Monday, 11 April 2011

GITA AMRITAM गीताऽमृतम _ अध्याय एक एवं दो

प्रथम अध्याय
अर्जुन विषाद योग


धृतराष्ट्र बोले


उस धर्म छेत्र उस कुरुछेत्र का हाल मुझे अब समझाओ
हे संजय पाण्डु  और मेरे पुत्रों का कौशल बतलाओ


संजय बोले


पाण्डव सेना का चक्रव्यूह देखा दुर्योधन ने जिस क्षण
आचार्य द्रोण के पास पहुँच निज मन की बात कहा तत्क्षण


आचार्य प्रवर देखो पाण्डव सेना जो व्यूहाकार खडी
तव शिष्य द्रुपद सुत के द्वारा सज्जित होकर साकार खडी


भीषण धनुषों वाले योधा भीमार्जुन जैसे शूर वीर
सात्यकि विराट नृप द्रुपद सहित ये सब के सब हैं महावीर


पुरुजित योधा हैं कुन्तिभोज नृप शैव्य विपुल बल वैभव हैं
ये ध्रिष्ट्केतु ये चेकितान ये काशिराज नरपुंगव हैं


देखो बलवान उत्तमौजा औ’ युधामन्यु सब वीर खडे
अभिमन्यु सहित सब द्रौपदेय ये महारथी रणधीर खडे


अपनी सेना के वीरों का भी तुमको ध्यान कराता हूँ
हे ब्रह्मश्रेष्ठ सेनानायक वीरों का ज्ञान कराता हूँ


हैँ आप पितामह कृपाचार्य ये कर्ण विकर्ण अश्वथामा
ये भूरिश्रवा हैं सब के सब सन्नद्ध त्यक्त जीवनकामा


अपनी यह सेना भीष्म पितामह के द्वारा संरक्षित है
भीमादि जनों द्वारा रक्षित उनकी सेना असुरक्षित है


इसलिये सभी कोणों पर युद्ध क्षेत्र में सब तत्पर रहिये
सारे सेनानी सब विधि भीष्मपितामह की रक्षा करिये


फ़िर भीष्मपितामह ने भीषण शंखध्वनि का गुंजार किया
दुर्योधन के अन्तर्मन में स्फूर्ति हर्ष संचार किया


जब शंख नगारों ढोल मृदंग नरसिंहों का अनुनाद हुआ
तो महा भयंकर नाद हुआ उत्पन्न युद्ध उन्माद हुआ


तदनन्तर कृष्ण और अर्जुन उस युद्ध क्षेत्र में आते हैं
श्वेताश्वनद्ध रथ पर से दिव्यालौकिक शंख बजाते हैं


अर्जुन ने देवदत्त केशव ने पान्चजंय का घोष किया
आजानुबाहु अभिमन्यु ने फिर रणारम्भ संकेत किया


अर्जुन ने देखा शत्रु सैन्य उद्यत है शस्त्र प्रहार हेतु
कपिध्वज ने धनुष लिया कर में निज वीरोचित व्यवहार हेतु


अर्जुन बोले



दोनों सेना के मध्य कृष्ण मेरा रथ स्थापित करिये
अब अपने कुशल सारथी का कर्तव्य्बोध ज्ञापित करिये



मैं देखूँ कौन कौन योद्धा रण अभिलाषा से आए हैं
किन किन से होगा युद्ध मेरा जो अपने हुए पराये हैं


दुर्योधन हित आतुर जन का अवलोकन करना चाहूँगा
उनके बल पौरुष कौशल का अवगाहन करना चाहूँगा


संजय बोले


फिर अर्जुन की इच्छानुरूप केशव ने रथ को बढा दिया
दोनों सेना के मध्य क्षेत्र में उत्तम रथ को खडा किया


फिर बोले पार्थ देख इन युद्धातुर दोनों सेनाओं को
अरि दल में भीष्मपितामह द्रोणाचार्य प्रमुख योद्धाओं को


