Friday, 7 October 2011

GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य

GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य

धरा ने पूछा


प्रभु हमें ज्ञान दो कैसे मानव प्रारब्धों का भोग करे
सँग में प्रभु पद में निश्छल भक्ति भाव का भी संयोग करे

श्री विष्णु ने कहा

जो प्रारब्धों का भोग और सँग सँग गीता अभ्यास करे
है जग में सुखी मुक्त वह नर भवबन्धन का उपहास करे


चाहे जैसा हो महापाप मानव गीता का करे ध्यान
संस्पर्श नहीं करते किंचित उसको नलिनी जल के समान


पावन गीता का ग्रन्थ जहाँ जिस घर जिस जगह प्रतिष्ठित है
समझो मय तीर्थ प्रयागराज साक्षात विराजित संस्थित है


सारे योगी पन्नग ऋषियों के साथ देवता रहते हैं
है जहाँ विराजमान गीता ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं


गोपाल बाल कान्हा भी हर क्षण वास वहाँ पर करते हैं
नारद ध्रुव आदि पार्षदों के सँग शीघ्र अनुग्रह करते हैं


हे धरा तुझे मैं बतलाऊँ करता हूँ नित मैं वास वहाँ
गीता का पाठन और श्रवण गीता का हो अभ्यास जहाँ


गीताश्रय में है वास मेरा गीता है मेरा सुघर भवन
गीताश्रय से मेरे द्वारा पोषित पालित है सकल भुवन


है ब्रह्मरूपिणी परमश्रेष्ठ विद्या गीता है अतुलनीय
है अर्धमात्राक्षरा और नित्या पदावली अकथनीय


निज मुख से चिदानन्द माधव ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया
तत्वार्थ ज्ञान वेदस्वरूप गीता का अनुसंधान किया


जो अष्टादश अध्यायों का निश्चल मन से व्यवहारी हो
तच्क्षण हो ज्ञान सिद्धि उसको भगवदपद का अधिकारी हो


सम्पूर्ण पाठ दुष्कर हो यदि उसका आधा भी पढ जावे
निश्चय गोदान समान पुण्य का मार्ग नया नित गढ जावे


छः भाग नित्य जो पढता है गंगास्नान फल पाता है
जो तीन भाग नित पढता है वह सोमयाग फल पाता है


जो मात्र एक अध्याय नित्य पढता है भक्ति भाव लेकर
वह दीर्घ काल तक रुद्रलोक में बसता है शिवगण होकर


अध्याय श्लोक या अंश मात्र का जो आचारी होता है
वह हर मन्वन्तर में मानव जीवन अधिकारी होता है


दस सात पाँच दो तीन चार अध्याय अंश जो हो संभव
शत सदियों तक शशिलोक वास, फिर पुरुष योनि होती संभव


अवसान काल पर जो मुख से गीता उच्चारण करता है
फिर पुनर्जन्म पाकर मानव शरीर वह धारण करता है


गीता अभ्यास पुनः करके वह उत्तम गति पा जाता है
’गीता’ का उच्चारण करके नर सद्गति को पा जाता है


जिसके सिर पर हो महपाप गीतार्थ श्रवण अनुरागी हो
वैकुन्ठ प्राप्त होता उसको हरिपदानन्द का भागी हो


मन में गीतार्थ प्रकाशित कर शुभ कर्मों को अपनाता है
वह जीवन्मुक्त कहाता है देहान्त परमपद पाता है


गीता का आश्रय लेकर ही इस जग में होकर पापमुक्त
जनकादि अनेक नृपति सुखकर पा गये परमपद तापमुक्त


गीता माहात्म्य बिना गीता का पाठ अधूरा होता है
ऐसा समझो वह नर अपनी श्रमशक्ति व्यर्थ ही खोता है


गीता माहात्म्य सहित गीता का पाठ सदा जो करता है
उसका दुर्लभ फल पाता है वह नर भवसागर तरता है

