GITAMRITAM गीताऽमृतम - श्री गीता जी की आरती
गीते ! भगवन की वाणी, सब जीवों की कल्याणी, दुःखों से तू ही उबारती ।
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
तुझको पाकर मन का सारा अंधकार मिट जाये
तेरी कृपा दृष्टि पा करके ज्ञान चक्षु खुल जाये
माता विद्या बढाने वाली, मोक्ष दिलाने वाली, नैया तू पार उतारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
तू है सब जीवों की माता तू ही सबकी धाता
तेरा ही आश्रय लेकरके रचता जगत विधाता
माता तू ही है भवभयनाशिनि तू ही है ज्ञानप्रकाशिनि, भक्तों को अपने दुलारती
माता हम सब उतारें तेरी आरती ॥
काम क्रोध मद लोभ छोडकर जो तेरे ढिंग आये
सुख सुख में समान हो करके परमधाम पा जाये
माता तू है सावित्री सीता, तू ही है पावन गंगा, पापी के पाप निवारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
धर्म कर्म का पथ दिखलाकर सबको निर्भय करती
शरणागत के पापों को तू मन में कभी न धरती
माता, केशव का चक्र चलाके, शंकर का शूल उठाके, दुष्टों को तू ही संहारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
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भजन
मेरे आँगन में गोविन्द आया करो ||
पहले तुम असुरन को मारो पाछे वंशी बजाया करो ||
आतंकी विषधर नागों को नाथ के मोहन नचाया करो ||
व्याकुल गाय गोपिका गोपी गिरि गोवर्धन उठाया करो ||
भ्रष्टाचार और शोषण के शिशुपालों को नसाया करो ||
निश्छल भक्ति हमें दे करके माया तिमिर हटाया करो ||
काम क्रोध मद लोभ मोह से हमको हमेशा बचाया करो ||
लाज द्रोपदी की ज्यों राखी सबकी लाज बचाया करो ||
सभी दुष्ट हो जायें "घायल" ऐसा चक्र चलाया करो ॥ ||
*************
भजन
तनी मोहन मुरलिया बजउत्या ना
जौन रूप अर्जुन काँ देखाया, हमहूँ काँ उहै देखउत्या ना ||
गली गली द्रौपदी पुकारै, हमरौ लजिया बचउत्या ना ||
गणिका गीध अजामिल काँ तारया, हमरौ पार लगौत्या ना ||
वृन्दावन की कुन्ज गलिन मां, फिर से रास रचउत्या ना ||
माया कै जंजाल न छूटै, गीता कै ज्ञान करउत्या ना ||
तब तौ कह्या हम हर जुग मां अउबै, का होइगै तुँहका बतउत्या ना ||
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ऊँ श्री परमात्मने नमः
श्री गीतामृतम
अथ करन्यासः
ऊँ अस्य श्री गीतामृतम माला मन्त्रस्य स्वामी दिनेशानन्द ऋषिः मुक्त छ्न्दः श्रीकृष्ण परमात्मा देवता, ’सारे वर्णों में मैं ही हूँ ऊँकार रूप, मैं महाकाल हूँ सब कालों का ज्ञाता हूँ’ इति बीजम ॥ ’मैं सर्वमुखी हूँ महाविराट रूप वाला, मैं हूँ समास में द्वन्द्व सभी का धाता हूँ’ इति शक्तिः ॥ ’ कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति कीलकम ॥ ’तू मेरी कृपा दृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इत्यंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ’सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति तर्जनीभ्यां नमः ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुखभवसागर तर जायेगा’ इति मध्यमाभ्यां नमः ॥ मेरे शरीर में सचराचर स्थित समग्र संसार देख’ इति अनामिकाभ्यां नमः ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुसार जो चाहे वह साकार देख’ इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ’मैं देख रहा हूँ देव तुम्हारी काया में देवों ऋषियों को योगारूष उपायों को’ इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ इति करन्यासः ॥
अथ हृदयादि न्यासः
’कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति हृदयाय नमः ॥ ’तू मेरी कृपादृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इति शिरसे स्वाहा ॥ ’ सब धर्मों को तजकर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति शिखायै वषट ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा’ इति कवचाय हुम ॥ ;मेरे शरीर में सचारर स्थित समग्र संसार देख’ इति नेत्र त्रयाय वौषट ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुरूप जो चाहे वह साकार देख’ इति अस्त्राय फट ॥ ऊँ श्री कृष्ण प्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ॥
अथ ध्यानम
गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता, मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता ।