ताऊ चाचों दादों परदादों गुरुओं औ’ मामाओं को
पुत्रों पौत्रों मित्रों ससुरों सुहृदों को औ’ भ्राताओं को


दोनों सेना के मध्य खडे देखा अत्यन्त विषाद हुआ
कुन्तीसुत अर्जुन के मन में करुना पूरित अवसाद हुआ


अर्जुन बोले


यह दृश्य देखकर हे केशव मेरा मन होता है अधीर
अब सूख रहे हैं होंठ मेरे औ’ शिथिल हुआ जाता शरीर


कम्पित होता है अंग अंग भ्रमतम से मन घिर जाएगा
जल रही त्वचा लगता कर से गांडीव अभी गिर जाएगा


रोमांच हो रहा ऐसा है इस समय नहीं कह सकता हूँ
मतिभ्रम की दुःसह अवस्था में अब खडा नहीं रह सकता हूँ


स्वजनों सुहृदों का वध करना कल्याणपरक अनुकूल नहीं
उद्देश्यहीनता लगती है कर रहा कोई यदि भूल नहीं


हे कृष्ण विजय सुख राज्य भोग की नहीं कोई आकांक्षा है
ऐसे जीवन की नहीं बची किंचित मन में अभिलाषा है


हम जिनकी खातिर राज्य सौख्य की इच्छा रखकर आए हैं
इस रण में वे तन मन धन जीवन आशा रखकर आए हैं


गुरुजन ताऊ चाचे लड्के दादे मामे सब क्रुद्ध यहाँ
साले संबंधी ससुर पौत्र कैसे इनसे हो युद्ध यहाँ


इन सबका वध करने से मेरा अन्तर्मन हिल जाएगा
क्या लाभ हमें पृथ्वी क्या तीनों लोक अगर मिल जाएगा


धृतराष्ट्र सुतों का वध क्या केशव शान्ति हमें दे पाएगा
इन आतताइयों की हत्या का पाप हमें लग जाएगा


धृतराष्ट्र पुत्र वान्धवगण का हम वध कैसे कर पाएंगे
स्वजनों का वध करके केशव हम सुखी कहाँ रह पाएंगे


यद्यपि ये लोभी भ्रष्टचित्त कुलक्षय अघ से गतभान हुए
ये हैं कृतघ्न ये मित्रद्रोह के पातक से अनजान हुए


कुल क्षय का पाप न हो सिर पर अब यही यत्न करना होगा
हम ज्ञानीजन को युद्ध निवारण का प्रयत्न करना होगा


कुलक्षय होगा तो निश्चय ही कुल धर्म नष्ट हो जाएगा
कुलधर्म नाश हो जाने पर अतिशय अधर्म बढ जाएगा


नारियाँ प्रदूषित होती हैं जब जब अधर्म बढ जाता है
फिर मिश्रवर्ण सन्तानों से कुल भाल कलुष मढ जाता है


ये दुष्ट कुलघ्न सकल कुल को नरकों का द्वार दिखाते हैं
पिण्डोदक क्रियाहीन दुष्टों के पितर अधोगति पाते हैं


वर्णसंकर कारक दोषों से होता है शाश्वत धर्म नष्ट
ऐसी कुलघाती सन्तति से हो जाती है कुलजाति भ्रष्ट


कुलजाति भ्रष्टता नर को अविरल नरकावास कराती हैं
ऐसी प्रचलित हैं जनश्रुतियाँ इसका आभास कराती हैं


निज को हम कहते हैं प्रबुद्ध उद्यत करने को महापाप
स्वजनों की हत्या और राज्यसुख प्राप्ति लोभ धिक ताप शाप


शस्त्रास्त्र सुसज्जित कौरवगण यदि लेलें मेरे प्रण यहाँ
हे वार्ष्णेय तो भी अपना समझूँगा मैं कल्याण यहाँ


संजय बोले


रण में ऐसा कह कर रथ के पीछे जा बैठा पार्थवीर
हाथों से फेंका धनुषवाण विचलित हो शोकाकुल अधीर
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दूसरा अध्याय


