Sunday, 24 July 2011

GITAMRITAM (गीता‍मृतम - नवाँ अध्याय -राजविद्या राजगुह्य योग )

नवाँ अध्याय - राजविद्या राजगुह्य योग
भगवान बोले

तुझ दृष्टिदोष से रहित भक्त को गोपनीय, मेरे द्वारा वह ज्ञान बताया जायेगा
विज्ञान सहित यह ज्ञान समझकर भलीभाँति, तू दुखरूपी भवसागर को तर जायेगा

विज्ञान सहित यह ज्ञान सुगम अति उत्तम है, विद्याओं और रहस्यों का अधिशासी है
यह अति पवित्र, प्रत्यक्ष फलद, है धर्मयुक्त, यह मेरी सत्ता का स्वरूप अविनाशी है


जो श्रद्धाहीन पुरुष यह धर्माचरण नहीं कर पाते हैं
वे मुझको प्राप्त न होकर भवसागर में आते जाते हैं


जैसे जल ढका हुआ होता है बर्फों से, वैसे ही मुझसे यह सारा जग आवृत है
सब प्राणी संकल्पों से स्थित हैं मुझमें, पर मेरी सत्ता उनमें नहीं समावृत है


तू देख मेरी ईश्वरी शक्ति का कौतूहल, वास्तव में मुझमें कोई भूत नहीं स्थित
धारण पोषण करता मैं सभी प्राणियों का, पर भूतों में मैं कभी नहीं रहता स्थित


जैसे विस्तृत समीर मण्डल आकाश मध्य में स्थित है
वैसे सब भूतों की सत्ता मुझ परमेश्वर में स्थित है


हे अर्जुन कल्पों की समाप्ति पर भूत सभी, मेरी प्रकृति के अन्दर लय हो जाते हैं
उनकी रचना करता हूँ कल्पारम्भ समय, तब इस जग में वे पुनः उदय हो जाते हैं


अपनी स्वयं प्रकृति को जब मैं अभियोजित करता हूँ
परवश हुए भूतगण को कर्मानुसार रचता हूँ


कर्मों के प्रति मैं उदासीन आसक्ति रहित रहता हूँ
इसीलिए हे अर्जुन ! उनसे कभी नहीं बँधता हूँ


मैं सबका स्वामी हूँ मेरी इच्छा पर ही, 
प्रकृति चराचर सहित सकल जग को रचती है
मैं हूँ एकमात्र कर्ता संसार चक्र का, 
जिसके संकेतों पर विश्वधुरी चलती है


जो मूढ और अज्ञानी हैं वे मुझको नहीं जानते हैं, 
उनको मैं तुच्छ मनुज शरीरधारी समान ही दिखता हूँ
मेरे उस भूत महेश्वर का है भाव उन्हें कुछ पता नहीं
इसलिए उन्हें मैं केवल साधारण मानव सा लगता हूँ


हैं व्यर्थ सभी, जिनकी आशायें, धर्म, ज्ञान, वे अज्ञानी जन कहलाते विक्षिप्तचित्त
रहता सदैव उनका स्वभाव, चिंतन, विचार, राक्षसी, आसुरी और मोहिनी में प्रवृत्त


दैवी निसर्ग के आश्रित सभी महान पुरुष, ज्ञानीजन अन्य दूसरे आश्रय तजते हैं
मेरा भूतेश्वर अव्ययरूप समझ करके, काग्रभाव से मुझे निरंतर भजते हैं


दृढ निश्चय वाले ऐसे भक्तिमान प्राणी, मेरा कीर्तन कर यत्न साधना करते हैं
कर बारम्बार प्रणाम मुझे श्रद्धापूर्वक, वे ध्यानयुक्त होकर उपासना करते हैं


कुछ ज्ञानयज्ञ के साधक निर्गुण निराकार, की एकनिष्ठ अविचल उपासना करते हैं
हैं अन्य दूसरे मानव जो कुछ पृथक रूप, मुझ प्रभु विश्वतमुख की उपासना करते हैं


मैं हूँ यज्ञ, स्वधा भी मैं हूँ, औषधि और मनोरथ हूँ
मैं ही मंत्र, अग्नि, घृत मैं हूँ, मैं ही हवन क्रियापथ हूँ


एक मात्र मैं ही हूँ जग का पिता पितामह, मैं ही माता धाता जग का महाभूप हूँ
यजुर्वेद मैं ही हूँ, ऋक, सामादि वेद हूँ, मैं हूँ विद्यावेद्य और ऊँकाररूप हूँ


