GITAMRITAM गीताऽमृतम
अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन्यास योग
अर्जुन बोले
हे महाबाहु ! हे हृषीकेश कुछ और जानना चाहूँगा
मैं पृथक पृथक सन्यास त्याग का तत्व जानना चाहूँगा
भगवान बोले
कुछ पण्डितजन कामना पूर्ण सब कर्मों के, सम्पूर्ण त्याग को ही सन्यास समझते हैं
सारे कर्मों के फल का त्याग त्याग होता, कुछ हैं वैचारिक जन जो ऐसा कहते हैं
सब कर्म त्याज्य हैं कुछ विद्वानों का अभिमत, जितने भी होते कर्म सभी हैं दोषयुक्त
कुछ अन्य मनीषी भी हैं जिनका यह मत है, तप, दान, यज्ञ हैं नहीं त्याज्य, हैं दोषमुक्त
नरश्रेष्ठ पार्थ ! सन्यास त्याग दोनों में से, किसको कहते हैं त्याग प्रथम बतलाऊँगा
यह होता सात्विक राजस तामस गुण वाला, जो मेरा निश्चय मत है वह समझाऊँगा
मानव के आवश्यक एवं निश्चित कर्तव्यों में से हैं
ये यज्ञ दान तप रूप कर्म हैं नहीं कभी त्यागने योग्य
इनका स्वरूप से त्याग सदा पुरुषों के लिए अवांछित है
ये बुद्धिमान पुरुषों को करते हैं सदैव पावन सुयोग्य
चाहिए दान तप यज्ञ कर्म करना नर को कर्तव्य समझ
निष्काम सभी कर्मों को भी यह मेरा है मन्तव्य समझ
जो हैं निषिद्ध कामनापूर्ण उनका स्वरूप से त्याग उचित
पर नियत कर्म का नहीं कभी उनके स्वरूप से त्याग उचित
जो मोह और भ्रम के कारण कर्तव्यों का परित्याग करें
वह तामस त्याग कहा जाता वह त्याग सदा होता अनुचित
इस जग मे लोगों के द्वारा जितने भी कर्म किए जाते
सब दुख के कारक होते हैं कुछ मानव यही समझते हैं
शारीरिक कष्टों के भय से कर्तव्य त्याग होता निष्फल
इस आशय से जो होता उसको त्याग राजसी कहते हैं
अर्जुन ! शास्त्रोक्त कर्म करना ही कहलाता है तत्वयुक्त
फल की इच्छा का त्याग सदा ही जाना जाता सत्वयुक्त
करता है द्वेष नहीं जो अकुशल कर्मों से, हो नहीं कुशल कर्मों के प्रति भी अनुरागी
वह शुद्ध सत्वगुण युक्त पुरुष संशयविहीन, होता प्रबुद्ध है कहलाता सच्चा त्यागी
होता है शक्य नहीं कर्मों का पूर्ण त्याग, उसके भी द्वारा जो नर त्यागी होता है
इसलिए कर्म के फल का जो परित्याग करे, सच्चे अर्थों में वह नर त्यागी होता है
जब कर्मों के फल का परित्याग नहीं होता, होता है अच्छा बुरा तथा मिश्रित सा फल
कर्मों का फल तजने वालों को मृत्योपरि, मिलता है कभी भी नहीं उन कर्मों का फल
हे महाबाहु ! सारे कर्मों की सिद्धि हेतु, बतलाये जाते पाँच तरह के हैं कारण
जिसका है विशद निरूपण सांख्यशास्त्र में भी, मुझसे सुनकर उसको तू कर मन में धारण
सारे कर्मों की सिद्धि प्राप्ति में होते अधिष्ठान कर्ता
है अन्य करण जो कहलाता जिसकी विभिन्न मुद्राएं हैं
है अन्य हेतु जो दैव कहाता कार्यसिद्धि में कारक बन
पाँचवाँ हेतु है पुरुषों की जो भिन्न भिन्न चेष्टायें हैं
मन वाणी काया से नर जिन कर्मों को करते धारण हैं
शास्त्रानुकूल अथवा विरुद्ध ये पाँचों उनके कारण हैं
कर्मों में आत्मा सदा अकर्ता है जिसको यह पता नहीं
उस मलिन बुद्धि वाले नर को कुछ भी यथार्थ का पता नहीं
सांसारिक भोगों कर्मों में जो लिप्त नहीं, मैं कर्ता हूँ मन में यह भाव न आता है