सांख्य योग


संजय बोले


उठ रही हृदय में शोक लहर आँखों में छलका अश्रुविन्दु
अत्यन्त अधीर धनन्जय को देखा तो बोले कृपासिंधु


भगवान बोले


अर्जुन तुझ जैसे वीरों को क्यों मोहजाल कर रहा ग्रस्त
यह वंचित करता स्वर्ग प्राप्ति यह कर देता यशसूर्य अस्त


कहलाया जाए क्लीव अगर यह उचित प्रतीत न होता है
मन की दुर्बलता त्याग युद्ध कर व्यर्थ समय क्यों खोता है


अर्जुन बोले


ये भीष्मपितामह और द्रोण ये पूजनीय दोनों ही हैं
कैसे इनसे मैं युद्ध करूँ ये वन्दनीय दोनों ही हैं


गुरुओं के वध पर राज्यप्राप्ति से भिक्षावृत्ति श्रेष्ठतर है
यह रक्तस्नात धनवैभव सचमुच मेरे लिए कष्टकर है


है मार्ग कौन सा श्रेष्ठ युद्ध करना या युद्ध नहीं करना
यह नहीं पता उनका वध होगा या होगा हमको मरना


कायरता व्याप्त हुई मन में उपहत स्वभाव है चित्तभ्रान्ति
कल्याणपरक उपदेश करें जिससे मन में हो अचल शान्ति


माना पाऊँगा राज्य पूर्ण निष्कंटक वैभववाला है
पर शोक दूर हो कैसे जो इंद्रियाँ सुखानेवाला है


संजय बोले


यह युद्ध नहीं होगा मुझसे केशव से बोला गुडाकेश
हे राजन फिर वह मौन हुआ कहने को कुछ भी नहीं शेष


दोनों सेना के मध्य खडे अर्जुन को देख शोकमगन
हे भारत! कह हँसकर केशव अर्जुन से बोले मधुर वचन


भगवान बोले


मत कर अशोच्य पर शोक बुद्धिवादी सा भाषण करता है
जीवित हो अथवा मृतक कोई पर ज्ञानी शोक न करता है


ऐसा भी नहीं कि हम या तुम इसके पहले थे कभी नहीं
अथवा हम तुम ये राजागण आगे होंगे अब कहीं नहीं


कौमार्य जरा तौवन तीनों से होकर जीव गुजरता है
पर मोह न करता धीर कोई जीता है अथवा मरता है


विषयेन्द्रिय जनित दुःख-सुख गर्मी शीतलता हैं नाशवान
जो जैसा हो उसको वैसा ही सह ले होकर धैर्यवान


जो विचलित नहीं दुःख-सुख से मध्यम पथ को अपनाता है
सुख दुख में सम वह धीर पुरुष निष्णात अमरपद पाता है


जो असत कहा जाता उसका अस्तित्व नहीं यह अभिमत है
सत ही सर्वत्र प्रतिष्ठित है यह तत्व ज्ञानियों का मत है


जिससे है व्याप्त सकल जग यह, वह शाश्वत अव्यय अक्षर है
उसका विनाश करने में सक्षम नहीं कोई प्राणी नर है


ये सब शरीर हैं नाशवान इनकी चिन्ता मत व्यर्थ करो
आत्मा अविनाशी है भारत तुम युद्ध करो तुम युद्ध करो


जो इसे समझते हैं मारक अथवा जो मर्त्य मानते हैं
यह मरता है न मारता है वे दोनों नहीं जानते हैं


यह आत्मा जन्म नहीं लेता औ’ कभी नहीं यह मरता है
अज नित्य पुरातन शाश्वत है काया परिवर्तन करता है


है नित्य अजाक्षर अविनाशी आत्मा जो नर समझायेगा
वह कैसे किसको मारेगा अथवा किसको मरवायेगा


जैसे शरीर के वस्त्रों के फट जाने पर आत्मा को नया शरीर बदलना पडता है
वैसे शरीर बूढा जर्जर  हो जाने पर आत्मा को नया शरीर बदलना पडता है