सूत ने कहा

माहात्म्य सनातन गीता का मैंने जो कहा अपेक्षित है
गीता के बाद पढा जाये उसका परिणाम सुनिश्चित है   ॥

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GITAMRITAM गीताऽमृतम -
 श्रीमद्भग्वदगीता का माहात्म्य का अनुसंधान


शौनक बोले


मुनि व्यास सहित श्रुतियों द्वारा जो कहा गया वह बतलाओ
हे सूत ! वुलक्षण गीता का माहात्म्य मुझे भी समझाओ


सूत ने कहा


है परम पुरातन गोपनीय जिसके बारे में प्रश्न किया
गीता माहात्म्य कथन में अब तक कोई नहीं समर्थ हुआ


गीता माहात्म्य बडा दुर्गम कहलाता है
श्रीकृष्ण एक जो भली प्रकार जानते हैं
कुछ कुछ है ज्ञान व्यास शुक याज्ञवल्क्य को भी
अर्जुन विदेह भी थोडा बहुत जानते हैं


कुछ अन्य दूसरे हैं जो इसको सुनकर के
सारे लोकों में इसका कीर्तन करते हैं
हमने भी जो कुछ सुना व्यास जी के मुख से
अब आज आप से उसका वर्णन करते हैं


भगवान विष्णु के मुख सरसिज से जो निःसृत
उसका हृदयंगम कर लेने का आग्रह है
नर का कर्तव्य यही गीता कंठस्थ करे
सब व्यर्थ अनेकानेक शास्त्र का संग्रह है


है सर्वज्ञान प्रेरक गीत सारे धर्मों का है निचोड
सब शास्त्र समाहित हैं इसमें गीता का कोई नहीं जोड


दुस्तर भवसागर को तरने का जो सपना साकार करे
वह गीता महापोत चढकर सुख से भवसागर पार करे


जो पुरुष सचेष्ट पुण्य गीता का नित्य पाठ कर लेता है
भय शोक आदि से मुक्त हुआ वह विष्णु धाम पा लेता है


जो गीता का अभ्यासपूर्वक श्रवण नहीं कर पाता है
वह मूढ मोक्षकामी बालक सम अपनी हँसी उडाता है


जो मानव पावन गीता को निशिदिन सुनते या पढ जाते
संदेह नहीं उनसे मानव क्या सुर भी पार नहीं पाते


नर काया मैल सर्वदा जल या गंगाजल से धुलता है
संसार रूप का मैल सदा ही गीता जल से धुलता है


गीता का पाठन पठन नहीं गीता का जिसको ज्ञान नहीं
हो अरुचि श्रवण में, श्रद्धा और भावना से सम्मान नहीं


संसार बीच ऐसा मनुष्य शूकर समान विचरण करता
वह सबसे बडा नीच जो गीता ज्ञान नहीं धारण करता


व्रत चेष्टा तप यश ज्ञान तथा हैं अर्थहीन आचार सभी
गीतार्थ पठन से रहित नराधम को करते धिक्कार सभी


निष्फल वह ज्ञान धर्मरोधी आसुरी कहाया जाता है
वेदान्त वेद निन्दित गीता में कभी न गाया जाता है


जो सोते चलते खडे बोलते निशि दिन गीता गाता है
वह सतत यथार्थ ज्ञानरत शाश्वत मोक्षधाम पा जाता है


जो श्रेष्ठ पुरुष योगी सिद्धों संतों में गीता पाठ करे
यज्ञों भक्तों के बीच सुनाकर परमधाम को प्राप्त करे


गीता का नित्य पठन पाठन या श्रवण नित्य जो करता है
दक्षिणा दान संग अश्वमेध के तुल्य यज्ञ वह करता है


जिसने अविचल मन भक्तिभाव से गीता का अभ्यास किया
उसने उन वेद पुराण शास्त्र समझो सबका अभ्यास किया


गीता के अर्थों को जो सुनता गाता और सुनाता है
वह परहितकारी मानव प्रभु का परमधाम पा जाता है