सारे लोकों की हत्या करके भी वह नर, है पापमुक्त हत्यारा नहीं कहाता है
तीन तरह की कर्म प्रेरणा ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता हैं
तीन तरह कर्मों का संग्रह क्रिया कर्म कर्ता हैं
कर्ता ज्ञान कर्म तीनों के होते तीन तरह के गुण
गुण संख्यानक शास्त्रों में जो, मुझसे उन्हें यथावत सुन
जिस ज्ञानाश्रय से नर अविनाशी ईश्वर को, समभाव रूप अविभाजित हो स्थित जाने
वह भाव सदा कहलाता है परमात्मभाव, उस ज्ञानतत्व को तू सदैव सात्विक जाने
जो माने पृथक पृथक रूपों में भावों में, सारे भूतों में स्थित है भगवान वही
जो नहीं देखता ईश्वर को समभावपूर्ण, राजसी भाव का कहलाता है ज्ञान वही
जो मुक्ति रहित, सम्पूर्ण सदृश, नर काया में आसक्त हुआ
वह अल्प अतात्विक ज्ञान सदा तामसी भाव में व्यक्त हुआ
जो शास्त्र विहित हो कर्तापन अभिमान रहित, अफलाकांक्षी नर द्वारा कर्म किया जाता
होता है जहाँ न रागद्वेष का समावेश, उन कर्मों को ही सात्विक कर्म कहा जाता
जिसका निष्पादन होता अधिक परिश्रम से, जो अहंकारियों द्वारा कर्म किया जाता
जिनमें होती है भोगों की कामना प्रबल, उन कर्मों को ही राजस कर्म कहा जाता
फल हानि और हिंसा का जिसमें बोध न हो, जिसमें निज बल पौरुष का होता नहीं ध्यान
अज्ञानपूर्वक होता जिसका समारम्भ, उन कर्मों को ही तू केवल तामसी जान
हो कार्यसिद्धि अथवा असिद्धि दोनों में ही, जो खुशी शोक द्वन्द्वों में सम हो जाता है
उत्साह धैर्ययुत अनहंवादी मुक्तसंग, कर्ता ही सात्विक गुण वाला कहलाता है
रागी हो, कर्मफलाकांक्षी, लोभी, अशुद्ध, जो सर्वकष्टकारी हिंसा स्वभाव वाला
जो हर्ष शोक में डूबा उतराया करता, ऐसा कर्ता होता राजसी भाव वाला
जो है अयुक्त, अज्ञानी, शिक्षा से विहीन, जो होता परजीविका नाश करने वाला
दम्भी, आलसी, दीर्घसूत्री हो शोकयुक्त, तामसी कहा जाता है धूर्तवृत्ति वाला
गुण के अनुसार बुद्धि धृति के भी तीन भेद बतलाता हूँ
अर्जुन ! विभागशः मुझसे सुन, तुझको सम्यक समझाता हूँ
जो बुद्धि प्रवृत्ति निवृत्ति तथा कर्तव्य साथ में अकर्तव्य
भय अभय अनेक विकारों का जो सम्यक ज्ञान कराती है
जो मोक्ष और बंधन का करने में सक्षम तात्विक निर्णय
हे पार्थ ! पुरुष की वही बुद्धि सात्विकी बुद्धि कहलाती है
जब धर्म अधर्म अकार्य कार्य का ज्ञान नहीं हो पाता है
ऐसा मानव राजसी बुद्धि वाला मानव कहलाता है
समझे अधर्म को धर्म अशौच पुनीत दिखाई देता है
अर्जुन ! तामसी बुद्धि को सब विपरीत दिखाई देता है
मन प्राण इन्द्रियों की जिस नर में अटल धारणा होती है
उस ध्यान योग में रत नर की सात्विकी धारणा होती है
जब कोई नर आसक्ति सहित धारण करता धर्मार्थ काम
हे पृथा पुत्र अर्जुन जानो, उस धृति का है राजसी नाम
निद्रा भय चिन्ता दुख मद को जो मानव नहीं छोडता है
तामस धृति से दुर्बुद्ध पुरुष वह निज सम्बन्ध जोडता है
जो भजन ध्यान सेवा से सुख के अनुभव का अभ्यसन करे
हे पार्थ ! त्रिविध सुख प्राप्त करे वह सब दुखों का हनन करे
आरम्भ काल में यद्यपि वह विष सम लगता है दुखकारी
वह सात्विक सुख प्रसादमय होता है अमृतसम हितकारी
