Thursday, 30 June 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - सातवाँ एवं आठवाँ अध्याय


सातवाँ अध्याय - ज्ञान विज्ञान योग
भगवान ने कहा

जब तू आसक्तमना अनन्यनिष्ठापूरित, हो मुझमें पूर्ण परायण स्थिति योगयुक्ति
मुझको समग्र संशयविहीन तू देख सके, मैं तुझे बताऊँगा उसकी सम्यक प्रयुक्ति


विज्ञान ज्ञान से पूर्ण युक्त वह तत्वज्ञान, बतलाऊँगा रखूँगा कुछ अवशेष नहीं
जिस तत्वज्ञान का आत्मसात कर लेने से, रहता जग में कुछ और जानना शेष नहीं


जो इस जग में रहते कोटि कोटि पुरुषों में से, कोई कोई मेरी प्राप्ति का यत्नबीज बोता है
उनमें से कुछ होते मेरे पूर्णपरायण हैं, ऐसे विरले योगी को मेरा दर्शन ह्प्ता है


वायु, व्योम, भू, जल, पावक, मन, बुद्धि, अहंता राजित है
इस प्रक्रम में आठ तरह से मेरी प्रकृति विभाजित है


जो उपर्युक्त है आठ भेद वाली निसर्ग, अपरा कहलाती मेरी प्रकृति अचेतन है
है अन्य कि जो धारण करती सम्पूर्ण जगत, हे अर्जुन मेरी परा प्रकृति वह चेतन है


होता इनसे उत्पन्न चराचर जीव जगत, सम्पूर्ण जगत का मैं ही कर्ता धर्ता हूँ
इस अग जग का मुझको ही रचनाकार समझ, प्रलयंकारी मैं ही जग का संहर्ता हूँ


स जग का एकमात्र हूँ मैं समूल कारण, यह सारा जग मेरे ही द्वारा विरचित है
मणिमाला में मणियाँ ज्यों गुथीं हुई  होतीं, वैसे सम्पूर्ण जगत मुझमें अवगुण्ठित है


अर्जुन मैं जल में रस, वेदों में प्रणव हूँ
रवि शशि में द्युति, नभ में शब्द, नर विभव हूँ


पृथ्वी में पवित्र गंध पावक में आतप हूँ
जीवों में जीवन हूँ, तपस्वियों में तप हूँ


प्राणियों में सनातन बीज, बुद्धि हूँ मनस्वी में
ऐसा जान मुझे पार्थ, तेज हूँ तपस्वी में


काम राग से परे, शक्तिमानों में मैं ही बल हूँ
अर्जुन मैं धर्मानुकूल, प्राणी में कामानल हूँ


सात्विक, राजस, तामस भावों का मैं ही हूँ कारण
कभी न मैं उनमें, अथवा मैं करता उनको धारण


सात्विक, राजस, तामस गुण से परिपूर्ण जगत, का हर प्राणी मोहित रहता, मतिमान नहीं
जो मुझको इन तीनों से परे नहीं समझे, उसको मेरे अव्यय स्वरूप का ज्ञान नहीं


यह अति दुस्तर है मेरी त्रिगुणमयी माया, इसका जो प्राणी उल्लंघन कर जाते हैं
जो केवल मुझे निरंतर भजते रहते हैं, वे नर दुर्गम भवसागर से तर जाते हैं


जिनका माया के द्वारा अपहृत ज्ञान हुआ, वे मूढ दुष्ट आसुरी स्वभाव नहीं तजते
ऐसे दूषित कर्मों को करने वाले नर, मुझ अव्यय परमात्मा को कभी नहीं भजते


हे सत्कर्मी अर्जुन ! प्रायः जगतीतल में, सारे मनुष्यगण मुझे चतुर्था भजते हैं
जिज्ञासु, आर्त, अर्थाकांक्षी, अथवा ज्ञानी, अपनी वृत्यानुरूप ही मुझको भजते हैं


जिस मानव की मुझमें हो एकनिष्ठ श्रद्धा, वह ज्ञानी भक्त मुझे लगता है परम श्रेष्ठ
उस तत्ववेत्ता को मैं होता अतिशय प्रिय, वह भक्त मुझे उतना ही होता प्रिय यथेष्ट


ये सारे मेरे भक्त उदारमना होते, पर ज्ञानी को मेरा साक्षात स्वरूप समझ
जो मुझमें सम्यक स्थिर है, मेरा मत है, मद्गतज्ञानी को ही उत्तम गतिरूप समझ


जन्मों की अन्तिमता पर हो सद्ज्ञान प्राप्त, दुर्लभ होता ऐसा महत्मा आप्त पुरुष
’सब कुछ है वासुदेव’ ऐसा जो भजता है, है भक्त मेरा वह, तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष


जिनका अपहृत है ज्ञान विषय के चिंतन से, वे कामपुरुष ही भोग कामना करते हैं
अपने स्वभाव से प्रेरित विहित नियम द्वारा, अन्यान्य देवताअओं की पूजा करते हैं