इसे भवघ्नी चिदानन्द अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें, परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थ ज्ञान मंजरी कहें ।
इन नामों का जप स्थिरमन से जो नर कर लेता है, शीघ्र प्राप्त कर ज्ञान सिद्धि फिर परमधाम पा लेता है ।
वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम, देवकी परमानन्दम कृष्णम वन्दे जगद गुरुम ।
लाँघे पर्वत पंगु तब मूक होत वाचाल । तब करते हैं कृपा प्रभु यदुनन्दन गोपाल ॥
***************
गीतामृतम से कुछ सम्पुट
सुरक्षा हेतु
इसका छेदन शस्त्रास्त्र नहीं कर सकते ...........( अध्याय २/२३)
मोक्ष प्राप्ति हेतु
ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक..........(अध्याय ४/९)
पाप मुक्ति हेतु
इस जग में जितने भी हैं पापकर्म वाले..........(अध्याय ४/३६)
सुख शान्ति हेतु
जो कर्मों के फल का परित्यागी होता है.........(अध्याय ५/१२)
कल्याण हेतु
जो सतत अनन्य भावना से मेरी उपासना....(अध्याय ९/२२)
विद्या ज्ञान प्राप्ति हेतु
उन भक्तों पर अनुकम्पा करने......................(अध्याय १०/११)
धन धान्य प्राप्ति हेतु
एकादश रुद्रों में शंकर यक्षों में ........................(अध्याय १०/२३)
कामना प्राप्ति हेतु
शस्त्रास्त्रों में मैं वज्र रूप गौओं में कामधेनु.........(अध्याय १०/२८)
विजय हेतु
मैं ही कहलाता हूँ जयिष्णु की नीति परम...........(अध्याय १०/३८)
तू मार प्रतीक रूप में ........................................(अध्याय ११/३४)
भूत प्रेत बाधा निवारण हेतु
यह सभी आपकी कीर्ति नाम गुण का प्रभाव.......(अध्याय ११/३६)
पाप क्षमा हेतु
शय्या आसन भोजन.........................................(अध्याय ११/४२)
क्षमा दूसरों को इस जग में.................................(अध्याय ११/४४)
आरोग्य हेतु
हो परम सूक्ष्म..................................................(अध्याय १५/१३)
संकट निवारण हेतु
कट जायेंगे सारे संकट.....................................(अध्याय १८/५८)
सर्वतोन्मुखी उन्नति हेतु
हैं जहाँ विराजित योगेश्वर...................................(अध्याय १८/७८)
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गीते ! भगवन की वाणी, सब जीवों की कल्याणी, दुःखों से तू ही उबारती ।
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
तुझको पाकर मन का सारा अंधकार मिट जाये
तेरी कृपा दृष्टि पा करके ज्ञान चक्षु खुल जाये
माता विद्या बढाने वाली, मोक्ष दिलाने वाली, नैया तू पार उतारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
तू है सब जीवों की माता तू ही सबकी धाता
तेरा ही आश्रय लेकरके रचता जगत विधाता
माता तू ही है भवभयनाशिनि तू ही है ज्ञानप्रकाशिनि, भक्तों को अपने दुलारती
माता हम सब उतारें तेरी आरती ॥
काम क्रोध मद लोभ छोडकर जो तेरे ढिंग आये
सुख सुख में समान हो करके परमधाम पा जाये
माता तू है सावित्री सीता, तू ही है पावन गंगा, पापी के पाप निवारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
धर्म कर्म का पथ दिखलाकर सबको निर्भय करती
शरणागत के पापों को तू मन में कभी न धरती
माता, केशव का चक्र चलाके, शंकर का शूल उठाके, दुष्टों को तू ही संहारती
माता, हम सब उतारें तेरी आरती ॥
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भजन
मेरे आँगन में गोविन्द आया करो ||
पहले तुम असुरन को मारो पाछे वंशी बजाया करो ||
आतंकी विषधर नागों को नाथ के मोहन नचाया करो ||
व्याकुल गाय गोपिका गोपी गिरि गोवर्धन उठाया करो ||
भ्रष्टाचार और शोषण के शिशुपालों को नसाया करो ||
निश्छल भक्ति हमें दे करके माया तिमिर हटाया करो ||
काम क्रोध मद लोभ मोह से हमको हमेशा बचाया करो ||
लाज द्रोपदी की ज्यों राखी सबकी लाज बचाया करो ||
सभी दुष्ट हो जायें "घायल" ऐसा चक्र चलाया करो ॥ ||
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भजन
तनी मोहन मुरलिया बजउत्या ना
जौन रूप अर्जुन काँ देखाया, हमहूँ काँ उहै देखउत्या ना ||
गली गली द्रौपदी पुकारै, हमरौ लजिया बचउत्या ना ||
गणिका गीध अजामिल काँ तारया, हमरौ पार लगौत्या ना ||
वृन्दावन की कुन्ज गलिन मां, फिर से रास रचउत्या ना ||
माया कै जंजाल न छूटै, गीता कै ज्ञान करउत्या ना ||