इन्द्रिय विषयों का संगम अमृत जैसा लगता सुखकर है
परिणाम रूप में वह राजस सुख विष सा बडा कष्टकर है
तामस सुख आदि अन्त दोनों में मोहन पैदा करता है
निद्रा आलस्य प्रमादजन्य सम्मोहन पैदा करता है
पृथ्वी आकाश देवता अथवा कोई ऐसा सत्व नहीं
हो विद्यमान जिनमें इन तीनों प्रकृति गुणों का तत्व नहीं
ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य शूद्र इनके स्वभावतः कर्म नियत
अर्जुन ! उनका स्वभावसंगत ही होता है गुणधर्म नियत
शम दम तप शौच क्षान्ति आर्जव सात्विक गुणधर्म कहा जाता
विज्ञान ज्ञान आस्तिक्य आदि ही ब्राह्मण कर्म कहा जाता
धृति शौर्य तेज दक्षता युद्ध में अडिग रहे हो दानभाव
स्वाभाविक क्षात्रकर्म हैं ये स्वामित्वभाव क्षत्रिय स्वभाव
कृषि गोरक्षा वाणिज्य आदि होता स्वभाव से वैश्यकर्म
सेवा हो जहाँ सर्वजन की है वह स्वभाव से शूद्रकर्म
अपने स्वाभाविक कर्मों से ही परमसिद्धि मिल पाती है
उस विधि को सुन जिससे मानव को सिद्धि प्राप्त हो जाती है
सारे भूतों का कर्ता जो जिससे है सारा जगत व्याप्त
निज निज कर्मों से प्रभु की पूजा से होती है सिद्धि प्राप्त
विधिवत व्यवहृत परकीय धर्म से विगुण स्वधर्म श्रेष्ठतर है
होता है नहीं पापभागी निज धर्म कर्म श्रेयस्कर है
अवगुण कर्मों को वैसा ही ढक कर रखते, जिस तरह धुँए से अग्नि सदा आच्छादित है
निज सहज कर्म यद्यपि सदोष हों हे अर्जुन, उनका स्वभाव से त्याग सर्वथा अनुचित है
स्पृहा और आसक्ति रहित मन जब निज वश हो जाता है
वह मानव सांख्ययोग द्वारा नैष्कर्म्य सिद्धि पा जाता है
जो ज्ञान योग की कहलाती उत्तम निष्ठा, नैष्कर्म्य सिद्धि जिस मानव को मिल जाती है
अर्जुन उसका तू सार समझ जिसके फलतः, उस परमब्रह्म की प्राप्ति उसे हो जाती है
निज बुद्धि शुद्धि कर जो नर नियमित सात्विक भोजन करता है
शब्दादि विषय तज राग द्वेष एकान्तिक सेवन करता है
सात्विक धृति द्वारा अन्तःकरण इन्द्रियों को वश में करके
जो अपने मन वाणी शरीर को वश में करने वाला है
निःशेष हो गये हों जिसके अन्तस्तल के सब राग द्वेष
जो भली भाँति वैराग्य अटल का आश्रय लेने वाला है
जिसमें परिग्रह का भाव नहीं है दम्भ रहित, जो अहंकार बल काम क्रोध का है त्यागी
ममताविहीन जिसका स्वभाव है शान्तियुक्त, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म प्राप्ति का है भागी
जो एकनिष्ठ हो ईश्वर में ध्यानावस्थित, कांक्षाविहीन वह पुरुष न होता शोकपूर्ण
वह प्रसन्नात्मा पाता मेरी परमभक्ति, जो हर प्राणी के प्रति होता समभाव पूर्ण
उस पराभक्ति के द्वारा मुझ परमात्मा का, मैं जो जितना हूँ उसे ज्ञान हो जाता है
उस भक्ति शक्ति से मेरा पूर्ण स्वरूप समझ, वह भक्त मेरा मुझमें प्रविष्ट हो जाता है
मेरे आश्रित जो कर्मवान कर्मों का निष्पादन करता
मेरे प्रसाद से परम सनातन पद का आस्वादन करता
समबुद्धि योग के आश्रय से कर्मों को मुझमें कर अर्पण
हो करके मेरे परायण मन से मुझमें पूर्ण समर्पण कर
कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें ध्यान लगायेगा
तू मेरी कृपादृष्टि से संकट का सागर तर जायेगा
