता अक्षर अविनाशी है


इन दोनों से भी उत्तम अन्य पुरुष है जो, वह तीनों लोकों का पोषक है धाता है
जिसको अक्षर अव्यय अविनाशी कहते हैं, वह परमपुरुष ही परमात्मा कहलाता है


इस नाशवान जडवर्ग क्षेत्र से मैं अतीत, मैं जीवात्मा से भी उत्तम कहलाता हूँ
सारे वेदों में मेरा ही गुणगान भरा, सारे लोकों में पुरुषोत्तम कहलाता हूँ


हे अर्जुन ! जो भी ज्ञानी नर पुरुषोत्तम मुझे समझता है
मुझ वासुदेव परमेश्वर को वह सब प्रकार से भजता है


अत्यंत ज्ञानमय गुप्त शास्त्र, इससे जो युक्त यथार्थ हुआ
निष्पाप पार्थ ! यह तत्व जान वह, समझो पूर्ण कृतार्थ हुआ


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GITAMRITAM गीताऽमृतम -चौदहवाँ अध्याय - गुणत्रय विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -चौदहवाँ अध्याय
गुणत्रय विभाग योग


भगवान बोले


ज्ञानों में भी अति उत्तम जो वह तथ्य पुनः समझाऊँगा
जिससे मुनियों को मिली सिद्धि वह परम ज्ञान बतलाऊँगा


इसके आश्रय से मुझे प्राप्त नर जीवन ग्रस्त नहीं होता
यह ज्ञान प्राप्त कर प्रलय काल में व्याकुल त्रस्त नहीं होता


इस महत ब्रह्मरूपी निसर्ग की योनिमध्य, चेतनता रूपी गर्भ स्थापन करता हूँ
हे अर्जुन उस जड चेतन का संयोग करा, सारे भूतों का मैं उत्पादन करता हूँ


यह प्रकृति समस्त योनिधारी भूतों की होती है माता
हे अर्जुन गर्भाधान हेतु बनता मैं पिता वीर्यदाता


यह प्रकृति सत्व, रज तम पैदा करती शरीर में
जो अव्यय आत्मा को निबद्ध करते शरीर में


निश्पाप पार्थ उन तीनों में से एक सत्व, निर्मल होता है एवं है प्रकाशवान
बस एक सत्व गुण होता है विकारवंचित, उससे सम्बन्धित होता है सुख और ज्ञान


हे अर्जुन ! यह रज गुण होता है रागरूप, मानव मन को तृष्णाओं से आबद्ध करे
आसक्ति और कामना रूप संजालों से, आत्मा को कर्मों के फल से सम्बद्ध करे


अज्ञान तमस उत्पन्न करे हे महाबाहु, इससे सारे जीवों का मोहन होता है
निद्रा आलस्य प्रमाद अनेक विचारों का, इस जीवात्मा पर दुष्कर बंधन होता है


हे पार्थ ! सत्व गुण सदा पुरुष का सुख आनन्द बढाता है
रज गुण  मानव को कर्मों के निष्पादन को उकसाता है
तम गुण मानव के ज्ञान बुद्धि को आच्छादित करके रहता
जिसके कारण नर के शरीर में आलस घर कर जाता है


रज और तमोगुण का होता जब दलन कभी, अर्जुन जीवों में तभी सतोगुण बढता है
रज और सत्व के दबने से तम गुण बढता, तम सत्व क्षीण होता है तो रज बढता है


जिस समय देह के सब द्वारों में ज्ञान विवेक प्रकाशित है
उस समय सत्वगुण का प्रभाव समझो परिपूर्ण विराजित है


फल की अभिलाषा से सारे कर्मों का निष्पादन होता
मानव जब लोभ प्रवृत्ति स्वार्थ के सोपानों पर चढता है
होती उत्पन्न अशान्ति, विषय भोगों में आकांक्षा करता
हे अर्जुन ! पुरुष देह में समझो तभी रजोगुण बढता है


कर्मों में अरुचि प्रमाद बढे, हो अहंकार एवं मोहन
तब होती वृद्धि तमोगुण की ऐसा समझो हे कुरुनन्दन


यदि सत्व बढा हो उस क्षण मानव मृत्यु प्राप्त होता है
शुभकर्मा का उसको निर्मल लोक प्राप्त होता है


जिसकी हो मृत्यु रजोगुण में, मानव की योनि उसे मिलती
तम गुण मृतकों को जीव जन्तुओं जैसी मूढ योनि मिलती


राजस कर्मों का फल दुखमय होता है, सात्विक से वैराग्य और सुख ज्ञान जान
अंधकार देता है तामस कर्म सदा, उसके ही प्रतिफल को तू अज्ञान जान


लोभ सदा उत्पन्न रजोगुण से होता, सत्व गुणों से होता है सद्ज्ञान उदय
मोह प्रमाद तमोगुण से उत्पन्न जान, औए उसी से होता है अज्ञान उदय


स्वर्गादि उच्च लोकों को पाते सत्वगुणी, जो रजोगुणी वे मर्त्यलोक को जाते हैं
जिनकी है घोर जघन्य तमोगुण की प्रवृत्ति, तामसी पुरुष नरकादि लोक को जाते हैं


कोई दृष्टा जिस समय सत्व रज तम गुण के, अतिरिक्त किसी को कर्त्ता नहीं मानता है
उसको मेरे स्वरूप को प्राप्त हुआ समझो, जो मुझ ईश्वर को इनसे परे जानता है


काया के कारण होते सत्व और रज तम, जो तीनों गुण का उल्लंघन कर जीता है
वह जरा मृत्यु जन्मों के दुख से मुक्त हुआ, ईश्वर को पाकर आनन्द अमृत पीता है


अर्जुन बोले


इन तीन गुणों का जो उल्लंघन कर जाता, क्या लक्षण उसके कैसा होता है प्रतीत
वह प्राणी इस जग में किस तरह बरतता है, जो प्राणी होता है इस गुणत्रय से अतीत


भगवान बोले


जो पुरुष सत्व रज तम गुण के छा जाने पर, है प्रकट न करता उनसे द्वेष अनिच्छा भी
अथवा उनसे सम्यक निवृत्त हो जाने की, मन में रहती है जिसके तनिक न इच्छा भी


जो साक्षी के समान स्थित निश्चल होकर, गुण गुण में सदा बरतते यही समझता है
हो एकनिष्ठ सच्चिदानन्द घन में स्थित, फिर इस स्थिति से कभी न विचलित होता है


जो आत्मभाव में स्थित सुख दुख सम समझे, ज्ञानी, प्रिय अथवा अप्रिय जिसे समान लगे
कोई करता हो निंदा अथवा स्तुति भी, जिस नर को यह सारा वर्ताव समान लगे


अपमान मान दोनों में ही जो सम रहता, अरि मित्र सभी के प्रति समता अपनाता है
निज कर्त्तापन के अहंकार से रहित हुआ, होता जो नर वह, गुणातीत कहलाता है


जो पुरुष अचंचल भक्तियोग से मुझमें ध्यान लगाता है
वह गुणातीत होकर के मेरी प्राप्ति योग्य बन जाता है


उस परमब्रह्म, उस नित्यधर्म, उस अमृत का मैं आश्रय हूँ
उस अविनाशी आनन्द महासुख का भी मैं परमाश्रय हूँ


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