इसका छेदन शस्त्रास्त्र नहीं कर पायेंगे पावक से इसका दहन नहीं हो सकता है
इसको शोषित करने में मारुत अक्षम है जल से भी इसका गलन नहीं हो सकता है


अच्छेद्यादाह्य अक्लेद्याशोष्याव्यय यह परम पुरातन है
यह आत्मा नित्य सर्वव्यापी है अविचल और सनातन है


अव्यक्त अचिन्त्य विकाररहित आलोकित मानस लोक करे
यह ज्ञात तुझे है भलीभाँति इसलिये व्यर्थ क्यों शोक करे


यदि इसको समझे सदा जन्मने वाला तू, अथवा यह नित्य मर्त्य एवं सविकारी है
है शोचनीय तो भी यह विषय कदापि नहीं, तू कभी नहीं इस चिंतन का अधिकारी है


जिस प्राणी ने भी जन्म लिया इस धरती पर, उस प्राणी का अन्तिम प्रस्थान विनिश्चित है
इस हेतु शोक शोभित करता है नहीं तुझे, जो अपरिहार्य जिसका भवितव्य सुनिश्चित है


अर्जुन अपने जन्मों से पहले हए प्राणी, दिखलाई पड्ता नहीं किसी को रहे गुप्त
केवल वह बीच समय में सबको दिखता है, फिर व्यर्थ शोक क्यों मरकर होते सभी लुप्त


कोई कोई तो साश्चर्य देखे इसको, आश्चर्य सहित कोई इसका आख्यान करे
कोई कौतूहल से सुनता इस बारे में, कोई सुनकर भी निज मन में अज्ञान धरे


यह नित्य अवध्य आत्मा हर प्राणी शरीर में संस्थित है
इसलिये प्राणियों की खतिर यह शोक सर्वथा अनुचित है


निज श्रेयस कर्मों का चिन्तन कर भय का कोई कर्म नहीं
कर्तव्यमार्ग संघर्ष सदृश क्षत्रिय का कोई धर्म नहीं


इस स्वतः अनावृत स्वर्ग द्वर में वे प्रवेश कर पाते हैं
जो क्षत्रिय होते भग्यवान औ’ धर्मयुद्ध पर जाते हैं


इस धर्मयुद्ध से विरत हुआ तो हतभागी कहलायेगा
निज धर्म कीर्ति का वध करके दारुण पापी कहलायेगा


जो लोक करेगा अयश गान वह तेरे लिये अहितकर है
अपकीर्ति माननीयों की मरने से भी अधिक कष्टकर है


ये महारथी देखेंगे तेरा मान सुयश अवनत होगा
ये मानेंगे भय के कारण इस रण से तू उपरत होगा


तेरे वैरीगण के द्वारा अस्तुति तम तोम घिरा होगा
सामर्थ्य हीनता की निंदा से अधिक और दुख क्या होगा


मृत्योपरि स्वर्ग प्राप्ति होगी भूभोग करेगा होगी जय
इसलिये खडा हो पार्थवीर हो धर्मयुद्ध कर दृढ निश्चय


सुख लाभ विजय में चित्त रहे समभाव स्थित, दुःख हानि पराजय में कर पश्चात्ताप नहीं
इसलिये युद्ध करने को अब हो जा तत्पर, इसमें निश्चित ही लगता कोई पाप नहीं


यह ज्ञान योग का सार तुझे है बतलाया अब कर्मयोग का मर्म तुझे बतलायेंगे
जिस बुद्धियुक्त नर को कर्मों के ये बंधन निज संजालों में बिलकुल बाँध न पायेंगे


होता है नष्ट न कर्मयोग का बीज कभी किंचित सदोष प्रतिफल भी प्राप्त नहीं होता
जो पालन करता कर्मयोग का धर्म सदा उसमें उत्क्रांति पाश भय व्याप्त नहीं होता


इस कर्मयोग की दिशा सदा निश्चय मति देने वाली है
स्थिर सकाम पुरुषों की मति विविक्त गति देने वाली है