यदि अहंकारवश तूने मेरे इन वचनों को सुना नहीं
अपने जीवन के लक्ष्यों से तू नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा
है अहंकार तेरा केवल इस युद्ध पलायन का कारण
यह युद्ध विरति मिथ्याचिंतन तुझको अभियोजित कर देगा
अपने क्षत्रिय स्वभाव से तू इस तरह कहाँ बच पायेगा
तेरा स्वभाव तुझको बलात संग्राम नियोजित कर देगा
जिन कर्मों के प्रति विरति हुई है पार्थ मोह के वश होकर
उन स्वाभाविक कर्मों को करना ही होगा परवश होकर
ईश्वर हृदयस्थल में स्थित हर प्राणिमात्र काया के
वह भ्रमण कराता उन्हें यंत्रवत बन्धन से माया के
हे भारत अब तू पूर्ण भाव से ईश्वर के आश्रय में चल
पायेगा शाश्वत परमधाम उसके प्रसाद से शान्ति अचल
यह ज्ञान तुझे जो बतलाया यह है अति गोपनीय दुस्तर
इस गुप्त ज्ञान पर चिन्तन कर फिर जैसा चाहे वैसा कर
अत्यन्त रहस्य पूर्ण उन बचनों को फिर से समझाऊँगा
तू अतिशय प्रिय है मुझे अतः हितकारी ज्ञान बताऊँगा
हे अर्जुन मुझमें चित्त लगा बन भक्त मेरा फिर पूजा कर
करके सर्वस्व समर्पण तन मन धन से कर मुझको प्रणाम
तू मुझे प्राप्त कर जायेगा इसमें कोई संदेह नहीं,
करता हूँ सत्य प्रतिज्ञा तू पायेगा मेरा परमधाम
सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा
कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा
गीता रूपी इन गुप्तज्ञान उपदेशों को, तप श्रद्धा भक्ति रहित लोगों से मत कहना
इच्छाविहीन जो रखता दोषदृष्टि मुझमें, ऐसे लोगों से इसे कदापि नहीं कहना
जो मेरे भक्तों को रहस्यमय गीता ज्ञान करायेगा
इसमें कोई संदेह नहीं वह मुझे प्राप्त हो जायेगा
उससे बढकर मेरा प्रिय जन अब तक न हुआ न कभी होगा
इस जग में उससे बढकर प्रिय कोई भी मुझे नहीं होगा
हम दोनों के संवादरूप गीता का जो अध्ययन करे
यह मेरा मत है ज्ञान यज्ञ से वह मेरा ही यजन करे
होकर सश्रद्ध अनुसूयदृष्टि जो भी गीता का श्रवण करे
वह मानव पापमुक्त होकर उत्तम लोकों में रमण करे
क्या पार्थ ! श्रवण कर गीता का मन में संकलन कर लिया है
हे अर्जुन ! क्या अज्ञानजनित भ्रम तम का दलन कर दिया है
अर्जुन बोले
हे अच्युत ! मात्र आप ही की अनुकम्पा है
हो गए मोह सारे विनष्ट सुस्मृति में हूँ
प्रभु की सारी आज्ञायें मुझको शिरोधार्य
अब पूर्णतया संशयविहीन स्थिति में हूँ
संजय बोले
कृष्णार्जुन के संवादों का राजन प्रभाव बललाते हैं
अद्भुत रहस्य को सुन करके रोंगटे खडे हो जाते हैं
श्री व्यास कृपा से दिव्य दृष्टि को पा करके, उन कृष्णार्जुन को देखा और सुना मैंने
अर्जुन के प्रति गीता का गुप्त ज्ञान कहते, योगेश्वर के मुख से साक्षात सुना मैंने
श्रीकृष्णार्जुन संवाद बडे कल्याणपरक अद्भुत अपार
हे राजन ! उन्हें सोच करके हर्षित होता हूँ बार बार
विस्मयकारी वह रूप देख श्री हरि का घोर चकित होता
राजन ! मन में चिंतन करके मैं बार बार हर्षित होता
हैं जहाँ विराजित योगेश्वर श्रीकृष्ण धनुर्धर पार्थ जहाँ
मेरी दृढमति है अटल नीति होती श्री विजय विभूति वहाँ
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम ।
