Sunday, 28 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम -सत्रहवाँ अध्याय-श्रद्धा त्रय विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम -सत्रहवाँ अध्याय
श्रद्धा त्रय विभाग योग


अर्जुन बोले


केशव ! जो शास्त्र निरत होकर करते हैं पूजा श्रद्धा मय
उनकी निष्ठा कैसी होती, सात्विक, राजस या तामस मय


भगवान बोले


इन श्रद्धाओं की हर मानव में तीन विधायें होती हैं
सात्विकी राजसी और तामसी ये श्रद्धायॆ होती हैं


जिसका अन्तस्तल है जैसा वैसी ही उसकी श्रद्धा है
वह पुरुष स्वयं वैसा होता है जैसी उसकी श्रद्धा है


सात्विक श्रद्धा वाले मानव देवों की पूजा करते हैं
राजसी पुरुष राक्षसों और यक्षों की पूजा करते हैं
तीसरी और निष्ठा है जो तामसी वृत्ति कहलाती है
तामसी वृत्ति के नर भूतों प्रेतों की पूजा करते हैं


विपरीत शास्त्र विधि के जो कल्पित घोर उग्र तप करते हैं
वे काम राग बल अहंकारमय दम्भ आचरण करते हैं


कायस्थ भूतगण, मुझको भी, होते वे कृश करने वाले
जिनका ऐसा आचरण वही होते आसुर स्वभाव वाले


हर प्राणी के स्वभाव के कारण अलग अलग, आहारों की भी तीन तरह की श्रेणी है
इनके सब पृथक पृथक भेदों को मुझसे सुन, तप दान यज्ञ की अपनी अलग त्रिवेणी है


बल बुद्धि आयु आरोग्य और जो सुखवर्धक, रसयुक्त भोज्य जो प्रीति बढाने वाले हैं
जो स्निग्ध और सुस्थिर हैं प्रिय सात्विक जन को, रुचिकर जो सात्विक भाव बढाने वाले हैं


कटु अम्ल लवण अति उष्ण तीक्ष्ण रूखे हैं जो, जो ज्वलन प्रदाहपूर्ण हैं और विदाहक हैं
उत्पन्न करें जो चिन्ता रोग और दुख को, वे भोज्य द्रव्य राजसी वृत्ति संवाहक हैं


अधपका रसरहित होता जो दुर्गन्ध पूर्ण, जो भी भोजन उच्छिष्ट पर्युषित होता है
स्वच्छता और शुचिता से जो तैयार नहीं, उसको पाकर तामसी उल्लसित होता है


यज्ञों का करना ही नर का कर्तव्य परम, इस मति से शास्त्र विहित जो यज्ञ किया जाता
जिसमें सन्निहित नहीं फल की अभिलाषा है, उन यज्ञों को ही सात्विक यज्ञ कहा जाता


हे भरत श्रेष्ठ ! फल अथवा दम्भाचरण हेतु, जो मानव यज्ञों का आयोजन करते हैं
कहलाते हैं ये यज्ञ सदा राजसी यज्ञ, ऐसों को ही राजसी वृत्ति जन कहते हैं


शास्त्रोक्त विधान हीन होता जो मंत्र रहित, दक्षिणा और श्रद्धा का जिसमें है अभाव
जिसमें हो अन्नदान सा पावनदान नहीं, उन यज्ञों का कहलाता है तामसी भाव


ब्राह्मणों ज्ञानियों गुरुओं का पूजन अर्चन, अथवा देवों का यजन और जप होता है 
शुचिता आर्जव ब्रह्मचर्य अहिंसा का पालन, मानव शरीर सम्बन्धी यह तप होता है


उद्वेगहीन, प्रिय, हितकारी, यथार्थ भाषण, अभ्यास सहित जो ईश नाम जप होता है
वेदों एवं शास्त्रों का पाठन पठन श्रवण, वाणी से सम्बन्धित सारा तप होता है


मन की प्रसन्नता शान्तभाव मन का निग्रह, भगवद चिंतन विचार जब मन में रहते हैं
अन्तस्तल में शुचिता पवित्रता रहे सदा, इसको ही मानस सम्बन्धी तप कहते हैं


पूर्वोक्त तरह के तीनों तप सात्विक कहलाये जाते हैं
निष्काम योगियों द्वारा श्रद्धा से अपनाये जाते हैं


सत्कार मान पूजा अथवा हो स्वार्थसिद्धि, पाखण्ड भाव से जो अपनाये जाते हैं
जिसका परिणाम सुनिश्चित होता नहीं कभी, राजसी भाव के तप कहलाये जाते हैं


अपनी काया मन वाणी को पीडित करके, मूढता पूर्वक हठ से जो तप  होता है
जिसमें अनिष्ट हो निहित दूसरे लोगों का, ऐसा अनिष्टकारी तामस तप होता है


जो दान दिया जाता है निज कर्तव्य समझ, जो देश काल या पात्रों के प्रति होता है
जिसमें हो प्रत्युपकार भावना निहित नहीं, सद्भावयुक्त वह दान सात्विक होता है


फल अथवा प्रत्युपकार भावना हो जिसमें, इस दृष्टिकोण से जो भी दान दिया जाता
जिसको प्रदान करने में होता महा कष्ट, राजसी भाव का दान वही है कहलाता


जिसमें हो असत्कार अथवा हो तिरस्कार, कलुषित भावना पूर्ण जो दान दिया जाता
जो अनुचित देश काल पात्रों के प्रति होता, वह दान सर्वथा तामस दान कहा जाता


सच्चिदानन्दघन ब्रह्म नाम कहलाता सदा ऊँ तत सत
उससे ही रचे गये ये ब्राह्मण वेद यज्ञ सम्पूर्ण जगत


है यही अपेक्षित ब्रह्मवादियों को शास्त्रों में है विधान
हरि नाम ऊँ का उच्चारण करके होते तप यज्ञ दान


तत नाम कहा जाता उसको जिसने सारा संसार रचा
तप दान और यज्ञों का फल उस परमात्मा को अर्पित है
जो है मुमुक्ष इच्छाविहीन उसका ऐसा ही चिंतन है
उसके द्वारा प्रदत्त सब कुछ उसके ही लिए समर्पित है


सत सत्य भाव में परमात्मा के लिए प्रयोग किया जाता
उत्तम कर्मों के करने में सत का उपयोग किया जाता


तप दान और यज्ञों में भी सत ही प्रयोग में आता है
जो कर्म समर्पित ईश्वर को वह भी सत ही कहलाता है


हे अर्जुन हवन दान तप जो श्रद्धाविहीन, अथवा जो हैं सत्कर्म न होते शुभकारी
श्रद्धा विहीन यह सब कुछ असत कहा जाता, परलोक, लोक दोनों में तनिक न हितकारी


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