जो नर घर में गीता का पूजन आयोजन करवाता है
फिर त्रिविध ताप उत्पन्न व्याधि दुख का भय नहीं सताता है


उस पर दुर्गति या पाप शाप होते हैं अप्रभावकारी
मानव शरीर के छहों शत्रु होते हैं नहीं अहितकारी


गीता का अभिनन्दन वन्दन सम्पन्न जहाँ पर होता है
ईश्वर का निश्चल भक्तिभाव उत्पन्न वहाँ पर होता है


स्नापित अथवा अस्नापित हो पावन या कोई अपावन हो
उस विश्वरूप का ध्यान करे तो पुरुष सर्वदा पावन हो


भोजन सर्वत्र ग्रहण करता हर तरह दान लेने वाला
बन्धन से बँधता कभी नहीं गीता वाचन करने वाला


निज अन्तःकरण सहित जो नित गीता में ध्यान लगाता है
सर्वाग्निक क्रियावान पण्डित वह नितजापी कहलाता है


वह दर्शनीय योगी ज्ञानी याज्ञिक धनवान कहाता है
वह सब वेदों का ज्ञाता है एवं ध्यानी कहलाता है


गीता होती है जहाँ उपस्थित जहाँ पाठ नित होता है
सब तीर्थों सहित प्रयागराज का वास वहाँ पर होता है


सर्प देवता योगी ऋषि उस देह देश में करते वास
गीता स्थित है जिस घर में वह होता इनका आवास


गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता
मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता


इसे भवघ्नी चिदानंद अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें
परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थज्ञान मंजरी कहें


इन नामों का जप स्थिर मन से जो नर कर लेता है
शीघ्र प्राप्त कर ज्ञानसिद्धि फिर परमधाम पा लेता है


कर्मों को करने के संग जो नर गीता का पाठ करे
सभी कर्म निर्दोष सिद्ध हों सुन्दर फल को प्राप्त करे


पितरों के प्रति श्राद्ध कर्म में जो गीता अपनाते हैं
हो जाते संतुष्ट पितरगण सद्गति को पा जाते हैं


गीता से संतुष्ट श्राद्ध से तृप्त पितर जब होते हैं
पितृलोक में जाकर के आशीष पुत्र को देते हैं


जो गीता लिख गले हाथ मस्तक पर धारण करता है
दारुण विघ्न उपद्रव बाधा का निस्तारण करता है


भारत में चारों वर्णों में जो भी हैं मनुजदेहधारी
जो नहीं हुए गीतामृत के पढने सुनने के व्यवहारी


वे समझो अमृत छोड मात्र विष का ही पान किया करते
सुख मोक्ष उन्हें मिलता है जो गीतामृत पान किया करते


दुख से पीडित संसारी जो भगवद्गीता का श्रवण करे
अमृत की प्राप्ति उसे होती श्रीहरि के पद में श्रयण करे


पा गए परमपद जनक आदि नृप गीता ज्ञान निरत होकर
गीता का आश्रय ले करके इस जग में पाप विरत होकर


है ऊँच नीच का भेद नहीं जग के सारे मानव समान
यह ब्रह्मरूपिणी गीता दे सबको हितकारी परमज्ञान


सादर गीतार्थ श्रवण करके जिसमें प्रसन्नता व्याप्त नहीं
उसको प्रमादवश जग में श्रम का प्रतिफल होता प्राप्त नहीं


गीता माहात्म्य बिना गीता का पठन पुरुष जो करता है
होता है वृथा पाठफल वह अपना श्रम निष्फल करता है


माहात्म्य सहित जो सुने और श्रद्धा से गीता पाठ करे
दुर्लभ गति उसे प्राप्त होती वह भवसागर को पार करे


गीता का जो माहात्म्य सनातन यह मैंने बतलाया है
गीता के बाद पढा जिसने उसने यथोक्त फल पाया है   ॥


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