जो वेद वाक्य में निहित कर्मफल के साधक जो वेदों में तन्मय हो प्रीति बढाते हैं
सुख स्वर्ग प्राप्ति ही होता जिनका ध्येय परम वे ही ऐसे थोथे वैभव गुण गाते हैं


ये सारी विधियाँ जन्म मृत्यु की कारक हैं इन सबकी अपनी कुछ निश्चित सीमायें हैं
ऐश्वर्य भोग सुख प्राप्त कराने वाली ये नाना प्रकार की वर्ण्त कथित क्रियायें हैं


ऐश्वर्य भोग में अतिशय रत जन को सद्बुद्धि नहीं होती 
उन पुरुषों में परमेश्वर के प्रति स्थिर बुद्धि नहीं होती


वेदों में त्रिगुण कर्मफल का प्रतिपादन है तू निरासक्त निर्द्वन्द्व नित्यसत्वस्थ रहे
निर्योग क्षेम ही एकनिष्ठ हो ध्येय तेरा अविकल अविचल अविरल अतरल आत्मस्थ रहे


छोटे जलाशयों से ज्यों होता मोहभंग जब कोई प्राणी महाजलधि पा जाता है
वेदों से उतना मात्र प्रयोजन ब्राह्मण का जिसको भी तत्वज्ञान प्राप्त हो जाता है


कर्मों में हो आचरण और अधिकार तेरा परिणामों में तेरी प्रवृत्ति रुचि पृक्ति न हो
तू किसी तरह से कर्मफलों का हेतु न बन तेरी किंचित अकर्म में भी आसक्ति न हो


जो सिद्धि असिद्धि सभी में सम होकर रहता योगस्थ वही है संगमुक्त कहलाता है
तू कर समत्व भावों से सारे कर्मों को ऐसा ही मानव योगयुक्त कहलाता है


है श्रेष्ठ सदा ही बुद्धियोग समभवपूर्ण दीनता सकाम कर्म की ही परिभाषा है
वे प्राणी दारुण दीन हीन कहलाते हैं जिनके मन में फल पाने की अभिलाषा है


जो पुरुष समत्वबुद्धि का जग में स्वामी है वह पाप पुण्य दुष्कर बंधन से मुक्त रहे
तेरे सब कर्मों के बंधन कट जायेंगे यदि तू ऐसे समभाव योग से युक्त रहे


कर्मों के फल का लोभ न ज्ञानी करते हैं जन्मों के बंधन उनको बाँध न पाते हैं
धारण कर योग समत्व बुद्धि का जीवन में वे अमर अनामय परमधाम पा जाते हैं


समबुद्धियोग से मोहपाश जब कटता है जब तनिक न मन में उपजे सुख दुख खेदभाव
परलोक लोक के भोग न विचलित करते हों नर को होता है प्राप्त तभी निर्वेद भाव


नाना भ्रामक वचनों से विचलित तेरी मति ईश्वर में अचल और स्थिर हो जायेगी
तब चिर संयोग तेरा होगा परमात्मा से वह स्थिति तेरी योगस्थिति कहलायेगी


अर्जुन बोले


जो स्थितप्रज्ञ हुआ उसके क्या लक्षण हैं जो समाधिस्थ हैं उनके बारे में कहना
स्थिरमतियुक्त जनों की परिभषा करिये, उनकी भाषा उनका रहना उनका चलना


भगवान बोले


मानव अपने मन की समस्त अभिलाषा का जब पूर्ण त्याग कर आत्मतुष्ट हो जाता है
आत्मा से अपनी आत्मा में संतुष्ट हुआ, उस कालावधि में स्थितप्रज्ञ कहाता है


उद्विग्न नहीं होता है जो अपने दुख में, सुख के बी प्रति स्पृहामुक्त हो जाता है
भय राग क्रोध जिसको संत्रास नहीं देते, ऐसा ही मानव स्थितप्रज्ञ कहाता है