जो जो होकरके श्रद्धायुक्त सकाम पुरुष, इच्छा करता, जिन जिन देवों का पूजार्चन
मैं उन सकाम भक्तों की मन की श्रद्धा का, उन देवों में कर देता स्थिर स्थापन


जो श्रद्धायुक्त सकाम पुरुष जिन देवों का, कामना हेतु आराधन पूजन करते हैं
मेरे ही द्वारा विहित देवताओं द्वारा, वे उन इच्छित भोगों का सेवन करते हैं


इन अल्पबुद्धि पुरुषों का फल है नाशवान, देवार्चक देवों को ही प्राप्त हुआ करते
कोई भी हों जो केवल मुझको भजते हैं, वे भक्त मेरे मुझको ही प्राप्त हुआ करते


जो बुद्धिहीन अथवा अज्ञानी होते हैं, उनको अविदित, मेरा अविनाशी परम भाव
मानव समान ही मुझमें उनको दिखता है, इन्द्रिय विकार, विषयों से पूरित व्यक्तिभाव


रहता प्रच्छन्न योगमाया से मैं निज की, इसलिए सभी को मैं प्रत्यक्ष नहीं होता
जानता नहीं मुझ अविनाशी परमेश्वर को, जग में वह नर जो दर्शनदक्ष नहीं होता


हे अर्जुन मैं तीनों कालों का दृष्टा हूँ, हैं ज्ञात सभी प्राणी मुझको, हों कोई भी
जितने हैं मानव जग में श्रद्धा भक्ति रहित, जानता नहीं उनमें से मुझको कोई भी


हे अर्जुन इस जग में जितने भी प्राणी हैं, वे इच्छा द्वेष आदि द्वन्द्वों से मोहित हैं
अनुभूति उन्हें सुख दुख है विचलित करती, इसलिए पूर्ण अज्ञान तमस से पोहित हैं


निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्म करने वाले, जो राग द्वेष से जनित मोह को तजते हैं
दृढ निश्चय करके मन से पापमुक्त होकर, वे भक्त मुझे ही सब प्रकार से भजते हैं


मेरा आश्रय ले जरा मरण के बंधन को, काटने हेतु मन में जो पुरुष ठानते हैं
अध्यात्म, ब्रह्म अथवा सम्पूर्ण कर्म क्या है, इसको वे ही नर भली प्रकार जानते हैं


अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ सहित, मैं आत्मरूप सबका, जो पुरुष जानते हैं
जिसको देहावसान पर भी यह ज्ञात हुआ,वे युक्तचित्त वाले ही मुझे जानते हैं


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आठवाँ अध्याय - अक्षर ब्रह्म योग
अर्जुन बोले


हे पुरुषोत्तम मुझे बताओ कर्म किसे कहते हैं, क्या है यह अध्यात्म और फिर ब्रह्म किसे कहते हैं
कहते हैं अधिभूत किसे, यह भी मुझको बतलाओ, बतलाओ विस्तार सहित, अधिदैव किसे कहते हैं


इस शरीर में कैसे और कहाँ रहता है, मधुसूदन ! अधियज्ञ कौन है? मुझे बताओ
युक्तचित्त वाले पुरुषों को अंत समय में, ज्ञेय आप कैसे उनको, यह भी समझाओ


भगवान बोले
ब्रह्म परम अक्षर होता, उसके स्वरूप को, जीवात्मा अथवा अध्यात्म कहा जाता है
भूतभाव के उद्भवकारी त्याग मात्र का, कर्म नाम से ही संज्ञान लिया जाता है


नाशवान सारे पदार्थ अधिभूत कहाते, सूक्ष्मशरीर आत्मा को अधिदैव समझना
श्रेष्ठ देहधारी अर्जुन ! मुझ वासुदेव को, यहाँ मात्र तुम एकमेव अधियज्ञ समझना


मेरा ही स्मरण कर रहा जो प्राणी, अन्तकाल में जब शरीर का त्याग करे
किसी तरह का इसमें संशय नहीं कोई, वह मानव मेरे स्वरूप को प्राप्त करे


अन्तकाल पर काया त्याग समय पर मानव, युक्त हुआ रहता है जिस धारणा भाव से
हे कौन्तेय ! प्राप्त होता वह उसी भाव को, क्योंकि वह भावित रहता है उसी भाव से


इसलिए पार्थ कर युद्ध, और मेरा चिंतन, मेरा स्वरूप यदि मन में पूर्ण व्याप्त होगा
मन बुद्धि सहित सारे कर्मों के अर्पन से, तू पूर्णरूप, निश्चय ही मुझे प्राप्त होगा


अभ्यास योग से युक्त चित्त हो करके जो, उस परमपुरुष का चिंतन करता जाता है
हे पार्थ ! अविचलित, ध्यानयुक्त, एकाग्रमना, होकर वह नर परमेश्वर को पा जाता है


सर्वत्र, अनादि, नियंता, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सबका धाता चिन्तनातीत अज्ञान परे
वह सूर्य समान नित्यचेतन आलोकरूप, जो उस सच्चिदानन्दघन का स्मरण करे