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अट्ठारहवाँ अध्याय - मोक्ष सन्यास योग
अर्जुन बोले
हे महाबाहु ! हे हृषीकेश कुछ और जानना चाहूँगा
मैं पृथक पृथक सन्यास त्याग का तत्व जानना चाहूँगा
भगवान बोले
कुछ पण्डितजन कामना पूर्ण सब कर्मों के, सम्पूर्ण त्याग को ही सन्यास समझते हैं
सारे कर्मों के फल का त्याग त्याग होता, कुछ हैं वैचारिक जन जो ऐसा कहते हैं
सब कर्म त्याज्य हैं कुछ विद्वानों का अभिमत, जितने भी होते कर्म सभी हैं दोषयुक्त
कुछ अन्य मनीषी भी हैं जिनका यह मत है, तप, दान, यज्ञ हैं नहीं त्याज्य, हैं दोषमुक्त
नरश्रेष्ठ पार्थ ! सन्यास त्याग दोनों में से, किसको कहते हैं त्याग प्रथम बतलाऊँगा
यह होता सात्विक राजस तामस गुण वाला, जो मेरा निश्चय मत है वह समझाऊँगा
मानव के आवश्यक एवं निश्चित कर्तव्यों में से हैं
ये यज्ञ दान तप रूप कर्म हैं नहीं कभी त्यागने योग्य
इनका स्वरूप से त्याग सदा पुरुषों के लिए अवांछित है
ये बुद्धिमान पुरुषों को करते हैं सदैव पावन सुयोग्य
चाहिए दान तप यज्ञ कर्म करना नर को कर्तव्य समझ
निष्काम सभी कर्मों को भी यह मेरा है मन्तव्य समझ
जो हैं निषिद्ध कामनापूर्ण उनका स्वरूप से त्याग उचित
पर नियत कर्म का नहीं कभी उनके स्वरूप से त्याग उचित
जो मोह और भ्रम के कारण कर्तव्यों का परित्याग करें
वह तामस त्याग कहा जाता वह त्याग सदा होता अनुचित
इस जग मे लोगों के द्वारा जितने भी कर्म किए जाते
सब दुख के कारक होते हैं कुछ मानव यही समझते हैं
शारीरिक कष्टों के भय से कर्तव्य त्याग होता निष्फल
इस आशय से जो होता उसको त्याग राजसी कहते हैं
अर्जुन ! शास्त्रोक्त कर्म करना ही कहलाता है तत्वयुक्त
फल की इच्छा का त्याग सदा ही जाना जाता सत्वयुक्त
करता है द्वेष नहीं जो अकुशल कर्मों से, हो नहीं कुशल कर्मों के प्रति भी अनुरागी
वह शुद्ध सत्वगुण युक्त पुरुष संशयविहीन, होता प्रबुद्ध है कहलाता सच्चा त्यागी
होता है शक्य नहीं कर्मों का पूर्ण त्याग, उसके भी द्वारा जो नर त्यागी होता है
इसलिए कर्म के फल का जो परित्याग करे, सच्चे अर्थों में वह नर त्यागी होता है
जब कर्मों के फल का परित्याग नहीं होता, होता है अच्छा बुरा तथा मिश्रित सा फल
कर्मों का फल तजने वालों को मृत्योपरि, मिलता है कभी भी नहीं उन कर्मों का फल
हे महाबाहु ! सारे कर्मों की सिद्धि हेतु, बतलाये जाते पाँच तरह के हैं कारण
जिसका है विशद निरूपण सांख्यशास्त्र में भी, मुझसे सुनकर उसको तू कर मन में धारण
सारे कर्मों की सिद्धि प्राप्ति में होते अधिष्ठान कर्ता
है अन्य करण जो कहलाता जिसकी विभिन्न मुद्राएं हैं
है अन्य हेतु जो दैव कहाता कार्यसिद्धि में कारक बन
पाँचवाँ हेतु है पुरुषों की जो भिन्न भिन्न चेष्टायें हैं
मन वाणी काया से नर जिन कर्मों को करते धारण हैं
शास्त्रानुकूल अथवा विरुद्ध ये पाँचों उनके कारण हैं
कर्मों में आत्मा सदा अकर्ता है जिसको यह पता नहीं
उस मलिन बुद्धि वाले नर को कुछ भी यथार्थ का पता नहीं
सांसारिक भोगों कर्मों में जो लिप्त नहीं, मैं कर्ता हूँ मन में यह भाव न आता है