सर्वत्र सदा जो वीतनेह आचरण करे, शुभ अशुभ प्राप्ति में खुशी द्वेष का भाव नहीं
वह मानव स्थिरमति कहलाता है जिसके, मन पर हो उद्वेगों का कोई प्रभाव नहीं


कछुए सम वश में कर ले अंगों को उसको, इन्द्रियनिग्रह की सिद्धि प्राप्त हो जाती है
इन्द्रियाँ हटाने में समर्थ जो विषयों से, उस नर को स्थिर्बुद्धि प्राप्त हो जाती है


विषयोपभोग निग्रह से होती है निवृत्ति, पर उन विषयों के प्रति जाती आसक्ति नहीं
परमात्मा का साक्षात्कार जब होता है, उस नर के मन में फिर रहती आसक्ति नहीं


अर्जुन जब तक मन से आसक्ति नहीं जाती, इन्द्रियाँ सर्वथा दीनहीन कर देती हैं
ये हैं झंझावाती प्रमथन स्वभाववाली, मानव मन के संकल्पों को हर लेती हैं


जो विषयमुक्त संयमयुत ईशपरायण हो, जो दत्तचित्त हो मुझमें ध्यान लगाता है
होती हैं जिसके वशीभूत इन्द्रियाँ सभी, ऐसा ही मानव स्थिर्बुद्धि कहाता है


हर क्षण विषयों का चिंतन करते रहने से, विषयों के प्रति आसक्ति भावना आती है
आसक्ति जहाँ है वहीं कामना होती है, कामना सर्वथा क्रोधानल उपजाती है


उत्पन्न क्रोध करता स्मृतिभ्रम मूढभाव, स्मृतिविभ्रम से बुद्धिनाश हो जाता है
जिस मानव की हो जाती है सद्बुद्धि नष्ट, उस मानव का निश्चित विनाश हो जाता है


जिसका हो अन्तःकरण पूर्ण अपने वश में, हो अनासक्त विषयों में विचरण करता है
इन्द्रियाँ परे हों राग द्वेष से सब जिसकी, अन्तःप्रसन्नता का वह अनुभव करता है


अन्तस्थल में जिसके जिसके प्रसन्नता छाती है, उसके क्लेशों की गति विरमित हो जाती है
ऐसे प्रसन्नचित कर्मयोगियों की गति मति, ईश्वर में भलीभाँति स्थित हो जाती है


जब अन्तःकरण नहीं होता है निजाधीन, तब निश्चयात्मक बुद्धिहीनता आती है
भावनाहीन नर का मन होता शान्तिरहित, फिर कभी उसे सुख शान्ति नहीं मिल पाती है


ज्यों वातु दुबो देती है जल में नावों को, वासना इन्द्रियों को अधीन कर लेती हैं
बस वही एक इन्द्रिय जिसके संग होता मन, ऐसे अयुक्त नर की प्रज्ञा हर लेती हैं


इसलिये ध्यान दो महाबाहु मम वचनों पर, जो विषयेन्द्रिय वासनाहीन कर लेता है
उस मानव की ही स्थिरबुद्धि कही जाती, जो सभी इन्द्रियों को अधीन कर लेता है


जो निशा बिताते संसारी जन सोने में, उसमें योगी जन सदा जागते रहते हैं
उस समय कि जब सारा संसार जागता है, है निशा समान उसे ज्ञानी मुनि कहते हैं


ज्यों नाना सरिताओं की बहती जलधारा, मिलने पर वारिधि किंचित क्लांत नहीं होता
वैसे योगी को भोग न विचलित करते हैं, पर कामकामियों का मन शान्त नहीं होता


जो मानव सभी कामना तज निस्पृह होकर, ममता विहीन हो जग में विचरण करता है
हो लेशमात्र भी अहंकार का भाव नहीं, वह मन में परम शान्ति को धारण करता है


हे अर्जुन यह ब्राह्मी स्थिति कहलाती है, जब मन का हो जाता है सारा मोह भंग
भोगों के प्रति हो अनासक्त ऐसा योगी, पाता है परमानंद हुआ जो मुक्तसंग     ॥


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