सबका प्रभु साक्षी निवास हूँ शरण सुहृद हूँ, मैं ही सब चेष्टाओं की वांछित सद्गति हूँ
प्रभव प्रलय का हेतु निधान और अविनाशी, मैं हूँ सकल विश्व आधार, परम स्थिति हूँ


मैं सूर्य रूप जाज्ज्वल्यमान हो तपता हूँ, वर्षा आकर्षित कर उसको बरसाता हूँ
हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु भी हूँ, मैं सत हूँ, एवं मैं ही असत कहाता हूँ


त्रैविद्योपासक, सोमरसिक जो पापरहित, यज्ञों से स्वर्ग प्राप्ति के अनुरागी होते
अपने पुण्यों से स्वर्ग लोक मिलता उनको, वे नर देवों के दिव्य भोगभागी होते


उस भव्य स्वर्ग के भोगों का आस्वादन कर, पुण्यों के क्षय पर मृत्युलोक में आते हैं
वेदों के आश्रित होकर पूर्ण कामकामी, इस आवागमन मार्ग में आते जाते हैं


जो सतत अनन्य भावना से मेरी उपासना है करता
सब योग क्षेम दायित्व भार उसका मैं स्वयं वहन करता


वे भी समझो मेरी ही पूजा करते हैं, जो अन्य देवताओं को भजते कामयुक्त
यद्यपि वह होता श्रद्धायुक्त सकाम भक्त, पर उसका यह पूजन होता अज्ञानयुक्त



सब यज्ञों का भोक्ता स्वामी भी मैं ही हूँ, पर देवों की सकाम जो पूजा करते हैं
उनको होता इस परमतत्व का ज्ञान नहीं, इसलिये सदा भवसागर में वे गिरते हैं


देवों की पूजा करने वाले देवों को ही प्राप्त करें, पितरों की पूजा करने वाले पितरों को ही प्राप्त करें
भूतों की पूजा करते जो भूतों को वही प्राप्त होते, जो मेरी पूजा करते हैं वे परमेश्वर को प्राप्त करें


जो भक्तिभाव से पत्र, पुष्प, फल, जल अर्पण, करता है मुझको, पूर्ण प्रेम उत्कट होकर
उन निश्छल भक्ति भावनामय नैवेद्यों को, मैं सगुण रूप से खाता स्वयं प्रकट होकर


अर्जुन ! जो भी हवन, दान, तप, तर्पण कर
सब कर्मों भोगों को मुझमें अर्पण कर


अशुभ और शुभ फल का भागी नहीं बने, जो करता सब कर्मों को मुझमें अर्पण
योगयुक्त ऐसे संयासी आत्मा को, बाँध नहीं सकते हैं कर्मों के बंधन


सब भूतों पर रहती है समदृष्टि मेरी, कोई अप्रिय, और न ही है प्रिय मुझको
मुझमें वे हैं भक्त और मैं भक्तों में, प्रीतिपूर्वक जो भी भजते हैं मुझको


जो भी अनन्यभाव से मुझको है भजता, है साधु सदृश कितना भी दुष्कर्मी अतिशय
वह है यथार्थ दृष्टा, ईश्वर के भजन बिना, सब कुछ है व्यर्थ करे ऐसा जो दृढ निश्चय


वह पुरुष शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, ऐसा ही नर पाता चिर शान्ति परमगति को
हे अर्जुन ! तू यह सत्य जान, वह भक्त मेरा, होता है प्राप्त कभी भी नहीं अधोगति को


हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र हों कोई भी, जो मानव मेरे शरणागत हो जाते हैं
चाण्डाल आदि जो पाप योनि में भटक रहे, वे भी मेरा शुभ परमधाम पा जाते हैं


राजर्षि भक्तजन ब्राह्मण सुकृत मुझे ही भज, पा जाते मेरा धाम, व्यर्थ का चिंतन तज
सुख रहित और क्षणभंगुर मानव तन पाकर, हे अर्जुन !मोक्ष हेतु तू केवल मुझको भज


बन भक्त मेरा, मेरा जन कर नमन मुझे, मन में हर क्षण हो मेरा ही चिंतन विशिष्ट
अर्जुन ! अपनी आत्मा को मुझमें कर नियुक्त, तू अन्तकाल में मुझमें होगा समाविष्ट

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