सारे लोकों की हत्या करके भी वह नर, है पापमुक्त हत्यारा नहीं कहाता है
तीन तरह की कर्म प्रेरणा ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता हैं
तीन तरह कर्मों का संग्रह क्रिया कर्म कर्ता हैं
कर्ता ज्ञान कर्म तीनों के होते तीन तरह के गुण
गुण संख्यानक शास्त्रों में जो, मुझसे उन्हें यथावत सुन
जिस ज्ञानाश्रय से नर अविनाशी ईश्वर को, समभाव रूप अविभाजित हो स्थित जाने
वह भाव सदा कहलाता है परमात्मभाव, उस ज्ञानतत्व को तू सदैव सात्विक जाने
जो माने पृथक पृथक रूपों में भावों में, सारे भूतों में स्थित है भगवान वही
जो नहीं देखता ईश्वर को समभावपूर्ण, राजसी भाव का कहलाता है ज्ञान वही
जो मुक्ति रहित, सम्पूर्ण सदृश, नर काया में आसक्त हुआ
वह अल्प अतात्विक ज्ञान सदा तामसी भाव में व्यक्त हुआ
जो शास्त्र विहित हो कर्तापन अभिमान रहित, अफलाकांक्षी नर द्वारा कर्म किया जाता
होता है जहाँ न रागद्वेष का समावेश, उन कर्मों को ही सात्विक कर्म कहा जाता
जिसका निष्पादन होता अधिक परिश्रम से, जो अहंकारियों द्वारा कर्म किया जाता
जिनमें होती है भोगों की कामना प्रबल, उन कर्मों को ही राजस कर्म कहा जाता
फल हानि और हिंसा का जिसमें बोध न हो, जिसमें निज बल पौरुष का होता नहीं ध्यान
अज्ञानपूर्वक होता जिसका समारम्भ, उन कर्मों को ही तू केवल तामसी जान
हो कार्यसिद्धि अथवा असिद्धि दोनों में ही, जो खुशी शोक द्वन्द्वों में सम हो जाता है
उत्साह धैर्ययुत अनहंवादी मुक्तसंग, कर्ता ही सात्विक गुण वाला कहलाता है
रागी हो, कर्मफलाकांक्षी, लोभी, अशुद्ध, जो सर्वकष्टकारी हिंसा स्वभाव वाला
जो हर्ष शोक में डूबा उतराया करता, ऐसा कर्ता होता राजसी भाव वाला
जो है अयुक्त, अज्ञानी, शिक्षा से विहीन, जो होता परजीविका नाश करने वाला
दम्भी, आलसी, दीर्घसूत्री हो शोकयुक्त, तामसी कहा जाता है धूर्तवृत्ति वाला
गुण के अनुसार बुद्धि धृति के भी तीन भेद बतलाता हूँ
अर्जुन ! विभागशः मुझसे सुन, तुझको सम्यक समझाता हूँ
जो बुद्धि प्रवृत्ति निवृत्ति तथा कर्तव्य साथ में अकर्तव्य
भय अभय अनेक विकारों का जो सम्यक ज्ञान कराती है
जो मोक्ष और बंधन का करने में सक्षम तात्विक निर्णय
हे पार्थ ! पुरुष की वही बुद्धि सात्विकी बुद्धि कहलाती है
जब धर्म अधर्म अकार्य कार्य का ज्ञान नहीं हो पाता है
ऐसा मानव राजसी बुद्धि वाला मानव कहलाता है
समझे अधर्म को धर्म अशौच पुनीत दिखाई देता है
अर्जुन ! तामसी बुद्धि को सब विपरीत दिखाई देता है
मन प्राण इन्द्रियों की जिस नर में अटल धारणा होती है
उस ध्यान योग में रत नर की सात्विकी धारणा होती है
जब कोई नर आसक्ति सहित धारण करता धर्मार्थ काम
हे पृथा पुत्र अर्जुन जानो, उस धृति का है राजसी नाम
निद्रा भय चिन्ता दुख मद को जो मानव नहीं छोडता है
तामस धृति से दुर्बुद्ध पुरुष वह निज सम्बन्ध जोडता है
जो भजन ध्यान सेवा से सुख के अनुभव का अभ्यसन करे
हे पार्थ ! त्रिविध सुख प्राप्त करे वह सब दुखों का हनन करे
आरम्भ काल में यद्यपि वह विष सम लगता है दुखकारी
वह सात्विक सुख प्रसादमय होता है अमृतसम हितकारी
