Saturday, 20 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सोलहवाँ अध्याय -दैवासुर सम्पद विभाग योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सोलहवाँ अध्याय 
दैवासुर सम्पद विभाग योग


भगवान बोले


जिसकी होती है ज्ञान योग में दृढ स्थिति, जो सत्व और संशुद्धियुक्त है पूर्ण अभय
सार्जव स्वाध्याय सहित शास्त्रों का पठन करे, दम दान यज्ञ तप में रत होकर सरल हृदय


हो सत्य, अक्रोध, त्याग, हिंसा का भाव नहीं, परनिंदारहित, शान्ति एवं कोमलता हो
हो विषय विरक्त, अनैतिकता के प्रति लज्जा, हो दयावान, मन में जिसके अचपलता हो


जिनमें अद्रोह, धृति, क्षमा, तेज एवं शुचिता, जो निज पूज्यता भाव से मुक्त पुरुषगण हैं
हे अर्जुन ये सारे गुण जो हैं बतलाये, दैवी सम्पदा युक्त पुरुषों के लक्षण हैं


अज्ञान घमण्ड दम्भ जिसमें है क्रोध भाव, जिसका है हृदय कठोर और अभिमान जिसे
अर्जुन जिसकी भी होती है प्रवृत्ति ऐसी, आसुरी सम्पदा वाला ही नर जान उसे


दैवी आसुरी सम्पदायें हैं इस जग में, आसुरी सम्पदायें देती हैं पृक्ति सदा
दैवी सम्पदावान अर्जुन तू शोक न कर, दैवी सम्पदा सर्वथा देती हैं मुक्ति सदा


हे पार्थ लोक में दो प्रकार के प्राणी हैं, पहले हैं जो होते दैवी स्वभाव वाले
विस्तार सहित दैवी स्वभाव को बतलाया, अब उनको सुन जो हैं आसुरी भाव वाले


आसुरी भाव वाले मनुष्य वे होते हैं, जिनको प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति का ज्ञान नहीं
जिनमें आचरण सत्य शुचिता का है अभाव, जिनके मन में इन सबके प्रति सम्मान नहीं


जग आश्रय रहित असत्य बिना ईश्वर के है, आसुरी वृत्ति वाले कहते संयोग मात्र
इसकी उत्पत्ति काम से है अन्यथा नहीं, है इसका कारण नर नारी सम्भोग मात्र


अवलम्बन लेकर मिथ्यापरक विचारों का, निज विमल स्वभाव नष्ट करके मतिमन्द हुए
सब भूतों के अपकारी वही क्रूरकर्मा, जग अहित हेतु उत्पन्न और स्वच्छन्द हुए


मद मान दम्भ दुष्पूर्य कामनायुक्त पुरुष, अपनी मति के अनुरूप अनुकरण करते हैं
अज्ञान और मिथ्या सिद्धांतों पर आश्रित, आचरणभ्रष्ट हो करके विचरण करते हैं


होकर आजीवन चिंताओं से युक्त सदा, विषयोपभोग में निशि दिन तत्पर रहते हैं
वे विषय भोग के सुख को सच्चा सुख समझें, इतना ही सुख है वे ऐसा ही कहते हैं


शतशत आशा की जंजीरों में फँसे हुए, वे काम क्रोध के वशीभूत होकर रहते
जिससे अधिकाधिक विषय भोग का अवसर हो, अन्याय पूर्वक धन बल का संग्रह करते


मैने यह इतना सब कुछ प्राप्त कर लिया है, आगे भी सभी मनोरथ पूर्ण करूँगा मैं
इतना सारा धन वैभव प्राप्त किया मैंने, फिर फिर इनसे निज को परिपूर्ण करूँगा मैं


मैंने अपने उस वैरी को है मार दिया, अन्यों को भी मारूँगा मैं बलवाला हूँ
सिद्धियाँ सभी मेरे चरणों की दासी हैं, मैं ईश्वर हूँ ऐश्वर्य भोगने वाला हूँ


मेरे समान है कौन बडा इस दुनिया में, मैं बडा धनाड्य और मेरा परिवार बडा
कर दान यज्ञ आमोद प्रमोद करूँगा मैं, ऐसा जो सोचे उसका है अज्ञान बडा


ये चित्तभ्रान्त नर मोहजाल से आच्छादित, अपने मन में झूठा भ्रम लेकर फिरते हैं
विषयोपभोग में लिप्त आसुरी वृत्ति युक्त, अपवित्र भयंकर महा नरक में गिरते हैं


धन मान मदान्वित निज को परम श्रेष्ठ समझें, स्तब्ध हुए निज महिमा मण्डन करते हैं
जो माना जाता शास्त्रों के विपरीत सदा, पाखण्ड पूर्ण वह यज्ञायोजन करते हैं


बल क्रोध घमण्ड कामना एवं अहंकार, से परिपूरित होकर पर निंदा करते हैं
मैं परमात्मा सबके शरीर में स्थित हूँ, वे नर समझो मुझसे ही ईर्ष्या करते हैं


जो द्वेष दूसरों से करते हैं पुरुष अधम, जो क्रूर हृदय हैं पाप आचरण करते हैं
जग में वे मेरी सृजित व्यवस्था अन्तर्गत, आसुरी योनियों को ही धारण करते हैं


मैं हूँ अप्राप्त मूढों को जन्मों जन्मों तक, भोगते वही आसुरी योनि की दुर्गति को
आसुरी योनियों से भी घोर नरक वाली, वे दुष्ट प्राप्त होते अत्यन्त नीच गति को


हैं आत्मविनाशक काम क्रोध लालसा सभी, यह इनका है गुणधर्म और मजबूरी है
ये तीनों ही नरकों का द्वार दिखाते हैं, इसलिए सर्वथा इनका त्याग जरूरी है


हे अर्जुन इन तीनों नरकों के द्वारों से, जो पुरुष स्वयं को पूर्णमुक्त कर पाता है
अपने कल्याण मार्ग पर जो नित चलता है, वह मुझे प्राप्त कर परमधाम पा जाता है


शास्त्रोक्त कर्म को त्याग पुरुष जो कामाचारी होता है
सुख सिद्धि परमगति नहीं किसी का भी अधिकारी होता है


हैं शास्त्र प्रमाणित, कार्याकार्य व्यवस्था में, तू तदनुरूप निज कर्मों का निष्पादन कर
शास्त्रानुसार जो नियत कर्म कहलाते हैं, हे अर्जुन तू उन कर्मों का सम्पादन कर


                                                          **********