वह भक्तियुक्त नर अन्तकाल के आने पर, कर योगशक्ति से भृकुटि मध्य निज प्राणस्थित
निश्चल मन से ईश्वर का ध्यान स्मरण कर, हो जाता दिव्य पुरुष परमात्मा में स्थित


जिसको पाने को ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य चुनें, वेदों के ज्ञाता जिसको कहते अविनाशी
उस परमधाम का मैं रहस्य बतलाऊँगा, जिसमें जाते हैं वीतराग के संयासी


जो इन्द्रिय के सब द्वारों को संयमित करे, मन और हृदय संवेगों को निरुद्ध करके
ईश्वर की योगधारणा में होकर स्थित, मस्तक में प्राण रोककर मन विशुद्ध करके


जो मानव अन्तकाल में कायात्याग समय, भजता है अक्षरब्रह्म रूप ऊँकार नाम
मैं जिसका अर्थरूप हूँ निर्गुण पारब्रह्म, चिंतन करनेवाला पा जाता परमधाम


जो एकनिष्ठ होकर करता स्मरण मेरा, जो सतत नित्यशः मुझमें ध्यान लगाता है
उस योगी को ही मैं होता हूँ सहज सुलभ, वह योगी मुझ पुरुषोत्तम को पा जाता है


जो परमसिद्धि को प्राप्त हुए है ज्ञानीजन, सम्पूर्णरूप से हो जाते मुझमें नियुक्त
जो है क्षयिष्णु दुख का आगार कहाता है, उस पुनर्जन्म से हो जाते वे पूर्णमुक्त 


हैं ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती, अर्जुन, हैं सब सब अनित्य, कालावधि सीमित हैं
मेरे भक्तों का पुनरागमन नहीं होता, मैं कालातीत मेरी शक्तियाँ असीमित हैं


है एक सहस्र चतुर्युग सम ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की एक रात्रि भी उतनी ही लम्बी
वे योगी कालतत्ववेत्ता कहलाते हैं, जो हैं इन तथ्यों के अनुकारी अवलम्बी


ब्रह्मा के दिन का जब होता आरंभकाल, सम्पूर्ण चराचर भूत उत्पन्न हुआ करते
ब्रह्मा की रात्रि आगमन पर सारे प्राणी, उनके तन में विलीन प्रच्छन्न हुआ करते


हे पार्थ समस्त भूत प्राणी समुदाय यहाँ, पैदा होकर हो जाते पूर्ण प्रकृति अधीन
दिन के प्रवेश पर होते हैं उत्पन्न सभी, पर रात्रि काल में होते ब्रह्मा में विलीन


जिसको अव्यक्त कहा जाता है उससे भी, अत्यन्त परे अव्यक्तभाव होता अनन्त
सारे भूतों के भी विनष्ट हो जाने पर, उस परम दिव्य सत्ता का होता नहीं अन्त


अव्यक्तभाव को कहा परमगति जाता है, वह अव्यक्त अक्षर ही होता है नाम मेरा
जिसको पाने पर पुनरागमन नहीं होता, अव्यक्तभाव का वही सनातन धाम मेरा


जिस परमात्मा के अन्तर्गत हैं सब प्राणी, जिसकी सत्ता से है यह सारा जगत व्याप्त
बस एक अनन्यभक्ति ही ऐसा साधन है, जिससे होता अव्यक्त सनातन पुरुष प्राप्त


उस कालखण्ड का बोध करो अर्जुन योगी, जब देह त्याग कर वापस कभी न आते हैं
उसको भी मैं विस्तार सहित समझाऊँगा, जब मरने पर वे पुनर्जन्म पा जाते हैं


ज्योतिर्मय पावक जिस पथ का अभिमानी देव कहाता है
जिस दिन, जिस शुक्लपक्ष, उत्तरायण पर अधिकार जमाता है
योगी जन ब्रह्मवेत्ता जिस पथ में निज देह त्याग करते
उन देवों के द्वारा उनको क्रमशः ले जाया जाता है


धूमक जिस रात्रि अश्वेतपक्ष दक्षिणायन पर छाया रहता है
अथवा जिस भ्रमणमार्ग का अभिमानी देवता कहाता है
उस पथ प्रस्थित सकाम मानव, चन्द्रमा ज्योति को प्राप्त करे
अपने शुभ कर्मों का फल पाकर फिर से वापस आता है


इस जग के शुक्ल कृष्ण रूपी दो भेद बताये जाते हैं
जो देवयान औ’ पितृयान के मार्ग सनातन कहलाते
जो देवयान में मरते हैं पाते हैं वही परमगति को
जो पितृयान में देहत्याग करते हैं, वे वापस आते


हे अर्जुन ! इन दोनों मार्गों के संज्ञानी, कोई भी योगी तनिक न भ्रम आभास करे
समबुद्धियोग से युक्त हुआ तू हे अर्जुन, इसलिए मुझे पाने का सतत प्रयास करे


वेदाध्ययन, दान, तप, यज्ञ का पुण्य, करता जो सबके फलों का उल्लंघन
इस तत्व को जानकर पूर्ण्योगी, है प्राप्त करता परमपद सनातन


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