इन्द्रिय विषयों का संगम अमृत जैसा लगता सुखकर है
परिणाम रूप में वह राजस सुख विष सा बडा कष्टकर है
तामस सुख आदि अन्त दोनों में मोहन पैदा करता है
निद्रा आलस्य प्रमादजन्य सम्मोहन पैदा करता है
पृथ्वी आकाश देवता अथवा कोई ऐसा सत्व नहीं
हो विद्यमान जिनमें इन तीनों प्रकृति गुणों का तत्व नहीं
ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य शूद्र इनके स्वभावतः कर्म नियत
अर्जुन ! उनका स्वभावसंगत ही होता है गुणधर्म नियत
शम दम तप शौच क्षान्ति आर्जव सात्विक गुणधर्म कहा जाता
विज्ञान ज्ञान आस्तिक्य आदि ही ब्राह्मण कर्म कहा जाता
धृति शौर्य तेज दक्षता युद्ध में अडिग रहे हो दानभाव
स्वाभाविक क्षात्रकर्म हैं ये स्वामित्वभाव क्षत्रिय स्वभाव
कृषि गोरक्षा वाणिज्य आदि होता स्वभाव से वैश्यकर्म
सेवा हो जहाँ सर्वजन की है वह स्वभाव से शूद्रकर्म
अपने स्वाभाविक कर्मों से ही परमसिद्धि मिल पाती है
उस विधि को सुन जिससे मानव को सिद्धि प्राप्त हो जाती है
सारे भूतों का कर्ता जो जिससे है सारा जगत व्याप्त
निज निज कर्मों से प्रभु की पूजा से होती है सिद्धि प्राप्त
विधिवत व्यवहृत परकीय धर्म से विगुण स्वधर्म श्रेष्ठतर है
होता है नहीं पापभागी निज धर्म कर्म श्रेयस्कर है
अवगुण कर्मों को वैसा ही ढक कर रखते, जिस तरह धुँए से अग्नि सदा आच्छादित है
निज सहज कर्म यद्यपि सदोष हों हे अर्जुन, उनका स्वभाव से त्याग सर्वथा अनुचित है
स्पृहा और आसक्ति रहित मन जब निज वश हो जाता है
वह मानव सांख्ययोग द्वारा नैष्कर्म्य सिद्धि पा जाता है
जो ज्ञान योग की कहलाती उत्तम निष्ठा, नैष्कर्म्य सिद्धि जिस मानव को मिल जाती है
अर्जुन उसका तू सार समझ जिसके फलतः, उस परमब्रह्म की प्राप्ति उसे हो जाती है
निज बुद्धि शुद्धि कर जो नर नियमित सात्विक भोजन करता है
शब्दादि विषय तज राग द्वेष एकान्तिक सेवन करता है
सात्विक धृति द्वारा अन्तःकरण इन्द्रियों को वश में करके
जो अपने मन वाणी शरीर को वश में करने वाला है
निःशेष हो गये हों जिसके अन्तस्तल के सब राग द्वेष
जो भली भाँति वैराग्य अटल का आश्रय लेने वाला है
जिसमें परिग्रह का भाव नहीं है दम्भ रहित, जो अहंकार बल काम क्रोध का है त्यागी
ममताविहीन जिसका स्वभाव है शान्तियुक्त, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म प्राप्ति का है भागी
जो एकनिष्ठ हो ईश्वर में ध्यानावस्थित, कांक्षाविहीन वह पुरुष न होता शोकपूर्ण
वह प्रसन्नात्मा पाता मेरी परमभक्ति, जो हर प्राणी के प्रति होता समभाव पूर्ण
उस पराभक्ति के द्वारा मुझ परमात्मा का, मैं जो जितना हूँ उसे ज्ञान हो जाता है
उस भक्ति शक्ति से मेरा पूर्ण स्वरूप समझ, वह भक्त मेरा मुझमें प्रविष्ट हो जाता है
मेरे आश्रित जो कर्मवान कर्मों का निष्पादन करता
मेरे प्रसाद से परम सनातन पद का आस्वादन करता
समबुद्धि योग के आश्रय से कर्मों को मुझमें कर अर्पण
हो करके मेरे परायण मन से मुझमें पूर्ण समर्पण कर
कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें ध्यान लगायेगा
तू मेरी कृपादृष्टि से संकट का सागर तर जायेगा
यदि अहंकारवश तूने मेरे इन वचनों को सुना नहीं