तब तौ कह्या हम हर जुग मां अउबै, का होइगै तुँहका बतउत्या ना ||
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ऊँ श्री परमात्मने नमः
श्री गीतामृतम
अथ करन्यासः
ऊँ अस्य श्री गीतामृतम माला मन्त्रस्य स्वामी दिनेशानन्द ऋषिः मुक्त छ्न्दः श्रीकृष्ण परमात्मा देवता, ’सारे वर्णों में मैं ही हूँ ऊँकार रूप, मैं महाकाल हूँ सब कालों का ज्ञाता हूँ’ इति बीजम ॥ ’मैं सर्वमुखी हूँ महाविराट रूप वाला, मैं हूँ समास में द्वन्द्व सभी का धाता हूँ’ इति शक्तिः ॥ ’ कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति कीलकम ॥ ’तू मेरी कृपा दृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इत्यंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ’सब धर्मों को तज कर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति तर्जनीभ्यां नमः ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुखभवसागर तर जायेगा’ इति मध्यमाभ्यां नमः ॥ मेरे शरीर में सचराचर स्थित समग्र संसार देख’ इति अनामिकाभ्यां नमः ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुसार जो चाहे वह साकार देख’ इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ’मैं देख रहा हूँ देव तुम्हारी काया में देवों ऋषियों को योगारूष उपायों को’ इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ इति करन्यासः ॥
अथ हृदयादि न्यासः
’कट जायेंगे सारे संकट यदि मुझमें चित्त लगायेगा’ इति हृदयाय नमः ॥ ’तू मेरी कृपादृष्टि पाकर दुख का सागर तर जायेगा’ इति शिरसे स्वाहा ॥ ’ सब धर्मों को तजकर जब तू मेरे आश्रय में आयेगा’ इति शिखायै वषट ॥ ’कर दूँगा पापमुक्त तुझको दुख भवसागर तर जायेगा’ इति कवचाय हुम ॥ ;मेरे शरीर में सचारर स्थित समग्र संसार देख’ इति नेत्र त्रयाय वौषट ॥ ’हे अर्जुन तू इच्छानुरूप जो चाहे वह साकार देख’ इति अस्त्राय फट ॥ ऊँ श्री कृष्ण प्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ॥
अथ ध्यानम
गीता गंगा गायत्री है सत्या सरस्वती सीता, मुक्तगेहिनी और त्रिसंध्या ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मलता ।
इसे भवघ्नी चिदानन्द अर्धमात्रा भयनाशिनी कहें, परा अनन्ता वेदत्रयी तत्वार्थ ज्ञान मंजरी कहें ।
इन नामों का जप स्थिरमन से जो नर कर लेता है, शीघ्र प्राप्त कर ज्ञान सिद्धि फिर परमधाम पा लेता है ।
वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम, देवकी परमानन्दम कृष्णम वन्दे जगद गुरुम ।
लाँघे पर्वत पंगु तब मूक होत वाचाल । तब करते हैं कृपा प्रभु यदुनन्दन गोपाल ॥
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गीतामृतम से कुछ सम्पुट
सुरक्षा हेतु
इसका छेदन शस्त्रास्त्र नहीं कर सकते ...........( अध्याय २/२३)
मोक्ष प्राप्ति हेतु
ये जन्म कर्म सब मेरे परम अलौकिक..........(अध्याय ४/९)
पाप मुक्ति हेतु
इस जग में जितने भी हैं पापकर्म वाले..........(अध्याय ४/३६)
सुख शान्ति हेतु
जो कर्मों के फल का परित्यागी होता है.........(अध्याय ५/१२)
कल्याण हेतु
जो सतत अनन्य भावना से मेरी उपासना....(अध्याय ९/२२)
विद्या ज्ञान प्राप्ति हेतु
उन भक्तों पर अनुकम्पा करने......................(अध्याय १०/११)
धन धान्य प्राप्ति हेतु
एकादश रुद्रों में शंकर यक्षों में ........................(अध्याय १०/२३)
कामना प्राप्ति हेतु
शस्त्रास्त्रों में मैं वज्र रूप गौओं में कामधेनु.........(अध्याय १०/२८)
विजय हेतु
मैं ही कहलाता हूँ जयिष्णु की नीति परम...........(अध्याय १०/३८)
तू मार प्रतीक रूप में ........................................(अध्याय ११/३४)
भूत प्रेत बाधा निवारण हेतु
यह सभी आपकी कीर्ति नाम गुण का प्रभाव.......(अध्याय ११/३६)
पाप क्षमा हेतु
शय्या आसन भोजन.........................................(अध्याय ११/४२)
क्षमा दूसरों को इस जग में.................................(अध्याय ११/४४)
आरोग्य हेतु
हो परम सूक्ष्म..................................................(अध्याय १५/१३)
संकट निवारण हेतु
कट जायेंगे सारे संकट.....................................(अध्याय १८/५८)
सर्वतोन्मुखी उन्नति हेतु
हैं जहाँ विराजित योगेश्वर...................................(अध्याय १८/७८)
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