Tuesday, 9 August 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - बारहवाँ अध्याय -भक्ति योग

GITAMRITAM गीताऽमृतम - बारहवाँ अध्याय 
भक्ति योग


अर्जुन बोले


कुछ भक्त सतत भजते प्रभु का साकार रूप, कुछ निराकार सच्चिदानन्द का करें ध्यान
ऐसे हैं जग में दो प्रकार के योगवान, उन दोनों में से कौन अधिक होता महान ?


भगवान बोले


जो श्रद्धा से मुझ सगुण रूप परमेश्वर के, एकाग्रचित्त हो भजन ध्यान में लगते हैं
होते हैं वही मान्य उत्तम योगी मुझको, वे योगयुक्त मुझको अतिशय प्रिय लगते हैं


सर्वत्रव्याप्त, अक्षर, अचिन्त्य का रूप सदा, अपने अनस्तल में दृढ धारण करते हैं
कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अनिर्देश्य, अव्यक्त नाम, होकर ध्यावस्थित उच्चारण करते हैं


सारे इन्द्रिय संस्थानों को वश में करके, सर्वत्र समत्वबुद्धि अन्तर्गत रहते हैं
वे मानव मुझको ही होते हैं प्राप्त सदा, जो सब विधि भूतों के हित में रत रहते हैं


जो निराकार में रखते हैं आसक्ति भक्ति, उन पुरुषों के साधन में अधिक परिश्रम है
देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त विषय, की गति अत्यधिक कठिन दुखपूर्ण अधिकतम है


पर मेरे परम परायण मेरे आराधक, अपने कर्मों को मुझमें अर्पण करते हैं
जो एक अनन्य भक्ति से मुझ परमेश्वर का, निशिदिन मन में आराधन चिन्तन करते हैं


सम्पूर्ण चेतना इन्द्रिय मन निवेश करके, मुझमें जो रच बस जाता मेरा आराधक
इस मृत्यु रूप भवसागर से निश्चित उसका, हे अर्जुन ! शीघ्र स्वयं मैं बनता उद्धारक


तेरे द्वारा मन और बुद्धि का यदि मुझमें निवेश होगा
तो निश्चय ही मुझमें तेरी स्थिति तेरा प्रवेश होगा


यदि लगे न मन मुझमें तेरा, तो अर्जुन बस इतना ही कर
अभ्यास योग से युक्त हुआ मुझको पाने की इच्छा कर


अभ्यास योग भी दुष्कर हो, कर्मों को कर अर्पण मुझको
मेरे निमित्त कर्मों का अर्पण सिद्धि दिलायेगा तुझको


यदि मेरी प्राप्ति योग का अश्रय भी है नहीं तेरे वश में
कर्मों के फल का त्याग करे, करके मन बुद्धि पूर्ण वश में


मर्महीन अभ्यास कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञानयोग से परमेश्वर का ध्यान श्रेष्ठ है
त्याग सदा मानव को परम शान्ति देता है, ध्यानस्थिति से कर्मपाक परिदान श्रेष्ठ है


भूतों के प्रति करुण, मित्रवत, द्वेषरहित, अहंकार ममता विहीन हो दयावान
ऐसा ही योगी मुझको प्रिय लगता है, सुख दुख में समभाव युक्त हो क्षमावान


जो योगी मन में सदैव संतुष्ट रहे, जिसकी आत्मा में दृढनिश्चय होता है
मुझमें पूर्ण समर्पित जो मन बुद्धि सहित, ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है


जिसको किसी जीव से हो उद्वेग नहीं, जिससे जीवों को उद्वेग न होता है
हर्ष, क्षोभ, भय उद्वेगों से मुक्त हुआ, वह भी मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है


पक्षपात से मुक्त, निपुण, हो व्यथाहीन, जो अनपेक्ष और शुचिता मय होता है
सब प्रकार के आरम्भों का परित्यागी, ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है


जिसके मन में होता है हर्ष न शोक कभी, कांक्षाविहीन विद्वेषरहित जो होता है
शुभ और अशुभ कर्मों का परित्यागी होता, ऐसा ही भक्तिमान मुझको प्रिय होता है


जो शत्रु मित्र के प्रति समदर्शी होता है, मानापमान में स्थित है समबुद्धि सहित
सर्दी गर्मी सुख दुख में जो समान रहता, जो मानव होता अभिलाषा आसक्ति रहित


जो रहता तुल्य प्रशंसा निन्दा में सदैव, जिस तिस प्रकार संतुष्ट मौनव्रत होता है
अपने निवासस्थल के प्रति आसक्ति रहित, वह स्थिरबुद्धि भक्त मुझको प्रिय होता है


मेरे द्वारा यथोक्त धर्म्यामृत वचनों के, सेवन उपासना में जो सक्रिय होते हैं
मुझमें केवल जिन भक्तों की श्रद्धा होती, वे भक्त मेरे मुझको अतिशय प्रिय होते हैं ||


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