अपने जीवन के लक्ष्यों से तू नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा
है अहंकार तेरा केवल इस युद्ध पलायन का कारण
यह युद्ध विरति मिथ्याचिंतन तुझको अभियोजित कर देगा
अपने क्षत्रिय स्वभाव से तू इस तरह कहाँ बच पायेगा
तेरा स्वभाव तुझको बलात संग्राम नियोजित कर देगा
जिन कर्मों के प्रति विरति हुई है पार्थ मोह के वश होकर
उन स्वाभाविक कर्मों को करना ही होगा परवश होकर
ईश्वर हृदयस्थल में स्थित हर प्राणिमात्र काया के
वह भ्रमण कराता उन्हें यंत्रवत बन्धन से माया के
हे भारत अब तू पूर्ण भाव से ईश्वर के आश्रय में चल
पायेगा शाश्वत परमधाम उसके प्रसाद से शान्ति अचल
यह ज्ञान तुझे जो बतलाया यह है अति गोपनीय दुस्तर
इस गुप्त ज्ञान पर चिन्तन कर फिर जैसा चाहे वैसा कर
अत्यन्त रहस्य पूर्ण उन बचनों को फिर से समझाऊँगा
तू अतिशय प्रिय है मुझे अतः हितकारी ज्ञान बताऊँगा
हे अर्जुन मुझमें चित्त लगा बन भक्त मेरा फिर पूजा कर
करके सर्वस्व समर्पण तन मन धन से कर मुझको प्रणाम
तू मुझे प्राप्त कर जायेगा इसमें कोई संदेह नहीं,
करता हूँ सत्य प्रतिज्ञा तू पायेगा मेरा परमधाम
सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा
कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा
गीता रूपी इन गुप्तज्ञान उपदेशों को, तप श्रद्धा भक्ति रहित लोगों से मत कहना
इच्छाविहीन जो रखता दोषदृष्टि मुझमें, ऐसे लोगों से इसे कदापि नहीं कहना
जो मेरे भक्तों को रहस्यमय गीता ज्ञान करायेगा
इसमें कोई संदेह नहीं वह मुझे प्राप्त हो जायेगा
उससे बढकर मेरा प्रिय जन अब तक न हुआ न कभी होगा
इस जग में उससे बढकर प्रिय कोई भी मुझे नहीं होगा
हम दोनों के संवादरूप गीता का जो अध्ययन करे
यह मेरा मत है ज्ञान यज्ञ से वह मेरा ही यजन करे
होकर सश्रद्ध अनुसूयदृष्टि जो भी गीता का श्रवण करे
वह मानव पापमुक्त होकर उत्तम लोकों में रमण करे
क्या पार्थ ! श्रवण कर गीता का मन में संकलन कर लिया है
हे अर्जुन ! क्या अज्ञानजनित भ्रम तम का दलन कर दिया है
अर्जुन बोले
हे अच्युत ! मात्र आप ही की अनुकम्पा है
हो गए मोह सारे विनष्ट सुस्मृति में हूँ
प्रभु की सारी आज्ञायें मुझको शिरोधार्य
अब पूर्णतया संशयविहीन स्थिति में हूँ
संजय बोले
कृष्णार्जुन के संवादों का राजन प्रभाव बललाते हैं
अद्भुत रहस्य को सुन करके रोंगटे खडे हो जाते हैं
श्री व्यास कृपा से दिव्य दृष्टि को पा करके, उन कृष्णार्जुन को देखा और सुना मैंने
अर्जुन के प्रति गीता का गुप्त ज्ञान कहते, योगेश्वर के मुख से साक्षात सुना मैंने
श्रीकृष्णार्जुन संवाद बडे कल्याणपरक अद्भुत अपार
हे राजन ! उन्हें सोच करके हर्षित होता हूँ बार बार
विस्मयकारी वह रूप देख श्री हरि का घोर चकित होता
राजन ! मन में चिंतन करके मैं बार बार हर्षित होता
हैं जहाँ विराजित योगेश्वर श्रीकृष्ण धनुर्धर पार्थ जहाँ
मेरी दृढमति है अटल नीति होती श्री विजय विभूति वहाँ
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम ।
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